पाठ 1: मातृभूमि (कविता)
NCERT 'मल्हार' कक्षा 6 हिंदी — राष्ट्रकवि सोहनलाल द्विवेदी | संपूर्ण पाठ्यपुस्तक प्रश्नोत्तर, काव्यांश व्याख्या, शब्द-सामर्थ्य, भाषा की बात एवं योग्यता-आधारित प्रश्न | CBSE 2026-27
- रचयिता: राष्ट्रकवि सोहनलाल द्विवेदी (राष्ट्रीय चेतना और बाल साहित्य के अप्रतिम हस्ताक्षर)।
- काव्य का सार एवं केंद्रीय संदेश: 'मातृभूमि' एक उत्कृष्ट राष्ट्रभक्ति पूर्ण कविता है जिसमें भारतवर्ष की अनुपम प्राकृतिक छटा, गौरवशाली भूगोल तथा पुण्यमयी सांस्कृतिक धरोहर का भावपूर्ण गुणगान किया गया है। उत्तर में आकाश चूमता प्रहरी हिमालय, दक्षिण में चरण प्रक्षालन करता हिंद महासागर (सिंधु), गंगा-यमुना-त्रिवेणी की अमृतमयी धाराएँ, चहकते पक्षी, फलों से लदी अमराइयाँ और मलय पवन भारत को संपूर्ण विश्व में अद्वितीय बनाते हैं।
- मूल काव्यांश (स्मरणार्थ):
"ऊँचा खड़ा हिमालय, आकाश चूमता है,
नीचे चरण तले झुक, नित सिंधु झूमता है।
गंगा-यमुन त्रिवेणी, नदियाँ लहर रही हैं,
जगमग छटा निराली, पग-पग छहर रही है।
वह पुण्यभूमि मेरी, वह स्वर्णभूमि मेरी,
वह जन्मभूमि मेरी, वह मातृभूमि मेरी॥" - कठिन शब्दार्थ व पारिभाषिक पद:
- सिंधु: समुद्र, हिंद महासागर (सागर का प्राचीन नाम)।
- त्रिवेणी: तीन पवित्र नदियों (गंगा, यमुना, सरस्वती) का संगम स्थल (प्रयागराज)।
- अमराइयाँ: आम के घने बाग व उपवन।
- मलय-पवन: दक्षिण के मलयगिरि पर्वत की ओर से आने वाली सुगंधित व शीतल चंदनमयी हवा।
- पुण्यभूमि / धर्मभूमि / कर्मभूमि: पवित्र संस्कारों, कर्तव्यपरायणता और सत्कर्मों की जननी पावन धरा।
प्रश्न: हिंद महासागर के लिए कविता में कौन-सा शब्द आया है?
(क) चरण
(ख) वंशी
(ग) हिमालय
(घ) सिंधु
सटीक उत्तर: विकल्प (घ) सिंधु
व्याख्या व तार्किक कारण: कविता की प्रथम पंक्तियों में ही कहा गया है—'नीचे चरण तले झुक, नित सिंधु झूमता है।' यहाँ 'सिंधु' शब्द का प्रयोग दक्षिण में स्थित हिंद महासागर (सिंधु सागर) के लिए किया गया है, जो भारत भूमि के चरणों को निरंतर अपनी तरंगों से धोता हुआ प्रतीत होता है।
सही विकल्प (घ) चयन पर 1 अंक; तार्किक संदर्भ उद्धृत करने पर 1 अंक (कुल 2 अंक)।
प्रश्न: 'मातृभूमि' कविता में मुख्य रूप से—
(क) भारत की प्रशंसा की गई है।
(ख) भारत के महापुरुषों की जय की गई है।
(ग) भारत की प्राकृतिक सुंदरता की सराहना की गई है।
(घ) भारतवासियों की वीरता का बखान किया गया है।
सटीक उत्तर: विकल्प (ग) भारत की प्राकृतिक सुंदरता की सराहना की गई है।
व्याख्या व तार्किक कारण: कवि सोहनलाल द्विवेदी ने कविता में मुख्य रूप से हिमालय के गगनचुंबी शिखरों, कल-कल बहती नदियों (गंगा, यमुना, त्रिवेणी), चहकती चिड़ियों, झर-झर झरते झरनों, हरी-भरी अमराइयों और सुगंधित मलय-पवन का जीवंत चित्रांकन किया है। यह संपूर्ण वर्णन भारत की अद्वितीय प्राकृतिक सुषमा और सौंदर्य को समर्पित है।
सटीक विकल्प (ग) चयन पर 1 अंक; कविता के मुख्य भाव का संक्षिप्त उल्लेख पर 1 अंक (कुल 2 अंक)।
प्रश्न: आपने 'हिंद महासागर' के लिए 'सिंधु' शब्द का चुनाव क्यों किया? अपने उत्तर का पुष्ट प्रमाण दीजिए।
हमने 'हिंद महासागर' के लिए 'सिंधु' शब्द का चुनाव निम्नलिखित ठोस कारणों से किया है:
- भौगोलिक स्थिति: कविता में कहा गया है—'नीचे चरण तले झुक, नित सिंधु झूमता है।' भारत के मानचित्र में दक्षिण दिशा में चरणों के स्थान पर केवल हिंद महासागर ही अवस्थित है।
- ऐतिहासिक व भाषाई संदर्भ: प्राचीन भारतीय साहित्य एवं संस्कृत में 'सिंधु' शब्द का अर्थ विशाल समुद्र अथवा महासागर होता है। भारतीय उपमहाद्वीप को घेरने वाले दक्षिणी सागर को प्राचीन काल में सिंधु सागर भी कहा गया है।
- काव्यगत लय: कवि ने महासागर की विशालता और अथाह जलराशि को प्रतीकात्मक रूप में 'सिंधु' नाम से संबोधित किया है।
भौगोलिक व भाषाई संदर्भ स्पष्ट करने पर 1.5 अंक; कविता की पंक्ति का सटीक उद्धरण देने पर 0.5 अंक (कुल 2 अंक)।
प्रश्न: आपने 'भारत की प्राकृतिक सुंदरता की सराहना' वाले विकल्प का चुनाव क्यों किया? सविस्तार स्पष्ट कीजिए।
हमने इस विकल्प का चुनाव इसलिए किया क्योंकि पूरी कविता में प्रकृति के विभिन्न उपादानों का मनोहारी और सांगोपांग चित्रण हुआ है:
- पर्वतराज हिमालय: उत्तर दिशा में शीश उठाए खड़ा है, जिसे 'आकाश चूमता' कहा गया है।
- पवित्र नदियाँ: गंगा, यमुना और त्रिवेणी की पावन धाराएँ निरंतर खेतों और मैदानों को सींच रही हैं।
- वन्य जीवन व हरियाली: पहाड़ियों से गिरते शीतल झरने, मस्त झाड़ियों में मधुर स्वर में गाती चिड़ियाँ तथा आम के घने बाग (अमराइयाँ) धरती की हरितिमा को बढ़ा रहे हैं।
- सुगंधित समीर: मलय पर्वत से आने वाली शीतल-मंद-सुगंधित हवा वातावरण को सुगंध से भर देती है।
अतः कविता का प्रधान सुर भारत की मनोहारी प्राकृतिक छटा और सुजलाम्-सुफलाम् स्वरूप की वंदना करना ही है।
प्राकृतिक उपादानों (पर्वत, नदी, पवन, अमराई) का उल्लेख 2 अंक; निष्कर्ष 1 अंक (कुल 3 अंक)।
प्रश्न: निम्नलिखित पंक्तियों का सरल भावार्थ अपने शब्दों में लिखिए:
"झरने अनेक झरते, जिसकी पहाड़ियों में,
चिड़ियाँ चहक रही हैं, हो मस्त झाड़ियों में।"
प्रसंग: प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिंदी पाठ्यपुस्तक 'मल्हार' के पाठ 1 'मातृभूमि' से अवतरित हैं, जिसके रचयिता राष्ट्रकवि सोहनलाल द्विवेदी हैं।
सरल भावार्थ: कवि भारतभूमि की सुरम्य वादियों का वर्णन करते हुए कहते हैं कि हमारी मातृभूमि की ऊँची-ऊँची पहाड़ियों और पर्वतों से शीतल एवं स्वच्छ जल के अनगिनत झरने निरंतर कल-कल ध्वनि करते हुए बहते हैं। यहाँ के हरे-भरे वनों, उपवनों और झाड़ियों में रंग-बिरंगे पक्षी उल्लास और आनंद में भरकर मधुर कलरव करते हैं। यह प्राकृतिक दृश्य मन को शांति, प्रफुल्लता और नवजीवन प्रदान करता है।
काव्य-सौंदर्य: अनुप्रास अलंकार का सहज प्रयोग ('झरने... झरते', 'चिड़ियाँ चहक'), भाषा सरल, सुबोध एवं गेय है।
प्रसंग 0.5 अंक; भावार्थ 2 अंक; काव्य-सौंदर्य 0.5 अंक (कुल 3 अंक)।
प्रश्न: कवि ने अपनी मातृभूमि को 'जन्मभूमि', 'पुण्यभूमि', 'स्वर्णभूमि' और 'कर्मभूमि' कहकर क्यों पुकारा है? प्रत्येक शब्द के निहितार्थ को समझाइए।
कवि ने भारत भूमि के प्रति अपनी अगाध निष्ठा और श्रद्धा व्यक्त करने के लिए इन चारों विशेषणों का अत्यंत सार्थक प्रयोग किया है:
चारों पदों की व्याख्या (प्रत्येक 1 अंक): 4 अंक; समग्र भाषाई प्रभाव व शुद्धता: 1 अंक (कुल 5 अंक)।
प्रश्न: कविता में 'जन्मभूमि' और 'मातृभूमि' जैसे शब्द आए हैं। 'भूमि' शब्द जोड़कर पाँच नए सार्थक शब्द बनाइए और उनका वाक्यों में प्रयोग कीजिए।
'भूमि' शब्द जोड़कर निर्मित नए शब्द एवं वाक्य प्रयोग:
- कर्मभूमि: मनुष्य को अपनी कर्मभूमि में पूरी निष्ठा से काम करना चाहिए। (वाक्य: भारत कर्मभूमि है जहाँ कर्म को ही पूजा माना गया है।)
- पुण्यभूमि: संतों और विचारकों की उपस्थिति से कोई भी धरा पुण्यभूमि बन जाती है। (वाक्य: हरिद्वार और काशी जैसी पावन नगरियाँ पुण्यभूमि का प्रतीक हैं।)
- वीरभूमि: राजस्थान का चित्तौड़गढ़ वीरों के बलिदान के कारण वीरभूमि कहलाता है।
- तपोभूमि: हिमालय के शांत शिखर प्राचीन ऋषियों की पावन तपोभूमि रहे हैं।
- रणभूमि: कुरुक्षेत्र की रणभूमि में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता का अमर संदेश दिया था।
पाँचों शब्दों का सही निर्माण 2.5 अंक; शुद्ध एवं अर्थपूर्ण वाक्य प्रयोग 2.5 अंक (कुल 5 अंक)।
प्रश्न: नीचे दिए गए शब्दों के तीन-तीन मानक पर्यायवाची शब्द लिखिए:
(क) सिंधु (ख) हिमालय (ग) गगन (घ) पवन (ङ) जननी
(क) सिंधु: सागर, समुद्र, जलधि, पयोधि।
(ख) हिमालय: नगराज, हिमगिरि, पर्वतराजा, शैलेंद्र।
(ग) गगन: आकाश, नभ, अंबर, व्योम।
(घ) पवन: वायु, समीर, अनिल, मारुत।
(ङ) जननी: माँ, माता, अंबा, प्रसूता।
प्रत्येक शब्द के सही पर्यायवाची पर 0.5 अंक (कुल 2.5 अंक)।
प्रश्न: पठित काव्यांश पर विचार कीजिए:
"अमराइयाँ घनी हैं, कोयल पुकारती है,
बहती मलय-पवन है, तन-मन सँवारती है।"
उपर्युक्त काव्यांश के आधार पर कथन एवं कारण का विश्लेषण कीजिए:
अभिकथन (A): मलय-पवन मनुष्य के तन और मन दोनों को ताजगी और स्फूर्ति से भर देती है।
कारण (R): दक्षिण के चंदन वनों से गुजरने के कारण यह हवा अत्यंत शीतल, सुगंधित और स्वास्थ्यवर्धक होती है।
(क) (A) और (R) दोनों सही हैं तथा (R), (A) की सही व्याख्या करता है।
(ख) (A) सही है किंतु (R) गलत है।
(ग) (A) गलत है किंतु (R) सही है।
(घ) (A) और (R) दोनों गलत हैं।
सटीक उत्तर: विकल्प (क) (A) और (R) दोनों सही हैं तथा (R), (A) की सही व्याख्या करता है।
तार्किक विश्लेषण: 'मलय' पर्वत अपनी चंदन की सघन वनस्पतियों के लिए जाना जाता है। वहाँ से बहकर आने वाली समीर सुगंधित और शीतल होती है, जो मनुष्य के तन को शीतलता और मन को मानसिक शांति देकर प्रफुल्लित कर देती है। अतः कारण (R) अभिकथन (A) का सर्वथा सटीक वैज्ञानिक व काव्यात्मक आधार प्रस्तुत करता है।
सही विकल्प चयन 1 अंक; तार्किक स्पष्टीकरण 1 अंक (कुल 2 अंक)।
प्रश्न: कवि ने जिस स्वच्छ, सुरम्य और शस्य-श्यामला मातृभूमि का गुणगान किया है, आज के प्रदूषण और औद्योगिकीकरण के दौर में उस गौरव को बनाए रखने के लिए एक विद्यार्थी के रूप में आप क्या योगदान दे सकते हैं?
कवि सोहनलाल द्विवेदी जी द्वारा वर्णित प्राकृतिक वैभव को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए एक जागरूक युवा विद्यार्थी के रूप में हमारे निम्नलिखित कर्तव्य हैं:
- वृक्षारोपण एवं हरित आवरण संवर्धन: अपने जन्मदिवस अथवा राष्ट्रीय पर्वों पर कम से कम एक पौधा लगाकर उसकी निरंतर देखभाल करना ताकि हमारी अमराइयाँ और उपवन पुनः लहलहा उठें।
- नदियों एवं जलस्रोतों की स्वच्छता: गंगा-यमुना व स्थानीय जलस्रोतों में प्लास्टिक, कचरा या पूजा सामग्री न डालना और 'नमामि गंगे' जैसे अभियानों में सक्रिय जन-जागरूकता फैलाना।
- ऊर्जा व संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग: बिजली, पानी और कागज़ की बर्बादी रोकना तथा सार्वजनिक परिवहन या साइकिल का उपयोग कर वायु प्रदूषण (मलय-पवन की शुद्धता) को संरक्षित रखना।
- 'सिंगल यूज़ प्लास्टिक' का त्याग: कपड़े के थैलों का प्रयोग करना और अपने विद्यालय व मोहल्ले को कचरा-मुक्त बनाना।
निष्कर्ष: सच्ची देशसेवा केवल सीमाओं पर ही नहीं होती, बल्कि अपनी पावन मातृभूमि की प्रकृति और पर्यावरण की रक्षा करना भी प्रत्येक नागरिक का परम राष्ट्रीय धर्म है।
चार व्यावहारिक बिंदुओं का निरूपण (प्रत्येक 1 अंक) 4 अंक; निष्कर्ष 1 अंक (कुल 5 अंक)।
पाठ 2: गोल (संस्मरण)
NCERT 'मल्हार' कक्षा 6 हिंदी — हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद | संपूर्ण पाठ्यपुस्तक प्रश्नोत्तर, खेल भावना (Sportsmanship), संस्मरण विश्लेषण, भाषा की बात एवं योग्यता-आधारित प्रश्न | CBSE 2026-27
- विधा एवं रचनाकार: संस्मरण — मेजर ध्यानचंद (विश्व प्रसिद्ध भारतीय हॉकी खिलाड़ी, जिन्हें 'हॉकी का जादूगर' कहा जाता है)।
- ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: 1933 के पंजाब रेजिमेंटल टूर्नामेंट का एक रोमांचक मुकाबला, जहाँ ध्यानचंद की टीम का सामना एक अत्यंत आक्रामक विपक्षी टीम से हो रहा था।
- प्रमुख प्रेरक घटना: मैच के दौरान विपक्षी टीम के एक सेंटर-फॉरवर्ड खिलाड़ी ने हताश होकर अपनी हॉकी स्टिक से ध्यानचंद के सिर पर जोरदार वार कर दिया। ध्यानचंद का सिर फट गया और खून बहने लगा। उन्हें मैदान से बाहर ले जाकर टांके लगाए गए और पट्टी बाँधी गई।
- बदले की अनूठी मिसाल (खेल भावना): पट्टी बँधवाकर मैदान में लौटते ही ध्यानचंद ने उस खिलाड़ी से कोई झगड़ा नहीं किया, बल्कि मुस्कुराते हुए कहा—"दोस्त, खेल में इतना गुस्सा अच्छा नहीं। मैंने तो अपना बदला ले ही लिया है। अगर तुम मुझे हॉकी नहीं मारते तो शायद मैं तुम्हें दो ही गोल से हराता।" इसके बाद ध्यानचंद ने अपने अद्भुत कौशल से एक के बाद एक लगातार 6 गोल दागकर अपनी टीम को 6-1 से ऐतिहासिक जीत दिलाई। मैच के बाद विपक्षी खिलाड़ी ने शर्मिंदा होकर उनसे माफी माँगी।
- मुख्य जीवन-मूल्य: अनुशासन, आत्मसंयम (Self-control), अहिंसा, प्रतिशोध की भावना को सकारात्मक ऊर्जा में बदलना, और उच्च खेल भावना (Sportsmanship)।
प्रश्न: “दोस्त, खेल में इतना गुस्सा अच्छा नहीं। मैंने तो अपना बदला ले ही लिया है। अगर तुम मुझे हॉकी नहीं मारते तो शायद मैं तुम्हें दो ही गोल से हराता।” मेजर ध्यानचंद की इस बात से उनके बारे में क्या पता चलता है?
(क) वे अत्यंत क्रोधी थे।
(ख) वे अच्छे ढंग से बदला लेते थे।
(ग) उन्हें हॉकी से मारने पर वे अधिक गोल करते थे।
(घ) वे जानते थे कि खेल को सही भावना से खेलना चाहिए।
सटीक उत्तर: विकल्प (घ) वे जानते थे कि खेल को सही भावना से खेलना चाहिए।
व्याख्या व तार्किक कारण: इस कथन से यह सिद्ध होता है कि मेजर ध्यानचंद खेल को शत्रुता या व्यक्तिगत लड़ाई का अखाड़ा नहीं मानते थे। वे जानते थे कि एक सच्चे खिलाड़ी का काम मैदान पर हिंसा का मुकाबला हिंसा से करना नहीं, बल्कि अपने असाधारण खेल-कौशल और अनुशासन से विपक्षी को निरुत्तर करना है।
सटीक विकल्प चयन 1 अंक; खेल भावना के संदर्भ की विवेचना 1 अंक (कुल 2 अंक)।
प्रश्न: लोगों ने मेजर ध्यानचंद को 'हॉकी का जादूगर' कहना क्यों शुरू कर दिया?
(क) उनके हॉकी खेलने के विशेष कौशल के कारण
(ख) उनकी हॉकी स्टिक की अनोखी विशेषताओं के कारण
(ग) हॉकी के लिए उनके विशेष लगाव के कारण
(घ) उनकी खेल भावना के कारण
सटीक उत्तर: विकल्प (क) उनके हॉकी खेलने के विशेष कौशल के कारण
व्याख्या व तार्किक कारण: मेजर ध्यानचंद के पास गेंद पर नियंत्रण (Ball Control) और ड्रिबलिंग की ऐसी अद्वितीय कला थी कि गेंद उनकी हॉकी स्टिक से इस तरह चिपकी रहती थी मानो कोई चुंबक लगा हो। वे पलक झपकते ही विपक्षी रक्षापंक्ति को भेदकर गेंद को गोल पोस्ट में पहुँचा देते थे। उनके इसी अद्भुत व जादुई हुनर के कारण दुनिया भर के खेल प्रशंसकों ने उन्हें 'हॉकी का जादूगर' (The Wizard of Hockey) की उपाधि दी।
सटीक विकल्प चयन 1 अंक; खेल कौशल का उदाहरण 1 अंक (कुल 2 अंक)।
प्रश्न: जब विपक्षी खिलाड़ी ने ध्यानचंद के सिर पर हॉकी स्टिक दे मारी, तब उन्होंने तुरंत क्या किया और मैच के बाद क्या घटना घटी?
मैदान पर प्रतिक्रिया: जब विपक्षी खिलाड़ी ने गुस्से में आकर ध्यानचंद के सिर पर प्रहार किया, तो ध्यानचंद ने कोई गाली-गलौज या हाथापाई नहीं की। वे शांत भाव से मैदान से बाहर गए, प्राथमिक उपचार कराया, घाव पर टांके लगवाए और सिर पर पट्टी बँधवाकर तुरंत दोबारा खेलने मैदान में उतर आए।
मैच के बाद की घटना: ध्यानचंद ने उस खिलाड़ी की पीठ थपथपाई और मुस्कराते हुए कहा कि मैंने तो अपना बदला छह गोल करके ले लिया है। ध्यानचंद की इस असाधारण उदारता और खेल भावना को देखकर वह खिलाड़ी लज्जित हो गया और उसने हाथ जोड़कर ध्यानचंद से क्षमा माँगी।
तात्कालिक शांत प्रतिक्रिया का उल्लेख 1 अंक; मैच के बाद के संवाद व क्षमा-याचना का विवरण 1 अंक (कुल 2 अंक)।
प्रश्न: "बदला लेने का सबसे अच्छा तरीका अपने काम में उत्कृष्टता दिखाना है।" इस पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए कि ध्यानचंद ने समाज को क्या संदेश दिया?
मेजर ध्यानचंद ने इस संस्मरण के माध्यम से पूरी मानवता को एक अत्यंत गहरा जीवन-मूल्य सिखाया है:
- क्रोध विनाशकारी है: जब हम किसी के दुर्व्यवहार का उत्तर क्रोध या हिंसा से देते हैं, तो हम स्वयं भी उसी के स्तर पर गिर जाते हैं और अपना ध्यान लक्ष्य से भटका बैठते हैं।
- सकारात्मक प्रतिशोध: ध्यानचंद ने अपने भीतर उपजे रोष और पीड़ा को अपनी हॉकी स्टिक की गति में बदल दिया। उन्होंने किसी को चोट पहुँचाए बिना, नियमों के दायरे में रहकर अपनी प्रतिभा के बल पर प्रतिद्वंद्वी को पराजित किया।
- शत्रु का हृदय-परिवर्तन: हिंसा से केवल शत्रुता बढ़ती है, जबकि कौशल और क्षमाशीलता से शत्रु का हृदय भी पिघल जाता है और वह अपने किए पर लज्जित होकर नतमस्तक हो जाता है।
क्रोध के दुष्परिणाम 1 अंक; सकारात्मक प्रतिशोध का महत्व 1 अंक; निष्कर्ष 1 अंक (कुल 3 अंक)।
प्रश्न: पाठ 'गोल' के आधार पर मेजर ध्यानचंद के चरित्र की प्रमुख विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
मेजर ध्यानचंद केवल एक महान खिलाड़ी ही नहीं थे, बल्कि वे एक आदर्श व्यक्तित्व के धनी थे। उनके चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
चारों चरित्रगत गुणों का सविस्तार वर्णन (प्रत्येक गुण पर 1 अंक) 4 अंक; समग्र भाषाई प्रभाव 1 अंक (कुल 5 अंक)।
प्रश्न: नीचे दिए गए मुहावरों का अर्थ लिखकर अपने वाक्यों में प्रयोग कीजिए:
(क) लोहा मानना (ख) दाँत खट्टे करना (ग) आपा खोना (घ) रंग जमाना
(क) लोहा मानना (श्रेष्ठता स्वीकार करना):
वाक्य: बर्लिन ओलंपिक 1936 में पूरी दुनिया ने मेजर ध्यानचंद के खेल का लोहा माना।
(ख) दाँत खट्टे करना (बुरी तरह हराना):
वाक्य: भारतीय हॉकी टीम ने विपक्षी टीम के दाँत खट्टे कर दिए और शानदार जीत दर्ज की।
(ग) आपा खोना (क्रोध में स्वयं पर नियंत्रण न रहना):
वाक्य: एक अच्छे खिलाड़ी को खेल के कठिन क्षणों में भी कभी अपना आपा नहीं खोना चाहिए।
(घ) रंग जमाना (प्रभाव स्थापित करना):
वाक्य: ध्यानचंद ने मैदान पर उतरते ही अपने जादुई ड्रिबलिंग से पूरे मैच में रंग जमा दिया।
प्रत्येक मुहावरे का सही अर्थ 0.5 अंक; शुद्ध वाक्य प्रयोग 0.5 अंक (कुल 4 अंक)।
प्रश्न: (अ) 'इक' प्रत्यय जोड़कर नए शब्द बनाइए:
इतिहास, समाज, प्रकृति, दिन।
(ब) 'अप' तथा 'प्रति' उपसर्ग जोड़कर दो-दो शब्द बनाइए।
(अ) 'इक' प्रत्यय से शब्द निर्माण:
- इतिहास + इक = ऐतिहासिक (प्रथम स्वर 'इ' का 'ऐ' में परिवर्तन)
- समाज + इक = सामाजिक (प्रथम स्वर 'अ' का 'आ' में परिवर्तन)
- प्रकृति + इक = प्राकृतिक
- दिन + इक = दैनिक
(ब) उपसर्ग से शब्द निर्माण:
- 'अप' उपसर्ग: अपमान, अपशब्द, अपराध।
- 'प्रति' उपसर्ग: प्रतिशोध, प्रतिक्रिया, प्रतिदिन।
प्रत्येक सही शब्द निर्माण पर 0.5 अंक (कुल 3 अंक)।
प्रश्न: केस स्टडी (Case Study): विद्यालय के इंटर-हाउस क्रिकेट फाइनल मैच में एक बल्लेबाज को अंपायर ने एलबीडब्ल्यू (LBW) आउट करार दे दिया। बल्लेबाज का मानना था कि गेंद बल्ले से लगकर गई थी। उसने गुस्से में पिच पर बल्ला पटक दिया और अंपायर पर चिल्लाने लगा।
मेजर ध्यानचंद के संस्मरण 'गोल' के आलोक में उत्तर दीजिए:
(1) बल्लेबाज के इस व्यवहार का उसकी टीम और खेल भावना पर क्या असर पड़ेगा?
(2) यदि उस बल्लेबाज ने ध्यानचंद के जीवन से सीख ली होती, तो उसे उस स्थिति में क्या करना चाहिए था?
(1) व्यवहार का दुष्प्रभाव:
- बल्लेबाज द्वारा बल्ला पटकना और अंपायर पर चिल्लाना अनुशासनहीनता और खेल भावना के विपरीत आचरण (Unsportsmanlike Conduct) है।
- इससे टीम का मनोबल गिरता है, खेल का माहौल तनावपूर्ण हो जाता है और टीम पर पेनल्टी या प्रतिबंध का खतरा उत्पन्न हो सकता है। दर्शक भी ऐसे खिलाड़ी का सम्मान नहीं करते।
(2) ध्यानचंद के सिद्धांतों के अनुसार सही आचरण:
- यदि वह बल्लेबाज मेजर ध्यानचंद से प्रेरित होता, तो वह अंपायर के निर्णय का सम्मान करते हुए शांत भाव से पवेलियन लौट जाता।
- वह अपने गुस्से को व्यर्थ नष्ट करने के बजाय अगले अवसर के लिए संचित करता और फील्डिंग व गेंदबाजी में असाधारण प्रदर्शन करके अपनी टीम को विजयी बनाने में अपनी पूरी शक्ति लगाता।
दुष्प्रभावों का विश्लेषण 2.5 अंक; ध्यानचंद के सिद्धांतों का अनुप्रयोग 2.5 अंक (कुल 5 अंक)।
पाठ 3: पहली बूँद (कविता)
NCERT 'मल्हार' कक्षा 6 हिंदी — सुप्रसिद्ध प्रकृति काव्य | संपूर्ण पाठ्यपुस्तक प्रश्नोत्तर, काव्यांश व्याख्या, मानवीकरण व उपमा अलंकार, भाषा की बात एवं योग्यता-आधारित प्रश्न | CBSE 2026-27
- काव्य का स्वरूप: प्रकृति के संजीवन रस और वर्षा ऋतु के आगमन का अत्यंत सजीव, संगीतमय और चित्रात्मक वर्णन।
- केंद्रीय भाव: भीषण ग्रीष्म ऋतु के ताप से झुलसी, प्यासी धरती के सूखे अधरों पर जब सावन की पहली बूँद अमृत बनकर गिरती है, तो संपूर्ण चराचर जगत में नवजीवन का संचार हो जाता है। मिट्टी से सौंधी सुगंध उठने लगती है, सुप्त पड़े बीजों से नन्हे अंकुर नवजीवन की अँगड़ाई लेते हैं, और नीले गगन में काले मेघ ऐसे विचरण करते हैं मानो कोई विशाल सागर पंख लगाकर उड़ रहा हो।
- मूल काव्यांश (स्मरणार्थ):
"वह पावस का प्रथम दिवस जब, पहली बूँद धरा पर आई,
अंकुर फूट पड़ा धरती से, नव-जीवन की ले अँगड़ाई।
धरती के सूखे अधरों पर, गिरी बूँद अमृत-सी आकर,
वसुंधरा की रोमावली-सी, हरी दूब फिर मुस्काई॥" - प्रमुख काव्यात्मक शब्दार्थ:
- पावस: वर्षा ऋतु।
- अधर: ओष्ठ, होंठ (तपती धरती की दरारें)।
- वसुंधरा: धरती, पृथ्वी।
- जलधर: जल को धारण करने वाला, मेघ, बादल।
- शस्य-श्यामला: लहलहाती हरी-भरी फसलों से सुशोभित धरती।
- रोमावली: शरीर के रोएं (यहाँ धरती पर उगी नन्हीं दूब के लिए प्रयुक्त सुंदर उपमा)।
प्रश्न: कविता में 'नव-जीवन की ले अँगड़ाई' किसके लिए प्रयुक्त हुआ है?
(क) बादलों के लिए
(ख) अंकुर के लिए
(ग) पक्षियों के लिए
(घ) नदियों के लिए
सटीक उत्तर: विकल्प (ख) अंकुर के लिए
व्याख्या: ग्रीष्म ऋतु में मिट्टी के भीतर सोया हुआ नन्हा बीज बारिश की पहली बूँद का स्पर्श पाते ही प्रस्फुटित हो उठता है। बीज से नए पौधे का निकलना ऐसा प्रतीत होता है मानो कोई गहरी नींद से जागकर नवजीवन की अँगड़ाई ले रहा हो।
सही विकल्प (ख) पर 1 अंक; भावार्थ स्पष्ट करने पर 1 अंक (कुल 2 अंक)।
प्रश्न: 'नीले नयनों-सा यह अंबर, काली पुतली-से ये जलधर' में 'काली पुतली' किसे कहा गया है?
(क) बारिश की बूँदों को
(ख) बादलों को (जलधर)
(ग) धरती की मिट्टी को
(घ) रात के अंधकार को
सटीक उत्तर: विकल्प (ख) बादलों को (जलधर)
व्याख्या: कवि ने नीले आकाश की तुलना एक विशाल 'नीली आँख' से की है और उस नीले आकाश में उमड़ते-घुमड़ते काले कजरारे बादलों को आँख की 'काली पुतली' की उपमा दी है। अतः 'काली पुतली' बादलों (जलधर) के लिए आया है।
सही विकल्प (ख) पर 1 अंक; उपमा के स्पष्टीकरण पर 1 अंक (कुल 2 अंक)।
प्रश्न: धरती के सूखे अधरों पर बारिश की बूँद किसके समान गिरी और उसका क्या परिणाम हुआ?
धरती के सूखे अधरों पर बारिश की पहली बूँद अमृत के समान गिरी।
परिणाम:
- जेठ-आषाढ़ की भीषण धूप से तपी और दरारें पड़ी धरती की प्यास बुझी और उसे शीतलता प्राप्त हुई।
- धरा के सीने से सोंधी-सोंधी पावन सुगंध उठने लगी।
- मिट्टी में दबे सुप्त बीजों में जीवन का संचार हुआ और नन्हे-नन्हे हरे अंकुर फूट पड़े।
अमृत के समान गिरने का उल्लेख 1 अंक; प्रकृति पर पड़े प्रभावों का वर्णन 1 अंक (कुल 2 अंक)।
प्रश्न: 'नीले नयनों-सा यह अंबर, काली पुतली-से ये जलधर' पंक्तियों का काव्य-सौंदर्य एवं भाव स्पष्ट कीजिए।
भावार्थ: कवि आकाश का मानवीकरण करते हुए कहते हैं कि वर्षा काल में स्वच्छ नीला आकाश किसी सुंदर नीली आँख के समान प्रतीत होता है। उस नीले नभ में तैरते हुए सघन काले बादल ऐसे लगते हैं मानो उस विशाल नयन की काली पुतलियाँ चारों ओर घूम-घूमकर धरती को प्रेम भरी दृष्टि से निहार रही हों।
काव्य-सौंदर्य:
- उपमा अलंकार: 'नीले नयनों-सा अंबर' और 'काली पुतली-से जलधर' में 'सा' व 'से' वाचक शब्दों के द्वारा नयनाभिराम उपमा अलंकार का सृजन हुआ है।
- बिंब-विधान: यहाँ अत्यंत सजीव चाक्षुष बिंब (Visual Imagery) उपस्थित होता है, जिससे पाठक के मन में नीले आकाश और बादलों का सुंदर चित्र उभर आता है।
भावार्थ 1.5 अंक; अलंकार व बिंब-विधान 1.5 अंक (कुल 3 अंक)।
प्रश्न: 'उपमा अलंकार' किसे कहते हैं? कविता से उपमा अलंकार के दो उदाहरण चुनकर लिखिए तथा उनके अंग स्पष्ट कीजिए।
परिभाषा: जहाँ रूप, रंग, गुण या धर्म की अत्यधिक समानता के कारण किसी एक वस्तु (उपमेय) की तुलना किसी अन्य प्रसिद्ध वस्तु (उपमान) से की जाती है, वहाँ उपमा अलंकार होता है। इसके वाचक शब्द 'सा, सी, से, सम, सदृश, जैसा' होते हैं।
कविता से उदाहरण:
• उपमेय (जिसकी तुलना हो): बारिश की बूँद
• उपमान (जिससे तुलना हो): अमृत
• वाचक शब्द: सी
• साधारण धर्म: जीवनदायिनी शक्ति, शीतलता।
• उपमेय: अंबर (आकाश)
• उपमान: नीले नयन (आँखें)
• वाचक शब्द: सा।
परिभाषा 1 अंक; दोनों उदाहरणों के अंगों का सही विश्लेषण 2 अंक (कुल 3 अंक)।
प्रश्न: निम्नलिखित शब्दों के तीन-तीन मानक पर्यायवाची शब्द लिखिए:
(क) अंबर (ख) जलधर (ग) वसुंधरा (घ) दूब (ङ) पावस
(क) अंबर: आकाश, नभ, गगन, व्योम।
(ख) जलधर: बादल, मेघ, वारिद, घन।
(ग) वसुंधरा: पृथ्वी, धरती, धरा, अवनि।
(घ) दूब: घास, तृण, दूर्वा, शाद।
(ङ) पावस: वर्षा, बरसात, चौमासा, वृष्टि।
प्रत्येक शब्द के सही पर्यायवाची पर 0.5 अंक (कुल 2.5 अंक)।
प्रश्न: कविता में पहली बूँद को 'अमृत' कहा गया है। आज के जल-संकट के युग में इस अमृत रूपी वर्षा जल को व्यर्थ बहने से बचाने के लिए 'वर्षा जल संचयन' (Rainwater Harvesting) क्यों आवश्यक है? इसके तीन व्यावहारिक उपाय सुझाइए।
वर्षा जल संचयन की अनिवार्यता: वर्षा का जल प्रकृति का अनमोल उपहार है। भूजल स्तर (Groundwater level) में निरंतर आती गिरावट और नदियों के सूखने की समस्या से निपटने के लिए वर्षा जल को सहेजना आज जीवन-मरण का प्रश्न बन चुका है।
तीन व्यावहारिक उपाय:
- छत से जल संचयन (Rooftop Harvesting): मकानों और विद्यालयों की छतों के पानी को पाइपों के माध्यम से भूमिगत टैंक या सोखता गड्ढे (Recharge Well) में उतारना, जिससे भूजल स्तर रिचार्ज हो सके।
- तालाबों व पोखरों का जीर्णोद्धार: गाँवों और नगरों में पारंपरिक जोहड़ों, बावडियों और तालाबों से गाद हटाकर उन्हें गहरा करना ताकि वर्षा का जल उनमें संचित हो सके।
- वृक्षारोपण: वनों और पार्कों में अधिक से अधिक वृक्ष लगाना, क्योंकि पेड़ों की जड़ें वर्षा जल को रोककर उसे भूमि के भीतर रिसने में सहायता करती हैं।
जल संचयन की महत्ता 2 अंक; तीन व्यावहारिक उपाय 3 अंक (कुल 5 अंक)।
पाठ 4: हार की जीत (कहानी)
NCERT 'मल्हार' कक्षा 6 हिंदी — युगदृष्टा कथाकार सुदर्शन | संपूर्ण पाठ्यपुस्तक प्रश्नोत्तर, चरित्र-चित्रण, नैतिक मूल्य, भाषा की बात एवं योग्यता-आधारित प्रश्न | CBSE 2026-27
- रचयिता: पंडित सुदर्शन (प्रेमचंद परंपरा के आदर्शोन्मुख यथार्थवादी कहानीकार)।
- प्रमुख पात्र:
- बाबा भारती: गाँव के बाहर मंदिर में रहने वाले संत पुरुष, जो अपने सुंदर व स्वामीभक्त घोड़े 'सुलतान' से अपार स्नेह करते हैं। उनका हृदय करुणा और परोपकार से ओतप्रोत है।
- डाकू खड्गसिंह: उस इलाके का खूंखार डाकू, जिसका नाम सुनकर लोग कांपते थे। वह घोड़े की सुंदरता पर मोहित होकर उसे पाने के लिए व्याकुल हो उठता है।
- सुलतान: अद्भुत गति, सुडौल कद-काठी और स्वामीभक्ति का प्रतीक अरबी नस्ल का सुंदर घोड़ा।
- कथानक एवं चरम बिंदु (Climax): खड्गसिंह छल से एक अपाहिज-लाचार व्यक्ति का वेश बनाकर रास्ते में बैठ जाता है और बाबा भारती से मदद की गुहार लगाता है। दयालु बाबा भारती उसे घोड़े पर बैठाते हैं, तभी खड्गसिंह लगाम छीनकर घोड़ा लेकर भागने लगता है।
- बाबा भारती का अमर संदेश: घोड़े के छिन जाने पर बाबा भारती चिल्लाकर कहते हैं—"ठहरो! यह घोड़ा तुम्हारा हो चुका, मैं इसे वापस नहीं मांगूंगा। पर मेरी केवल एक प्रार्थना है कि इस घटना को किसी के सामने प्रकट न करना, नहीं तो लोग किसी गरीब और अपाहिज पर विश्वास करना छोड़ देंगे।"
- हृदय-परिवर्तन एवं 'हार की जीत': बाबा भारती के इन निष्काम शब्दों ने डाकू खड्गसिंह के विवेक को झकझोर दिया। उसे लगा कि बाबा मनुष्य नहीं, देवता हैं। रात के अंधेरे में खड्गसिंह पश्चाताप के आंसुओं के साथ घोड़ा वापस बाबा के अस्तबल में चुपचाप बाँध जाता है। इस प्रकार, घोड़ा छिन जाने से हुई बाबा की बाह्य 'हार' उनके महान विचारों के कारण डाकू के हृदय-परिवर्तन के रूप में एक महान 'जीत' में परिणत हो गई।
प्रश्न: सुलतान के छीने जाने का बाबा भारती पर क्या प्रभाव हुआ?
(क) बाबा भारती के मन से चोरी का डर समाप्त हो गया।
(ख) बाबा भारती ने गरीबों की सहायता करना बंद कर दिया।
(ग) बाबा भारती ने द्वार बंद करना छोड़ दिया।
(घ) बाबा भारती असावधान हो गए।
सटीक उत्तर: विकल्प (क) बाबा भारती के मन से चोरी का डर समाप्त हो गया। (एवं वे रात को बेफिक्र सोने लगे)
व्याख्या: जब तक सुलतान अस्तबल में था, बाबा भारती को रात-रात भर जागकर पहरा देना पड़ता था कि कहीं खड्गसिंह घोड़ा न चुरा ले जाए। जब घोड़ा छिन ही गया, तो उनके मन से खोने और चोरी का सारा भय सदा के लिए समाप्त हो गया।
सही विकल्प चयन 1 अंक; मानसिक स्थिति का सटीक विश्लेषण 1 अंक (कुल 2 अंक)।
प्रश्न: "बाबा भारती भी मनुष्य ही थे।" इस कथन के समर्थन में लेखक ने कौन-सा तर्क दिया है?
(क) बाबा भारती ने डाकू को घमंड से घोड़ा दिखाया।
(ख) बाबा भारती घोड़े की प्रशंसा दूसरों से सुनने के लिए व्याकुल थे।
(ग) बाबा भारती को घोड़े से अत्यधिक लगाव और मोह था।
(घ) बाबा भारती हर पल घोड़े की रखवाली करते रहते थे।
सटीक उत्तर: विकल्प (ख) बाबा भारती घोड़े की प्रशंसा दूसरों से सुनने के लिए व्याकुल थे।
व्याख्या: लेखक कहते हैं कि मनुष्य का यह स्वाभाविक स्वभाव होता है कि वह अपनी प्रिय वस्तु की प्रशंसा दूसरों के मुँह से सुनना चाहता है। साधु-संत होने के बावजूद बाबा भारती भी इस मानवीय गुण/कमजोरी से अछूते नहीं थे, इसलिए वे खड्गसिंह को गर्व के साथ सुलतान की चाल दिखाने ले गए थे।
सही विकल्प चयन 1 अंक; मानवीय मनोविज्ञान का स्पष्टीकरण 1 अंक (कुल 2 अंक)।
प्रश्न: लेखक ने इस कहानी का शीर्षक 'हार की जीत' क्यों रखा होगा? अपने समूह में चर्चा करके कारण सहित स्पष्ट कीजिए।
लेखक सुदर्शन ने इस कहानी का नाम 'हार की जीत' अत्यंत सोच-समझकर और सार्थक रूप से रखा है, जिसके निम्नलिखित अकाट्य कारण हैं:
- तात्कालिक भौतिक हार: जब डाकू खड्गसिंह धोखे से अपाहिज बनकर बाबा भारती का घोड़ा सुलतान छीनकर भाग गया, तो सांसारिक दृष्टि से यह बाबा भारती की प्रत्यक्ष 'हार' थी और डाकू की 'जीत' थी।
- बाबा की महान मानवीय चिंता: घोड़ा छिनने के बाद भी बाबा को अपने व्यक्तिगत नुकसान का रत्ती भर मलाल नहीं था। उन्हें केवल इस बात की चिंता थी कि यदि लोगों को इस धोखे का पता चला, तो वे समाज के किसी गरीब, असहाय और जरूरतमंद व्यक्ति पर भरोसा नहीं करेंगे।
- डाकू का विवेक जाग्रत होना: बाबा के इस देवतुल्य और निस्वार्थ विचार ने डाकू खड्गसिंह के अंतर्मन को झकझोर कर रख दिया। उसे अपनी नीचता पर पश्चाताप हुआ और वह रात के सन्नाटे में घोड़ा वापस अस्तबल में बाँध गया।
- अंतिम नैतिक विजय: इस प्रकार, बाबा भारती की प्रारंभिक 'हार' उनके महान विचारों और करुणा के प्रभाव से डाकू के हृदय-परिवर्तन के रूप में एक शाश्वत 'जीत' में बदल गई। बुराई पर अच्छाई और स्वार्थ पर परोपकार की यह विजय ही 'हार की जीत' है।
शीर्षक के दोनों पक्षों (हार और जीत) का विश्लेषण 3 अंक; हृदय-परिवर्तन का संदर्भ 2 अंक (कुल 5 अंक)।
प्रश्न: बाबा भारती ने खड्गसिंह से घोड़ा छीनने के बाद क्या प्रार्थना की और इसके पीछे उनका क्या उद्देश्य था?
प्रार्थना: बाबा भारती ने कहा—"मेरी केवल एक प्रार्थना है कि इस घटना को किसी के सामने प्रकट न करना।"
उद्देश्य: बाबा भारती समाज के व्यापक नैतिक ताने-बाने की रक्षा करना चाहते थे। उन्हें भय था कि यदि समाज को यह पता चला कि एक डाकू ने अपाहिज और दीन-दुखी बनकर घोड़ा छीन लिया, तो लोग भविष्य में किसी भी वास्तविक असहाय और पीड़ित व्यक्ति पर दया करना और उसकी मदद करना छोड़ देंगे। वे समाज से विश्वास और करुणा का लोप नहीं होने देना चाहते थे।
प्रार्थना का सही उल्लेख 1 अंक; सामाजिक उद्देश्य का स्पष्टीकरण 1 अंक (कुल 2 अंक)।
प्रश्न: निम्नलिखित मुहावरों के अर्थ लिखकर वाक्यों में प्रयोग कीजिए:
(क) मुँह मोड़ना (ख) हृदय पर साँप लोटना (ग) लट्टू होना (घ) आँखों में चमक आना
(क) मुँह मोड़ना (विमुख होना / त्याग देना):
वाक्य: एक सच्चे मित्र को संकट के समय कभी अपने साथी से मुँह नहीं मोड़ना चाहिए।
(ख) हृदय पर साँप लोटना (तीव्र ईर्ष्या होना):
वाक्य: सुलतान की अद्भुत चाल और सुंदरता देखकर डाकू खड्गसिंह के हृदय पर साँप लोटने लगा।
(ग) लट्टू होना (मुग्ध होना / अत्यधिक आकर्षित होना):
वाक्य: बाबा भारती अपने घोड़े सुलतान की मनमोहक चाल पर लट्टू थे।
(घ) आँखों में चमक आना (अत्यधिक प्रसन्नता होना):
वाक्य: सुबह अस्तबल में सुलतान को सुरक्षित खड़ा देखकर बाबा भारती की आँखों में चमक आ गई।
प्रत्येक मुहावरे का सही अर्थ 0.5 अंक; शुद्ध वाक्य प्रयोग 0.5 अंक (कुल 4 अंक)।
प्रश्न: (अ) संधि-विच्छेद कीजिए:
सज्जन, निश्चल, संतोष, दुर्लभ।
(ब) विलोम शब्द लिखिए:
सावधान, अधीर, स्वीकार, विश्वास।
(अ) संधि-विच्छेद:
- सज्जन = सत् + जन (व्यंजन संधि)
- निश्चल = निः + चल (विसर्ग संधि)
- संतोष = सम् + तोष (व्यंजन संधि)
- दुर्लभ = दुः + लभ (विसर्ग संधि)
(ब) विलोम शब्द:
- सावधान × असावधान
- अधीर × धीर
- स्वीकार × अस्वीकार
- विश्वास × अविश्वास
प्रत्येक सही उत्तर पर 0.5 अंक (कुल 4 अंक)।
प्रश्न: "सच्चा संत वह है जो अपने नुकसान में भी पूरे समाज की भलाई की चिंता करे।" बाबा भारती के चरित्र के आधार पर इस कथन की समीक्षा कीजिए तथा वर्तमान समाज में इस मूल्य की प्रासंगिकता बताइए।
समीक्षा एवं मूल्यांकन:
- निस्वार्थ परोपकार: साधारण मनुष्य अपनी प्रिय वस्तु छिन जाने पर पुलिस, बदले या प्रतिशोध की बात सोचता है। परंतु बाबा भारती का हृदय इतना विशाल था कि वे अपने प्रिय घोड़े सुलतान के वियोग में तड़पने के बावजूद समाज के दीन-दुखियों की चिंता कर रहे थे।
- विश्वास की रक्षा: बाबा जानते थे कि समाज परस्पर विश्वास और करुणा की नींव पर टिका होता है। यदि दीन-दुखियों के प्रति लोगों का विश्वास टूट गया, तो मानवता संकट में पड़ जाएगी।
- वर्तमान प्रासंगिकता: आज के युग में जहाँ स्वार्थ, धोखाधड़ी और अविश्वास बढ़ रहा है, बाबा भारती का चरित्र हमें सिखाता है कि हमें क्षणिक लाभ के लिए मानवीय मूल्यों और परोपकार की भावना की बलि नहीं देनी चाहिए। सत्य और निस्वार्थ प्रेम में वह शक्ति है जो कठोर से कठोर हृदय को भी बदल सकती है।
चरित्र समीक्षा 2.5 अंक; वर्तमान प्रासंगिकता 2.5 अंक (कुल 5 अंक)।
पाठ 5: रहीम के दोहे (नीति-काव्य)
NCERT 'मल्हार' कक्षा 6 हिंदी — भक्तिकालीन नीतिकार रहीमदास | संपूर्ण पाठ्यपुस्तक प्रश्नोत्तर, दोहा भावार्थ, जीवन-मूल्य, भाषा की बात एवं योग्यता-आधारित प्रश्न | CBSE 2026-27
- रचयिता: अब्दुर्रहीम खानखाना 'रहीम' (अकबर के नवरत्नों में प्रमुख, संस्कृत, फारसी और अवधी/ब्रजभाषा के महान विद्वान एवं नीति-काव्य के मूर्धन्य कवि)।
- काव्य का स्वरूप एवं उद्देश्य: रहीम के दोहे व्यावहारिक जीवन, आचरण, लोक-व्यवहार, परोपकार और मानवीय संबंधों की अमूल्य पाठशाला हैं। सरल दृष्टांतों (सुई-तलवार, वृक्ष-सरोवर) के माध्यम से वे गहन जीवन-सत्य उद्घाटित करते हैं।
- पाठ में संकलित प्रमुख दोहे एवं उनका मूल भाव:
1. वाणी का संयम:
"रहिमन जिह्वा बावरी, कहि गइ सरग पताल।
आपु तो कहि भीतर रही, जूती खात कपाल॥"
2. छोटे-बड़े का महत्व:
"रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिये डारि।
जहाँ काम आवे सुई, कहा करे तलवारि॥"
3. परोपकार की महिमा:
"तरुवर फल नहिं खात है, सरवर पियहि न पान।
कहि रहीम पर काज हित, संपति सचहि सुजान॥"
4. प्रेम-संबंधों की मर्यादा:
"रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय।
टूटे पे फिर ना जुड़े, जुड़े गाँठ परि जाय॥"
5. आत्मसम्मान व जल का महत्व:
"रहिमन पानी राखिये, बिनु पानी सब सून।
पानी गये न ऊबरे, मोति, मानुस, चून॥" - कठिन शब्दार्थ:
- जिह्वा: जीभ, वाणी।
- बावरी: पगली, अविवेकी, अनियंत्रित।
- कपाल: सिर, मस्तक।
- लघु: छोटा, सामान्य।
- डारि: छोड़ देना, त्यागना, उपेक्षा करना।
- तरुवर / सरवर: श्रेष्ठ वृक्ष / पवित्र सरोवर (तालाब)।
- सुजान: सज्जन, ज्ञानी पुरुष।
- चटकाय: झटके से, क्रोधवश खींचकर।
- सून: शून्य, व्यर्थ, निरर्थक।
- ऊबरे: उबरना, महत्व पाना, अस्तित्व बचना।
प्रश्न: “रहिमन जिह्वा बावरी, कहि गइ सरग पताल। आपु तो कहि भीतर रही, जूती खात कपाल।” इस दोहे का भाव क्या है?
(क) सोच-समझकर बोलना चाहिए।
(ख) मधुर वाणी में बोलना चाहिए।
(ग) धीरे-धीरे बोलना चाहिए।
(घ) सदा सच बोलना चाहिए।
सटीक उत्तर: विकल्प (क) सोच-समझकर बोलना चाहिए।
व्याख्या व तार्किक कारण: रहीम जी कहते हैं कि जीभ बिना सोचे-समझे बहककर कुछ भी अनुचित या कटु बोल देती है और स्वयं मुँह के सुरक्षित भीतर छिप जाती है। परंतु उसके द्वारा बोले गए अपशब्दों का दंड बेचारे सिर को जूतियों की मार के रूप में भुगतना पड़ता है। अतः मनुष्य को सदा सोच-विचारकर ही बोलना चाहिए।
सही विकल्प चयन 1 अंक; व्यावहारिक विश्लेषण 1 अंक (कुल 2 अंक)।
प्रश्न: “रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिये डारि। जहाँ काम आवे सुई, कहा करे तलवारि।” इस दोहे का भाव क्या है?
(क) तलवार सुई से बड़ी होती है।
(ख) सुई का काम तलवार नहीं कर सकती।
(ग) तलवार का महत्व सुई से ज्यादा है।
(घ) हर छोटी-बड़ी चीज़ का अपना महत्व होता है।
सटीक उत्तर: विकल्प (घ) हर छोटी-बड़ी चीज़ का अपना महत्व होता है।
व्याख्या व तार्किक कारण: रहीम जी जीवन का शाश्वत सत्य प्रकट करते हुए समझाते हैं कि धनवानों, उच्च पदों या बड़ी वस्तुओं को पाकर हमें गरीबों, छोटे लोगों या छोटी वस्तुओं की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। कपड़े सिलने का बारीक काम केवल नन्हीं सुई ही कर सकती है, वहाँ विशाल और तीक्ष्ण तलवार सर्वथा व्यर्थ सिद्ध होती है।
सटीक विकल्प चयन 1 अंक; सुई-तलवार के दृष्टांत की व्याख्या 1 अंक (कुल 2 अंक)।
प्रश्न: "तरुवर फल नहिं खात है, सरवर पियहि न पान।" इस पंक्ति के माध्यम से रहीमदास जी ने सज्जनों की किस विशेषता पर प्रकाश डाला है?
इस दोहे के माध्यम से रहीम जी ने निस्वार्थ परोपकार की महत्ता बताई है:
- प्रकृति का निस्वार्थ त्याग: फलदार वृक्ष अपने मीठे फल कभी स्वयं नहीं खाते, और न ही सरोवर कभी अपना शीतल जल स्वयं पीता है। वे अपना सब कुछ संसार के कल्याण के लिए अर्पित कर देते हैं।
- सज्जनों का धन-संचय: इसी प्रकार, श्रेष्ठ और विवेकी मनुष्य जो धन या संपदा अर्जित करते हैं, उसका उद्देश्य केवल अपने भोग-विलास को पूरा करना नहीं होता, बल्कि समाज के दीन-दुखियों, पीड़ितों और परोपकारी कार्यों में सहायता करना होता है।
वृक्ष और सरोवर के उदाहरण का स्पष्टीकरण 1 अंक; सज्जनों के धन संचय का उद्देश्य 1 अंक (कुल 2 अंक)।
प्रश्न: "रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय। टूटे पे फिर ना जुड़े, जुड़े गाँठ परि जाय॥" इस दोहे का गहन व्यावहारिक आशय स्पष्ट कीजिए।
व्यावहारिक आशय:
कवि रहीम मानवीय संबंधों और आपसी विश्वास की तुलना एक कोमल धागे से करते हैं। वे सावधान करते हैं कि क्रोध, अहंकार या अविश्वास के वशीभूत होकर प्रेम के इस संवेदनशील धागे को कभी झटके से नहीं तोड़ना चाहिए।
धागे की उपमा का विश्लेषण 1.5 अंक; गाँठ पड़ने के मनोवैज्ञानिक प्रभाव का स्पष्टीकरण 1.5 अंक (कुल 3 अंक)।
प्रश्न: "रहिमन पानी राखिये, बिनु पानी सब सून। पानी गये न ऊबरे, मोति, मानुस, चून॥"
इस दोहे में 'पानी' शब्द के तीनों अलग-अलग अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा बताइए कि यह दोहा हिंदी साहित्य में इतना प्रसिद्ध क्यों है?
इस दोहे में रहीम जी ने श्लेष अलंकार का अद्भुत चमत्कार प्रस्तुत किया है, जहाँ 'पानी' शब्द के तीन अलग-अलग संदर्भों में तीन विशिष्ट अर्थ निकलते हैं:
सच्चे मोती का मूल्य उसकी चमकदार चमक (आब/पानी) के कारण ही होता है। यदि मोती की चमक चली जाए, तो वह केवल एक साधारण बेजान पत्थर बनकर रह जाता है, उसका कोई मूल्य नहीं रहता।
कहावत भी है—'आँखों का पानी मर जाना'। जिस मनुष्य के भीतर मान-मर्यादा, लज्जा और आत्मसम्मान समाप्त हो जाता है, वह जीवित होते हुए भी समाज में आदर खो बैठता है।
साधारण चूना हो या गेहूँ का आटा, बिना जल के वह गूँथा नहीं जा सकता और न ही उसका उपयोग खाद्य या निर्माण कार्य में हो सकता है। बिना जल के वह व्यर्थ चूर्ण मात्र है।
साहित्यिक महत्व: यह दोहा भाषा की लाघवता, एक ही शब्द से अनेक जीवन-सत्यों के उद्घाटन तथा सामाजिक व नैतिक चेतना जगाने के कारण हिंदी साहित्य का अमर दोहा माना जाता है।
तीनों संदर्भों (मोती, मानुष, चून) के सटीक अर्थ 3 अंक; श्लेष अलंकार व साहित्यिक महत्व 2 अंक (कुल 5 अंक)।
प्रश्न: (अ) दोहा छंद की विशेषताएँ लिखिए।
(ब) निम्नलिखित ब्रजभाषा/अवधी शब्दों के आधुनिक मानक हिंदी रूप लिखिए:
सरग, आपु, तरुवर, सरवर, सुजान, चटकाय, सून।
(अ) दोहा छंद की विशेषताएँ:
- दोहा एक अर्धसम मात्रिक छंद है जिसमें दो पंक्तियाँ (चार चरण) होती हैं।
- इसके पहले और तीसरे चरण (विषम चरण) में 13-13 मात्राएँ होती हैं।
- इसके दूसरे और चौथे चरण (सम चरण) में 11-11 मात्राएँ होती हैं। सम चरणों के अंत में तुक मिलती है।
(ब) मानक हिंदी रूप:
- सरग = स्वर्ग
- आपु = स्वयं, खुद
- तरुवर = श्रेष्ठ वृक्ष, पेड़
- सरवर = सरोवर, तालाब
- सुजान = सज्जन, ज्ञानी पुरुष
- चटकाय = झटके से, खींचकर
- सून = शून्य, सूना, व्यर्थ
दोहा छंद के लक्षण 1.5 अंक; सातों शब्दों के शुद्ध मानक रूप 2.5 अंक (कुल 4 अंक)।
प्रश्न: आजकल इंटरनेट और सोशल मीडिया के दौर में लोग बिना सोचे-समझे किसी पर भी अपमानजनक टिप्पणियाँ (Trolling/Hate Speech) कर देते हैं, जिससे अक्सर भारी कानूनी और सामाजिक विवाद खड़े हो जाते हैं।
रहीम के दोहे "रहिमन जिह्वा बावरी, कहि गइ सरग पताल..." के आधार पर बताइए कि आज के डिजिटल युग में यह सीख कितनी प्रासंगिक है?
समकालीन प्रासंगिकता एवं विश्लेषण:
- डिजिटल जीभ (कीबोर्ड और स्क्रीन): रहीम के समय में 'जिह्वा' वाणी का माध्यम थी, आज के युग में हमारा मोबाइल कीबोर्ड और सोशल मीडिया वही कार्य करते हैं। लोग बिना सोचे-समझे, आवेश में आकर अभद्र भाषा, भ्रामक सूचनाएँ या घृणास्पद टिप्पणियाँ पोस्ट कर देते हैं।
- अदृश्य रहकर विवाद खड़ा करना: जैसे जीभ अपशब्द कहकर तुरंत मुँह के भीतर छिप जाती है, वैसे ही इंटरनेट पर लोग छद्म नाम (Fake Accounts) के पीछे छिपकर दूसरों पर कीचड़ उछालते हैं।
- परिणाम का भुगताना: अंततः जब साइबर पुलिस और कानून कार्रवाई करता है, तो उन टिप्पणियों का खामियाजा पूरे परिवार, करियर और समाज में उस व्यक्ति के मान-सम्मान को भुगतना पड़ता है।
- निष्कर्ष: रहीम का यह दोहा हमें संदेश देता है कि चाहे वास्तविक बातचीत हो या डिजिटल संवाद, मनुष्य को सदा अपनी वाणी और अभिव्यक्ति पर संयम रखना चाहिए। बोलने या टाइप करने से पहले यह सोचना चाहिए कि हमारे शब्द समाज में सौहार्द फैला रहे हैं या कटुता।
समकालीन संदर्भ 2.5 अंक; दोहे के सिद्धांत का अनुप्रयोग 2.5 अंक (कुल 5 अंक)।
पाठ 6: मेरी माँ (आत्मकथा का अंश)
NCERT 'मल्हार' कक्षा 6 हिंदी — अमर शहीद पंडित रामप्रसाद 'बिस्मिल' | संपूर्ण पाठ्यपुस्तक प्रश्नोत्तर, मातृ-ऋण, देशभक्ति व पारिवारिक मूल्य, भाषा की बात एवं योग्यता-आधारित प्रश्न | CBSE 2026-27
- लेखक: अमर शहीद पंडित रामप्रसाद 'बिस्मिल' (काकोरी ट्रेन एक्शन के महान क्रांतिकारी नेता, अमर कवि एवं स्वतंत्रता सेनानी, जिन्हें गोरखपुर जेल में फाँसी दी गई थी)।
- विधा: आत्मकथा (Autobiography) — बिस्मिल जी ने फाँसी के फंदे पर झूलने से कुछ ही दिन पूर्व गोरखपुर जेल की कालकोठरी में अपनी आत्मकथा लिखी थी।
- माताजी का अद्वितीय व्यक्तित्व व संघर्ष: बिस्मिल जी की माताजी का विवाह मात्र ग्यारह वर्ष की अल्पावस्था में अशिक्षित बालिका के रूप में हुआ था। शाहजहाँपुर आने पर उन्होंने गृहस्थी का सारा काम सँभाला और अपनी दादी सास व परिजनों के सहयोग से स्वयं पढ़ना-लिखना सीखा। थोड़े ही समय में वे हिंदी की श्रेष्ठ पुस्तकें पढ़ने लगीं।
- क्रांतिकारी जीवन में माँ की प्रेरणा: जब बिस्मिल जी क्रांतिकारी दल में सम्मिलित हुए, तो उनके पिता और दादाजी इसके घोर विरोधी थे। परंतु उनकी माताजी ने सदैव उनका मनोबल बढ़ाया, उन्हें आर्थिक सहायता दी और उनके देशभक्ति के मार्ग में कभी बाधा नहीं बनने दीं।
- माँ का सर्वोच्च आदेश (अहिंसा का पाठ): माताजी ने बिस्मिल जी से एक पावन वचन लिया था—"चाहे तुम्हारा घोर शत्रु ही क्यों न हो, कभी किसी के प्राण मत लेना।" बिस्मिल जी ने जीवन भर अपनी माँ के इस आदेश का अक्षरशः पालन किया।
- अंतिम आकांक्षा: बिस्मिल जी कहते हैं कि संसार में यदि किसी भी वस्तु से मातृ-ऋण चुकाया जा सकता, तो वे अवश्य चुकाते। किंतु वे मातृभूमि की बलिवेदी पर प्राण न्योछावर कर रहे हैं। उनकी केवल एक तड़प है कि वे अपनी माँ के चरणों की जीवनपर्यंत सेवा नहीं कर सके। वे ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि अंतिम समय में भी उनका हृदय विचलित न हो और वे हँसते-हँसते फाँसी के फंदे को चूम लें।
प्रश्न: 'किंतु यह इच्छा पूर्ण होती नहीं दिखाई देती।' बिस्मिल को अपनी किस इच्छा के पूर्ण न होने की आशंका थी?
(क) भारत माता के साथ रहने की
(ख) अपनी प्रतिज्ञा पर दृढ़ रहने की
(ग) अपनी माँ की जीवनपर्यंत सेवा करने की
(घ) भोग-विलास तथा ऐश्वर्य भोगने की
सटीक उत्तर: विकल्प (ग) अपनी माँ की जीवनपर्यंत सेवा करने की
व्याख्या व तार्किक कारण: बिस्मिल जी की सबसे प्रगाढ़ लालसा थी कि वे अपने हाथों से जीवन भर अपनी पूज्य माताजी की चरण सेवा करें। परंतु उन्हें ब्रिटिश सरकार द्वारा मृत्युदंड (फाँसी) सुना दिया गया था, इसलिए वे जानते थे कि अब उनका जीवन समाप्त होने वाला है और यह इच्छा अधूरी ही रह जाएगी।
सही विकल्प चयन 1 अंक; संदर्भ की सटीक व्याख्या 1 अंक (कुल 2 अंक)।
प्रश्न: रामप्रसाद बिस्मिल की माँ का सबसे बड़ा आदेश क्या था?
(क) देश की सेवा करें
(ख) कभी किसी के प्राण न लेना
(ग) कभी किसी से छल न करना
(घ) सदा सच बोलना
सटीक उत्तर: विकल्प (ख) कभी किसी के प्राण न लेना
व्याख्या व तार्किक कारण: यद्यपि बिस्मिल जी सशस्त्र क्रांतिकारी आंदोलन से जुड़े थे, जहाँ हथियारों का प्रयोग होता था, परंतु उनकी माँ ने उनसे स्पष्ट वचन लिया था कि उनका उद्देश्य स्वतंत्रता प्राप्त करना होना चाहिए, किसी निर्दोष या शत्रु की हत्या करना नहीं। बिस्मिल जी ने अपनी माँ के इस अहिंसक आदेश को सदा शिरोधार्य रखा।
सही विकल्प चयन 1 अंक; नैतिक परिप्रेक्ष्य का उल्लेख 1 अंक (कुल 2 अंक)।
प्रश्न: बिस्मिल जी की माताजी ने विवाह के बाद पढ़ना-लिखना किस प्रकार सीखा? उनके इस प्रयास से हमें क्या प्रेरणा मिलती है?
साक्षर बनने का प्रयास: जब बिस्मिल जी की माताजी का विवाह हुआ, तब वे बिल्कुल अनपढ़ थीं। शाहजहाँपुर आने पर उन्होंने गृहकार्य से जो भी थोड़ा समय मिलता, उसमें मोहल्ले की सहेलियों और अपनी दादी सास की सहायता से देवनागरी वर्णमाला सीखी। अपने अथक परिश्रम और लगन से कुछ ही वर्षों में वे हिंदी की पुस्तकें और धार्मिक ग्रंथ सरलता से पढ़ने लगीं।
प्रेरणा: यह प्रसंग सिद्ध करता है कि सीखने की कोई उम्र या सीमा नहीं होती। यदि मन में सच्ची लगन और दृढ़ इच्छाशक्ति हो, तो विपरीत पारिवारिक परिस्थितियों में भी व्यक्ति ज्ञान अर्जित कर सकता है।
सीखने की प्रक्रिया का विवरण 1 अंक; जीवन प्रेरणा 1 अंक (कुल 2 अंक)।
प्रश्न: पिता और परिवार के विरोध के बावजूद बिस्मिल जी की माताजी ने उनके क्रांतिकारी जीवन का समर्थन किस प्रकार किया?
जब बिस्मिल जी आर्य समाज और बाद में सशस्त्र क्रांतिकारी दल में सक्रिय हुए, तो उनके पिता और दादाजी इसके घोर विरोधी थे। यहाँ तक कि पिता ने उन्हें घर से निकाल देने की धमकी भी दी थी। परंतु माताजी ने:
- सहानुभूति व मानसिक संबल: उन्होंने बिस्मिल जी के देशभक्ति के पवित्र विचारों को समझा और कभी उनके मार्ग में रुकावट नहीं डालीं।
- आर्थिक सहायता: जब क्रांतिकारी दल को धन की आवश्यकता पड़ी, तो माताजी ने अपने पास संचित धन देकर पुत्र की सहायता की।
- आशीर्वाद: उन्होंने पुत्र से कहा कि देशसेवा से बड़ा कोई धर्म नहीं है, बस अपने चरित्र और वचनों पर सदा अडिग रहना।
पारिवारिक विरोध का उल्लेख 1 अंक; माताजी के सहयोग के तीन बिंदु 2 अंक (कुल 3 अंक)।
प्रश्न: बिस्मिल जी ने अपनी माताजी के प्रति अपनी कृतज्ञता किन शब्दों में व्यक्त की है? फाँसी के फंदे पर झूलने से पहले उनकी ईश्वर से क्या अंतिम प्रार्थना थी?
मातृ-ऋण के प्रति कृतज्ञता:
बिस्मिल जी अत्यंत भावुक होकर लिखते हैं कि यदि वे अनेक जन्मों तक भी निरंतर प्रयत्न करें, तो भी अपनी पूज्य माताजी के उपकारों और ऋण से मुक्त नहीं हो सकते। उन्होंने कहा कि उनके जीवन में जो भी सत्य, साहस, स्वाभिमान, परोपकार और देशप्रेम के अंकुर फूटे हैं, वे सब उनकी माताजी की ही देन हैं। वे अपनी माँ को साक्षात् 'देवी' मानते हैं।
ईश्वर से अंतिम प्रार्थना:
कृतज्ञता का भावपूर्ण निरूपण 2.5 अंक; अंतिम प्रार्थना का सटीक वर्णन 2.5 अंक (कुल 5 अंक)।
प्रश्न: (अ) निम्नलिखित शब्दों से भाववाचक संज्ञा बनाइए:
माता, वीर, दास, गुरु, निज, अपना।
(ब) विलोम शब्द लिखिए:
इच्छा, पवित्र, स्वाधीनता, शत्रु।
(अ) भाववाचक संज्ञा निर्माण:
- माता → मातृत्व
- वीर → वीरता
- दास → दासता
- गुरु → गुरुत्व / गरिमा
- निज → निजत्व
- अपना → अपनापन / अपनत्व
(ब) विलोम शब्द:
- इच्छा × अनिच्छा
- पवित्र × अपवित्र
- स्वाधीनता × पराधीनता
- शत्रु × मित्र
प्रत्येक सही उत्तर पर 0.4 अंक (कुल 4 अंक)।
प्रश्न: "एक माँ केवल एक संतान को जन्म नहीं देती, बल्कि वह एक राष्ट्र के भविष्य का निर्माण करती है।" रामप्रसाद बिस्मिल के जीवन के आलोक में इस कथन की पुष्टि कीजिए।
विश्लेषण एवं पुष्टि:
- प्रथम पाठशाला परिवार: बच्चे के कोमल मस्तिष्क पर सबसे गहरा और अमिट प्रभाव उसकी माँ का पड़ता है। यदि बिस्मिल जी की माँ संकीर्ण सोच वाली होतीं, तो वे अपने इकलौते पुत्र को प्राण-संकट में डालने वाले स्वतंत्रता संग्राम में कभी न जाने देतीं।
- उच्च मानवीय संस्कारों का सिंचन: बिस्मिल जी की माँ ने उन्हें केवल बलवान नहीं बनाया, बल्कि उनके भीतर करुणा, अहिंसा ('शत्रु के भी प्राण न लेना') और उच्च नैतिक आचरण का संचार किया। इसी कारण बिस्मिल जी कभी भटके नहीं और उनका नाम इतिहास में स्वर्णाक्षरों में दर्ज हुआ।
- राष्ट्र निर्माण में योगदान: छत्रपति शिवाजी महाराज के निर्माण में माता जीजाबाई की और बिस्मिल जी के निर्माण में उनकी माताजी की जो भूमिका रही है, वह सिद्ध करती है कि संस्कारवान माताएँ ही देश को महापुरुष, वैज्ञानिक, समाज सुधारक और निष्ठावान नागरिक प्रदान करती हैं।
दार्शनिक विश्लेषण 2.5 अंक; बिस्मिल जी के उदाहरण से पुष्टि 2.5 अंक (कुल 5 अंक)।
पाठ 7: जलाते चलो (कविता)
NCERT 'मल्हार' कक्षा 6 हिंदी — प्रसिद्ध कवि द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी | संपूर्ण पाठ्यपुस्तक प्रश्नोत्तर, काव्यांश व्याख्या, प्रकाश व तिमिर का रूपक, भाषा की बात एवं योग्यता-आधारित प्रश्न | CBSE 2026-27
- रचयिता: द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी (उत्साह, नवजागरण और बाल-किशोर चेतना के प्रेरक कवि)।
- काव्य का सार एवं केंद्रीय संदेश: 'जलाते चलो' एक अत्यंत ओजस्वी और आशावादी कविता है। यह कविता समाज से अज्ञान, अंधविश्वास, निराशा, वैमनस्य और बुराई के घने अंधकार को मिटाने के लिए निरंतर प्रेम, ज्ञान और भलाई के दीपक जलाते रहने का आह्वान करती है।
- मूल काव्यांश (स्मरणार्थ):
"जलाते चलो ये दिये स्नेह भर-भर,
कभी तो धरा का तिमिर दूर होगा।
जला दीप पहला तुम्हीं ने तिमिर की,
चुनौती प्रथम बार स्वीकार की थी।
अंधेरी निशा में उषा मुसकाएगी,
कभी तो प्रभात का नव-नूर होगा॥" - प्रतीकात्मक अर्थ:
- दीपक: ज्ञान, प्रेम, आशा, सद्भाव और सत्कर्म का प्रतीक।
- स्नेह: दीपक का तेल तथा मन का निस्वार्थ प्रेम व आत्मीयता।
- तिमिर (अंधकार): अज्ञान, अशिक्षा, बुराई, निराशा और सामाजिक कुरीतियाँ।
- प्रभात / उषा: ज्ञानोदय, प्रगति, समानता और नवजागरण का सवेरा।
प्रश्न: निम्नलिखित में से कौन-सी बात इस कविता में मुख्य रूप से कही गई है?
(क) केवल अपने घर को प्रकाशित करना
(ख) भलाई के कार्य करते रहना
(ग) केवल उत्सवों पर दीप जलाना
(घ) अंधकार से डरकर रहना
सटीक उत्तर: विकल्प (ख) भलाई के कार्य करते रहना
व्याख्या: पूरी कविता में कवि ने 'दीपक जलाने' को प्रतीकात्मक रूप में भलाई, परोपकार, ज्ञान और सेवा के कार्यों से जोड़ा है। कवि का स्पष्ट संदेश है कि चाहे समाज में बुराई या अज्ञान का अंधकार कितना भी घना क्यों न हो, हमें निराश हुए बिना लगातार सत्कर्मों का प्रकाश फैलाते रहना चाहिए।
सही विकल्प चयन 1 अंक; प्रतीकात्मक अर्थ का स्पष्टीकरण 1 अंक (कुल 2 अंक)।
प्रश्न: “जला दीप पहला तुम्हीं ने तिमिर की, चुनौती प्रथम बार स्वीकार की थी” - यह वाक्य किससे कहा गया है?
(क) ईश्वर से
(ख) प्रकृति से
(ग) मनुष्यों से
(घ) वैज्ञानिकों से
सटीक उत्तर: विकल्प (ग) मनुष्यों से
व्याख्या: यह वाक्य संपूर्ण मानव जाति को संबोधित करके कहा गया है। जब सृष्टि के आरंभ में घोर अज्ञान और अंधकार छाया था, तब मनुष्य ने ही सबसे पहले अपनी बुद्धि, विवेक और साहस से अग्नि व प्रकाश की खोज करके अंधकार की चुनौती को स्वीकारा था।
सही विकल्प चयन 1 अंक; ऐतिहासिक-दार्शनिक संदर्भ 1 अंक (कुल 2 अंक)।
प्रश्न: कवि 'स्नेह भर-भर' दिये जलाने की बात क्यों कहता है? 'स्नेह' शब्द के दोनों अर्थों को स्पष्ट कीजिए।
यहाँ 'स्नेह' शब्द में सुंदर श्लेष अलंकार है जिसके दो अर्थ हैं:
- भौतिक अर्थ (तेल/घृत): दीपक को जलते रहने के लिए तेल की आवश्यकता होती है, बिना तेल के दीपक शीघ्र बुझ जाता है।
- लाक्षणिक/प्रतीकात्मक अर्थ (प्रेम और आत्मीयता): समाज के उपेक्षित, दुखी और निराश लोगों के जीवन में आशा का प्रकाश फैलाने के लिए हृदय में सच्चा प्रेम, करुणा और आत्मीयता होनी चाहिए। केवल दिखावे से नहीं, बल्कि निस्वार्थ प्रेम से किए गए सत्कर्म ही समाज के अज्ञान को दूर कर सकते हैं।
दोनों अर्थों (तेल और प्रेम) का स्पष्टीकरण 2 अंक (कुल 2 अंक)।
प्रश्न: "कभी तो धरा का तिमिर दूर होगा" पंक्ति में कवि का कौन-सा दृष्टिकोण प्रकट होता है? स्पष्ट कीजिए।
इस पंक्ति में कवि का अगाध आशावादी (Optimistic) और कर्मवादी दृष्टिकोण प्रकट होता है:
- कवि मानता है कि कोई भी रात इतनी लंबी नहीं होती जिसके बाद सवेरा न हो।
- भले ही आज समाज में कुरीतियाँ, अशिक्षा और द्वेष फैला हो, परंतु यदि हर मनुष्य अपने हिस्से का छोटा-सा प्रयास (दीपक) ईमानदारी से जारी रखे, तो एक दिन अवश्य इस धरती से सारा अंधकार समाप्त हो जाएगा और समता व सद्भाव का प्रभात खिलेगा।
आशावादी दृष्टिकोण का विश्लेषण 1.5 अंक; कर्म की निरंतरता पर विचार 1.5 अंक (कुल 3 अंक)।
प्रश्न: (अ) निम्नलिखित शब्दों के विलोम शब्द लिखिए:
तिमिर, प्रभात, निशा, स्वीकार, आदि।
(ब) कविता से तीन तुकांत (Rhyming) शब्द-युग्म चुनकर लिखिए।
(अ) विलोम शब्द:
- तिमिर × प्रकाश / आलोक
- प्रभात × संध्या
- निशा × दिवस
- स्वीकार × अस्वीकार
- आदि × अंत
(ब) तुकांत शब्द-युग्म:
- दूर होगा — नूर होगा
- भर-भर — डगर-डगर
- की थी — दी थी
पाँचों विलोम शब्द 2.5 अंक; तीनों तुकांत युग्म 1.5 अंक (कुल 4 अंक)।
प्रश्न: "अंधेरे को कोसने की बजाय एक दीया जलाना बेहतर है।" एक विद्यार्थी के रूप में आप अपने विद्यालय अथवा समाज से अज्ञान, अशिक्षा और गंदगी के अंधकार को दूर करने के लिए कौन-से तीन रचनात्मक कार्य कर सकते हैं?
तीन रचनात्मक एवं व्यावहारिक कार्य:
- प्रत्येक को साक्षर बनाना (ईच वन, टीच वन): अपने घर के सहायक कर्मचारियों, सुरक्षाकर्मियों या निर्धन बच्चों को प्रतिदिन आधा घंटा हिंदी पढ़ने-लिखने और बुनियादी अंकगणित सिखाने का संकल्प लेना। यह शिक्षा का वास्तविक दीपक जलाना है।
- पुस्तकालय संवर्धन (बुक बैंक): अपनी पुरानी पाठ्यपुस्तकें, कॉपियाँ और ज्ञानवर्धक कहानियों की किताबें एकत्र करके जरूरतमंद विद्यार्थियों को वितरित करना ताकि साधनों के अभाव में किसी की पढ़ाई न रुके।
- पर्यावरण व स्वच्छता की अलख: अपने विद्यालय और मोहल्ले में 'प्लास्टिक-मुक्त' और 'स्वच्छ भारत' अभियान चलाकर लोगों को कूड़ेदान के सही उपयोग के लिए प्रेरित करना और पेड़ लगाना।
निष्कर्ष: यदि प्रत्येक युवा यह समझ ले कि परिवर्तन की शुरुआत स्वयं से होती है, तो समाज का कोई भी कोना अंधकारमय नहीं रह सकता।
तीन व्यावहारिक उपायों का विश्लेषण 3.5 अंक; निष्कर्ष व भाषाई प्रवाह 1.5 अंक (कुल 5 अंक)।
पाठ 8: सत्रिया और बिहू नृत्य (निबंध)
NCERT 'मल्हार' कक्षा 6 हिंदी — प्रसिद्ध नृत्यांगना व लेखिका जया मेहता | संपूर्ण पाठ्यपुस्तक प्रश्नोत्तर, असमिया संस्कृति, शास्त्रीय व लोक नृत्य तुलना, भाषा की बात एवं योग्यता-आधारित प्रश्न | CBSE 2026-27
- लेखिका: जया मेहता (प्रसिद्ध ओडिसी नृत्यांगना, शोधकर्ता, शिक्षिका एवं 'नृत्य कथा' पुस्तक की रचयिता)।
- कथानक का ताना-बाना: इटली की सुप्रसिद्ध डॉक्यूमेंट्री फिल्म निर्माता एलेसेंड्रा को ब्रिटिश अकादमी से असम की समृद्ध नृत्य शैलियों पर वृत्तचित्र बनाने का प्रोजेक्ट मिला। वे अपनी 11 वर्षीया बेटी एंजेला के साथ असम आईं। असम में उनकी भेंट स्थानीय असमिया बालिका अनु और उसके परिवार से हुई। दोनों बच्चियाँ तुरंत सहेलियाँ बन गईं।
- सत्रिया नृत्य (शास्त्रीय नृत्य - Classical Dance):
- उत्पत्ति: 15वीं शताब्दी में महान वैष्णव संत और समाज-सुधारक श्रीमंत शंकरदेव द्वारा असम के वैष्णव मठों (सत्रों) में इस भक्तिपरक नृत्य शैली की स्थापना की गई थी।
- विशेषताएँ: यह मूलतः सत्रों के युवा साधुओं (भकतों) द्वारा प्रस्तुत किया जाने वाला आध्यात्मिक नृत्य है। इसमें भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं का मंचन होता है। संगीत में 'खोल' (मृदंग जैसा ताल वाद्य), करताल और शंकरदेव रचित 'बोरगीत' का प्रयोग होता है।
- मान्यता: वर्ष 2000 में संगीत नाटक अकादमी द्वारा सत्रिया को भारत के आठ प्रमुख शास्त्रीय नृत्यों में आधिकारिक रूप से मान्यता दी गई।
- बिहू नृत्य (लोक नृत्य - Folk Dance):
- प्रकृति: असम का सबसे लोकप्रिय, प्राणवान और आनंदमयी लोक नृत्य, जो ऋतु चक्र, कृषि उत्सव और नए वर्ष (बोहाग/रोंगाली बिहू) के आगमन पर मनाया जाता है।
- वेशभूषा एवं वाद्य यंत्र: युवक-युवतियाँ पारंपरिक असमिया रेशमी वस्त्र (मेखला चादोर) पहनकर तीव्र गति से थिरकते हैं। इसमें बजने वाले प्रमुख वाद्य यंत्र हैं—ढोल, पेपा (भैंस के सींग से बनी तीखी आवाज वाली बांसुरी), गोगोना (बांस का बना वाद्य) और टोका।
प्रश्न: माँ एलेसेंड्रा के बारे में कौन-सा कथन सत्य है?
(क) वे असम के जीवन के बारे में बहुत कुछ जानती थीं।
(ख) उन्हें असम, बिहू और सत्रिया नृत्य से बहुत प्रेम था।
(ग) उन्होंने एंजेला को कुछ असमिया शब्द भी सिखाए।
(घ) वे अपने कार्य में सहायता के लिए बेटी को लाई थीं।
सटीक उत्तर: विकल्प (क) वे असम के जीवन के बारे में बहुत कुछ जानती थीं।
व्याख्या: एलेसेंड्रा एक गंभीर वृत्तचित्र (Documentary) शोधकर्ता थीं। भारत आने से पहले ही उन्होंने ब्रिटिश अकादमी के प्रोजेक्ट के तहत असम के इतिहास, संस्कृति, वैष्णव मठों और नृत्य परंपराओं का गहन अध्ययन कर लिया था, जिससे वे असमिया जीवन के बारे में भली-भाँति परिचित थीं।
सही विकल्प चयन 1 अंक; शोधकर्ता के संदर्भ का उल्लेख 1 अंक (कुल 2 अंक)।
प्रश्न: "अनु और एंजेला ने तुरंत एक-दूसरे की तरफ़ देखा।" दोनों के बीच इस तात्कालिक खिंचाव का मुख्य कारण क्या था?
(क) दोनों एक ही भाषा बोलती थीं।
(ख) दोनों की आयु एक समान (11 वर्ष) थी।
(ग) दोनों नृत्यांगना बनना चाहती थीं।
(घ) दोनों पहले से एक-दूसरे को जानती थीं।
सटीक उत्तर: विकल्प (ख) दोनों की आयु एक समान (11 वर्ष) थी।
व्याख्या: अलग-अलग देशों और संस्कृतियों से होने के बावजूद हमउम्र बच्चे एक-दूसरे की आँखों में सहज अपनत्व और मित्रता की चमक तुरंत पहचान लेते हैं। 11 वर्ष की होने के कारण अनु और एंजेला में बिना किसी संकोच के तुरंत मित्रता हो गई।
सही विकल्प चयन 1 अंक; बाल-मनोविज्ञान का विश्लेषण 1 अंक (कुल 2 अंक)।
प्रश्न: सत्रिया नृत्य और बिहू नृत्य में क्या मूलभूत अंतर है? संक्षेप में तालिका बनाकर स्पष्ट कीजिए।
सत्रिया और बिहू नृत्य की तुलनात्मक तालिका:
| तुलना का आधार | सत्रिया नृत्य | बिहू नृत्य |
|---|---|---|
| 1. स्वरूप / श्रेणी | शास्त्रीय नृत्य (Classical) | लोक नृत्य (Folk Dance) |
| 2. मूल भाव | आध्यात्मिक, शांत, कृष्ण भक्ति | उल्लास, आनंद, ऋतु-कृषि चक्र |
| 3. प्रस्तुति स्थल | वैष्णव मठ (सत्र) व मंदिर रंगशाला | खुले खेत, मैदान व गाँव के आँगन |
| 4. प्रमुख वाद्य | खोल (मृदंग) व करताल | ढोल, पेपा (सींग), गोगोना, टोका |
चारों अंतरों के सटीक निरूपण पर 0.5 अंक प्रति बिंदु (कुल 2 अंक)।
प्रश्न: श्रीमंत शंकरदेव कौन थे और असमिया समाज व संस्कृति में उनका क्या योगदान है?
श्रीमंत शंकरदेव (1449–1568): वे असम के महान संत, कवि, नाटककार, समाज-सुधारक और वैष्णव भक्ति आंदोलन के प्रणेता थे।
सांस्कृतिक योगदान:
- उन्होंने असम में 'एकशरण नामधर्म' की स्थापना की और जाति-पाति के भेदभाव को समाप्त कर सामाजिक समरसता की नींव रखी।
- उन्होंने प्रार्थना और धार्मिक विमर्श के लिए 'सत्रों' (मठों) और 'नामघरों' की स्थापना की, जो आज भी असम के सामाजिक जीवन के केंद्र हैं।
- उन्होंने 'अंकिया नाट' (धार्मिक नाटक), 'बोरगीत' और 'सत्रिया नृत्य' का सृजन किया, जिसने असमिया कला को विश्व स्तरीय पहचान दिलाई।
शंकरदेव का परिचय 1 अंक; तीनों सांस्कृतिक योगदान 2 अंक (कुल 3 अंक)।
प्रश्न: बिहू नृत्य में संगीत और गति उत्पन्न करने वाले प्रमुख पारंपरिक वाद्य यंत्रों (ढोल, पेपा, गोगोना) का वर्णन कीजिए।
चारों वाद्य यंत्रों का सटीक सचित्र वर्णन (प्रत्येक पर 0.75 अंक) कुल 3 अंक।
प्रश्न: नीचे दिए गए शब्द-युग्मों में से विशेषण और विशेष्य अलग कीजिए तथा किन्हीं दो का वाक्यों में प्रयोग कीजिए:
(क) शास्त्रीय नृत्य (ख) युवा साधु (ग) विदेशी मेहमान (घ) पावन मठ
विशेषण और विशेष्य तालिका:
- शास्त्रीय नृत्य → विशेषण: शास्त्रीय | विशेष्य: नृत्य
- युवा साधु → विशेषण: युवा | विशेष्य: साधु
- विदेशी मेहमान → विशेषण: विदेशी | विशेष्य: मेहमान
- पावन मठ → विशेषण: पावन | विशेष्य: मठ
वाक्य प्रयोग:
- शास्त्रीय नृत्य: सत्रिया असम का विश्वविख्यात शास्त्रीय नृत्य है।
- विदेशी मेहमान: भारतीय संस्कृति में विदेशी मेहमानों का सत्कार 'अतिथि देवो भव' की भावना से किया जाता है।
विशेषण-विशेष्य पृथक्करण 2 अंक; दोनों वाक्य प्रयोग 1 अंक (कुल 3 अंक)।
प्रश्न: एलेसेंड्रा जैसी विदेशी फिल्मकार का भारत आकर असम के नृत्यों पर डॉक्यूमेंट्री बनाना क्या दर्शाता है? भारतीय लोक एवं शास्त्रीय कलाएँ किस प्रकार 'वसुधैव कुटुंबकम्' और 'एक भारत, श्रेष्ठ भारत' की भावना को साकार करती हैं?
विश्लेषण एवं मूल्यांकन:
- वैश्विक आकर्षण एवं सांस्कृतिक गहराई: एलेसेंड्रा का असम आना यह दर्शाता है कि भारत की पारंपरिक कलाएँ केवल मनोरंजन का साधन नहीं हैं, बल्कि वे आध्यात्मिक दर्शन, प्रकृति-प्रेम और सदियों पुरानी समृद्ध विरासत का दर्पण हैं। दुनिया भर के कला प्रेमी भारतीय संस्कृति की गहराई का सम्मान करते हैं।
- 'एक भारत, श्रेष्ठ भारत': भारत के विभिन्न राज्यों—उत्तर में कथक, दक्षिण में भरतनाट्यम व कथकली, पूर्व में ओडिसी व सत्रिया, और पश्चिम में गरबा—की अपनी अनूठी शैलियाँ हैं। परंतु इन सभी के मूल में भक्ति, प्रकृति व मानवता का एक ही सुर गूँजता है। यह विविधता हमारी कमजोरी नहीं, बल्कि हमारी सबसे बड़ी शक्ति है।
- 'वसुधैव कुटुंबकम्' की अनुभूति: जब इटली की एंजेला और असम की अनु एक साथ बिहू के गीतों पर थिरकती हैं, तो भाषा और भूगोल की सारी दीवारें गिर जाती हैं। कला संपूर्ण मानवता को एक सूत्र में पिरोने का सबसे सशक्त माध्यम है।
वैश्विक परिप्रेक्ष्य 2.5 अंक; राष्ट्रीय एकता व वैश्विक बंधुत्व का विश्लेषण 2.5 अंक (कुल 5 अंक)।
पाठ 9: मैया मैं नहिं माखन खायो (भक्ति पद)
NCERT 'मल्हार' कक्षा 6 हिंदी — वात्सल्य रस के सम्राट महाकवि सूरदास | संपूर्ण पाठ्यपुस्तक प्रश्नोत्तर, पद भावार्थ, बाल-लीला, भाषा की बात एवं योग्यता-आधारित प्रश्न | CBSE 2026-27
- रचयिता: महाकवि सूरदास (भक्तिकाल की कृष्णभक्ति शाखा के 'अष्टछाप' के सर्वोपरि कवि, जिन्हें 'वात्सल्य रस का सम्राट' कहा जाता है)।
- काव्य का स्वरूप एवं संदर्भ: बालक श्रीकृष्ण की मनोहारी माखन चोरी लीला और माँ यशोदा के सामने पकड़े जाने पर बाल-सुलभ भोले तर्कों का सजीव चित्रण। सूरदास जी ने माता और शिशु के बीच के सहज वात्सल्य रस की अमर सृष्टि की है।
- मूल पद (स्मरणार्थ):
"मैया मैं नहिं माखन खायो।
ख्याल परै ये सखा सबै मिलि मेरैं मुख लपटायो॥
देखि तुही छींके पर भाजन ऊँचे धरि लटकायो।
हौं जु कहत नान्हें कर अपने मैं कैसें करि पायो॥
मुख दधि पोंछि बुद्धि इक कीन्हीं दोना पीठि दुरायो।
डारि सांटि मुसुकाइ जसोदा स्यामहिं कंठ लगायो॥" - कठिन शब्दार्थ:
- ख्याल परै: मुझे ऐसा लगता है, मुझे संदेह है।
- सखा: मित्र, ग्वाल-बाल।
- छींको: रस्सियों की जाली का बना शिकहर (दूध-दही बिल्ली से बचाने हेतु ऊँचा लटकाया जाने वाला पात्र)।
- भाजन: मिट्टी या धातु का बर्तन (मटकी)।
- नान्हें कर: छोटे-छोटे हाथ।
- दुरायो: छिपा लिया (पीठ के पीछे)।
- सांटि: छड़ी, छोटी लाठी।
- कंठ लगायो: हृदय से लगा लिया, गले लगाया।
प्रश्न: "मैं माखन कैसे खा सकता हूँ?" इसके लिए श्रीकृष्ण ने माँ यशोदा के सामने क्या तर्क दिया?
(क) मुझे माखन बिल्कुल पसंद नहीं है।
(ख) मेरे छोटे-छोटे हाथ ऊँचे टंगे छींके तक कैसे जा सकते हैं?
(ग) सारा माखन तो ग्वाल-बाल खा गए।
(घ) बिल्ली ने मटकी फोड़ दी।
सटीक उत्तर: विकल्प (ख) मेरे छोटे-छोटे हाथ ऊँचे टंगे छींके तक कैसे जा सकते हैं?
व्याख्या व तार्किक कारण: श्रीकृष्ण अपनी माँ को निर्दोष सिद्ध करने के लिए अपनी शारीरिक सीमा का तर्क देते हैं कि छींका छत के पास बहुत ऊँचा लटका हुआ है और उनके हाथ नन्हे-नन्हे हैं, अतः वे वहाँ तक पहुँच ही नहीं सकते। यह उनका बाल-सुलभ और अत्यंत प्यारा बहाना है।
सही विकल्प चयन 1 अंक; बाल-तर्क का स्पष्टीकरण 1 अंक (कुल 2 अंक)।
प्रश्न: श्रीकृष्ण माँ के आने से पहले वास्तव में क्या कर रहे थे?
(क) गाय चरा रहे थे
(ख) माखन खा रहे थे
(ग) खेल रहे थे
(घ) सो रहे थे
सटीक उत्तर: विकल्प (ख) माखन खा रहे थे
व्याख्या: पद की पंक्तियों 'मुख दधि पोंछि बुद्धि इक कीन्हीं दोना पीठि दुरायो' से प्रत्यक्ष प्रमाणित होता है कि कान्हा वास्तव में मटकी से माखन चुराकर खा रहे थे और माँ को अचानक आता देखकर उन्होंने आनन-फानन में मुँह पोंछकर माखन का दोना पीठ के पीछे छिपा लिया था।
सही विकल्प चयन 1 अंक; पद की पंक्ति का प्रमाण 1 अंक (कुल 2 अंक)।
प्रश्न: श्रीकृष्ण ने अपने मुँह पर लगे माखन के लिए अपने ग्वाल-मित्रों पर क्या आरोप लगाया?
श्रीकृष्ण ने अपनी माँ यशोदा से भोला मुँह बनाकर कहा—"ख्याल परै ये सखा सबै मिलि मेरैं मुख लपटायो।"
अर्थात् हे मैया! मुझे ऐसा लगता है कि ये सारे ग्वाल-सखा मुझसे ईर्ष्या करते हैं। इन सबने मिलकर शरारत की है और मेरे मुँह पर जबरदस्ती माखन पोत दिया है ताकि तुम मुझे दोषी समझकर डाँटो और मारो!
तर्क का सटीक उल्लेख 1 अंक; बाल-सुलभ भाव की व्याख्या 1 अंक (कुल 2 अंक)।
प्रश्न: "डारि सांटि मुसुकाइ जसोदा स्यामहिं कंठ लगायो।" यशोदा जी का क्रोध अचानक वात्सल्य और ममता में क्यों बदल गया?
यशोदा जी हाथ में छड़ी लेकर श्रीकृष्ण को चोरी के लिए डाँटने आई थीं। परंतु जब उन्होंने देखा कि:
- बालक कृष्ण के मुँह पर अभी भी थोड़ा दही-माखन लगा हुआ है।
- वे बड़ी चतुराई से माखन का पत्ता (दोना) अपनी छोटी-सी पीठ के पीछे छिपाने का प्रयास कर रहे हैं।
- और अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से इतने भोले-भाले तर्क दे रहे हैं कि उनके सामने कोई भी कठोर नहीं रह सकता।
कान्हा की इस बाल-सुलभ मासूमियत, नटखटपन और चतुराई को देखकर माँ यशोदा का सारा क्रोध पल भर में पिघल गया। उनके होंठों पर ममता भरी मुस्कान आ गई, उन्होंने छड़ी फेंक दी और दौड़कर अपने लाडले को सीने से चिपका लिया।
क्रोध पिघलने के कारणों का विश्लेषण 1.5 अंक; वात्सल्य रस की व्याख्या 1.5 अंक (कुल 3 अंक)।
प्रश्न: पाठ के आधार पर निम्नलिखित शब्दों का उनके सही अर्थ/संदर्भ से मिलान कीजिए:
(1) पहर (2) लकुटि-कमरिया (3) बंसीवट (4) छींको (5) गवाल-बाल
सही मिलान तालिका:
- (1) पहर: समय मापने की प्राचीन भारतीय इकाई (लगभग 3 घंटे का एक पहर, दिन-रात में आठ पहर)।
- (2) लकुटि-कमरिया: गाय चराते समय ली जाने वाली छोटी लाठी और ओढ़ने वाला छोटा कंबल (कमली)।
- (3) बंसीवट: यमुना किनारे स्थित वट-वृक्ष (बरगद), जहाँ बैठकर कान्हा मुरली बजाते थे।
- (4) छींको: रस्सियों की जाली का बना शिकहर (दूध-दही रखने का ऊँचा पात्र)।
- (5) गवाल-बाल: गाय पालने वाले ग्वालों के बच्चे, श्रीकृष्ण के संगी-साथी।
पाँचों शब्दों का सही संदर्भ-मिलान (प्रत्येक पर 0.5 अंक) कुल 2.5 अंक।
प्रश्न: सूरदास जन्मांध (नेत्रहीन) कहे जाते हैं, फिर भी उन्होंने बाल-मनोविज्ञान का जैसा सूक्ष्म और प्रामाणिक चित्रण इस पद में किया है, वैसा संसार के किसी अन्य साहित्य में दुर्लभ है। पद की घटनाओं के आधार पर इस कथन की समीक्षा कीजिए।
समीक्षा एवं मनोवैज्ञानिक विश्लेषण:
- पकड़े जाने पर तुरंत बहाना बनाना: छोटा बच्चा जब कोई गलती या मीठी चोरी करते पकड़ा जाता है, तो वह तुरंत दूसरों (सखाओं) पर दोष मढ़ देता है। कृष्ण का कहना कि 'सखाओं ने मेरे मुँह पर लपटाया' बाल-प्रकृति की सबसे प्रामाणिक अभिव्यक्ति है।
- शारीरिक असहायता का सहारा लेना: 'नान्हें कर अपने मैं कैसें करि पायो'—बच्चे जानते हैं कि बड़ों के सामने अपनी छोटी उम्र और नन्हे आकार का हवाला देने पर बड़े पिघल जाते हैं।
- सबूत छिपाने की बाल-सुलभ चेष्टा: 'दोना पीठि दुरायो'—मुँह पर माखन लगा होने के बावजूद दोने को पीठ पीछे छिपाना यह दर्शाता है कि बच्चा सोचता है कि यदि हाथ की वस्तु छिप गई, तो चोरी छिप गई। यह बच्चों की निश्छल और मासूम सोच का शिखर है।
- निष्कर्ष: सूरदास जी ने बाह्य आँखों से नहीं, बल्कि अपने अंतर्मन की दिव्य प्रज्ञा से माँ और शिशु के मन की गहराइयों को देखा था। इसीलिए आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने कहा है—"सूर वात्सल्य का कोना-कोना झाँक आए हैं।"
बाल-मनोविज्ञान के तीन बिंदुओं की व्याख्या 3 अंक; सूरदास के वात्सल्य रस की समीक्षा 2 अंक (कुल 5 अंक)।
पाठ 10: परीक्षा (कहानी)
NCERT 'मल्हार' कक्षा 6 हिंदी — उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद | संपूर्ण पाठ्यपुस्तक प्रश्नोत्तर, दीवान पद की परीक्षा, परोपकार व चरित्र-चित्रण, भाषा की बात एवं योग्यता-आधारित प्रश्न | CBSE 2026-27
- कहानीकार: उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद (हिंदी कथा-साहित्य के युगप्रवर्तक, यथार्थवादी एवं मानवतावादी लेखक)।
- पृष्ठभूमि: देवगढ़ रियासत के वृद्ध, नीति-कुशल और अनुभवी दीवान सरदार सुजानसिंह ने वृद्धावस्था के कारण महाराज से सेवामुक्त होने की प्रार्थना की। महाराज ने इस शर्त पर त्यागपत्र स्वीकार किया कि सुजानसिंह को ही अपनी जगह रियासत के लिए एक योग्य नया दीवान चुनना होगा।
- उम्मीदवारों का जमावड़ा: देश भर से ग्रेजुएट, वकील और उच्च अधिकारी देवगढ़ पहुँचे। उम्मीदवारों को एक महीने तक देवगढ़ में रखा गया। सब लोग अपने दुर्गुणों को छिपाकर दिन-रात शिष्टाचार, धार्मिकता और विनम्रता का ढोंग कर रहे थे।
- कथानक का चरम बिंदु (नाले की परीक्षा):
- महीना पूरा होने से एक दिन पहले शाम को उम्मीदवार हॉकी खेलकर लौट रहे थे।
- रास्ते में नाले के गहरे कीचड़ में एक गरीब किसान की अनाज से भरी गाड़ी फँस गई थी। किसान बार-बार बैलों को मारता, पर पहिया और धँस जाता।
- सैकड़ों युवा, बलवान उम्मीदवार खिलाड़ी वहाँ से हँसते-मजाक उड़ाते गुजरे, लेकिन किसी ने उस गरीब किसान की सुध नहीं ली।
- तभी हॉकी खेलते समय पैर में चोट खाए पंडित जानकीनाथ वहाँ पहुँचे। किसान की करुण दशा देखकर वे अपनी पीड़ा और कीमती कपड़ों की परवाह किए बिना कीचड़ में उतरे, कमर कसी और पूरी ताकत लगाकर गाड़ी को नाले से बाहर निकाल दिया।
- रहस्योद्घाटन व परिणाम: वह किसान कोई और नहीं, बल्कि स्वयं वेश बदले हुए दीवान सुजानसिंह थे! अगले दिन दरबार में सुजानसिंह ने घोषणा की कि रियासत को ऐसा दीवान मिल गया है जिसके हृदय में साहस, आत्मबल, दया और परोपकार है। जो व्यक्ति एक अनजान किसान के लिए कीचड़ में उतर सकता है, वह कभी किसी गरीब प्रजा को सताने नहीं देगा। पंडित जानकीनाथ को दीवान पद सौंपा गया।
प्रश्न: महाराज ने दीवान सुजानसिंह को ही उनका उत्तराधिकारी चुनने का कार्य उनके किस गुण के कारण सौंपा?
(क) उदारता
(ख) सादगी
(ग) बल
(घ) नीतिकुशलता
सटीक उत्तर: विकल्प (घ) नीतिकुशलता
व्याख्या व तार्किक कारण: दीवान सुजानसिंह ने चालीस वर्षों तक रियासत की सेवा की थी। वे राजनीति, मनुष्य की परख और शासन की पेचीदगियों के मर्मज्ञ थे। महाराज जानते थे कि सुजानसिंह से बेहतर कोई भी व्यक्ति इंसान के असली चरित्र को पहचान नहीं सकता।
सही विकल्प चयन 1 अंक; नीतिकुशलता के संदर्भ का स्पष्टीकरण 1 अंक (कुल 2 अंक)।
प्रश्न: दीवान साहब द्वारा नौकरी छोड़ने के निश्चय का क्या कारण था?
(क) परमात्मा की याद
(ख) राज-काज सँभालने योग्य शक्ति न रहना
(ग) बदनामी का भय
(घ) चालीस वर्ष की नौकरी पूरी हो जाना
सटीक उत्तर: विकल्प (ख) राज-काज सँभालने योग्य शक्ति न रहना
व्याख्या व तार्किक कारण: पाठ में उल्लेख है कि दीवान साहब वृद्ध हो चले थे। वे जानते थे कि शासन कार्य में अत्यधिक मानसिक व शारीरिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है। यदि वृद्धावस्था के कारण राज-काज में कोई त्रुटि हो गई, तो जीवन भर की कमाई हुई प्रतिष्ठा पर धब्बा लग सकता है, इसलिए उन्होंने स्वेच्छा से पद त्याग का निश्चय किया।
सही विकल्प चयन 1 अंक; कारण का उल्लेख 1 अंक (कुल 2 अंक)।
प्रश्न: मुंशी प्रेमचंद ने इस कहानी का शीर्षक 'परीक्षा' क्यों रखा होगा? कारण सहित स्पष्ट कीजिए।
इस कहानी का नाम 'परीक्षा' इसलिए रखा गया है क्योंकि पूरी कहानी देवगढ़ रियासत के भावी दीवान के चुनाव हेतु आयोजित एक अत्यंत गुप्त, मनोवैज्ञानिक और व्यावहारिक परीक्षा के इर्द-गिर्द घूमती है:
- यह परीक्षा कागज़-कलम या विश्वविद्यालय की डिग्री की नहीं थी, बल्कि मनुष्य के आंतरिक चरित्र, दया, साहस, आत्मबल और परोपकार की परीक्षा थी।
- दीवान सुजानसिंह ने नाले में फँसे किसान का स्वाँग रचकर उम्मीदवारों की वास्तविक संवेदनाओं की परीक्षा ली, जिसमें केवल जानकीनाथ उत्तीर्ण हुए। अतः यह शीर्षक सर्वथा उपयुक्त और सटीक है।
शीर्षक के औचित्य का विश्लेषण 1.5 अंक; व्यावहारिक परीक्षा के संदर्भ का उल्लेख 1.5 अंक (कुल 3 अंक)।
प्रश्न: दीवान सुजानसिंह ने पंडित जानकीनाथ को ही दीवान पद के लिए क्यों चुना? दरबार में उन्होंने क्या तर्क दिया?
दरबार में दीवान सुजानसिंह ने जानकीनाथ का चयन करते हुए निम्नलिखित अकाट्य तर्क दिए:
उन्होंने स्पष्ट किया कि विद्या और बुद्धिमत्ता आवश्यक है, परंतु दया और मानवीय संवेदना के बिना उच्च पद पर बैठा व्यक्ति अत्याचारी बन जाता है।
सुजानसिंह के तर्क 1.5 अंक; जानकीनाथ के मानवीय गुणों का उल्लेख 1.5 अंक (कुल 3 अंक)।
प्रश्न: कहानी 'परीक्षा' के आधार पर दीवान सुजानसिंह के चरित्र की मुख्य विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
दीवान सुजानसिंह एक अत्यंत अनुभवी, निष्ठावान और दूरदर्शी प्रशासक थे। उनके चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
- कर्तव्यपरायणता एवं स्वाभिमान: उन्होंने चालीस वर्षों तक पूरी ईमानदारी से रियासत की सेवा की। जब उन्हें लगा कि वृद्धावस्था के कारण वे न्याय नहीं कर पा रहे हैं, तो उन्होंने किसी लोभ के बिना पद छोड़ने का साहस दिखाया।
- मनुष्य के पारखी (अद्भुत मनोवैज्ञानिक समझ): वे जानते थे कि औपचारिक साक्षात्कारों में लोग केवल अच्छाई का ढोंग करते हैं। मनुष्य के वास्तविक चरित्र की पहचान केवल संकट और आकस्मिक विपत्ति के समय ही हो सकती है।
- कठोर एवं निष्पक्ष परीक्षक: उन्होंने स्वयं किसान का वेश धरकर कीचड़ में गाड़ी फँसाने की जो योजना बनाई, वह उनकी कुशाग्र बुद्धि और निष्पक्षता का परिचायक है। उन्होंने किसी सिफारिश या डिग्रियों के आधार पर नहीं, बल्कि शुद्ध कर्म के आधार पर निर्णय लिया।
चरित्रगत विशेषताओं का विस्तृत निरूपण (प्रत्येक बिंदु 1.5 अंक) 4.5 अंक; निष्कर्ष 0.5 अंक (कुल 5 अंक)।
प्रश्न: निम्नलिखित मुहावरों के अर्थ लिखकर वाक्यों में प्रयोग कीजिए:
(क) आँखों में धूल झोंकना (ख) मुँह ताकना (ग) हाथ-पैर मारना (घ) रंग फीका पड़ना
(क) आँखों में धूल झोंकना (धोखा देना):
वाक्य: ढोंगी उम्मीदवार दीवान साहब की आँखों में धूल झोंकने का असफल प्रयास कर रहे थे।
(ख) मुँह ताकना (मदद के लिए लाचार होकर देखना):
वाक्य: कीचड़ में गाड़ी फँस जाने पर गरीब किसान लाचारी से आने-जाने वालों का मुँह ताक रहा था।
(ग) हाथ-पैर मारना (कठिन प्रयास करना):
वाक्य: किसान ने बैलों को हाँककर गाड़ी निकालने के लिए बहुत हाथ-पैर मारे, पर पहिया और धँस गया।
(घ) रंग फीका पड़ना (प्रभाव समाप्त होना / लज्जित होना):
वाक्य: जानकीनाथ के चयन की घोषणा सुनते ही घमंडी उम्मीदवारों का रंग फीका पड़ गया।
प्रत्येक मुहावरे का सही अर्थ 0.5 अंक; शुद्ध वाक्य प्रयोग 0.5 अंक (कुल 4 अंक)।
प्रश्न: आज के समय में प्रशासनिक सेवाओं (IAS/IPS) तथा उच्च पदों के लिए साक्षात्कार में उम्मीदवारों के 'भावनात्मक बुद्धिमत्ता' (Emotional Intelligence) और 'सहानुभूति' (Empathy) का परीक्षण क्यों किया जाता है? प्रेमचंद की कहानी 'परीक्षा' के संदर्भ में समझाइए।
विश्लेषण एवं समकालीन प्रशासनिक प्रासंगिकता:
- केवल बौद्धिक योग्यता पर्याप्त नहीं: एक प्रशासक के पास यदि अनेक बड़ी डिग्रियाँ हों परंतु आम जनता के दुख-दर्द के प्रति संवेदनशीलता न हो, तो वह एक संवेदनहीन, भ्रष्ट या अहंकारी अफसर बन जाता है जो जनता की समस्याओं की अनदेखी करता है।
- सच्ची सेवा भावना: प्रेमचंद ने सौ वर्ष पहले ही यह संदेश दे दिया था कि जिस व्यक्ति में संकट में पड़े असहाय व्यक्ति की मदद करने का साहस और करुणा नहीं है, वह कभी एक अच्छा प्रशासक नहीं हो सकता।
- नैतिक नेतृत्व: जानकीनाथ का उदाहरण सिद्ध करता है कि वास्तविक नेतृत्व वह है जो स्वयं कीचड़ में उतरकर समस्याओं का समाधान करे, न कि केवल दूर खड़े होकर आदेश दे। इसलिए आज भी संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) और कॉरपोरेट जगत में सत्यनिष्ठा और सहानुभूति को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती है।
भावनात्मक बुद्धिमत्ता का विश्लेषण 2.5 अंक; कहानी के संदर्भ से समकालीन तुलना 2.5 अंक (कुल 5 अंक)।
पाठ 11: चेतक की वीरता (वीर रस कविता)
NCERT 'मल्हार' कक्षा 6 हिंदी — ओजस्वी कवि श्याम नारायण पाण्डेय | संपूर्ण पाठ्यपुस्तक प्रश्नोत्तर, काव्यांश व्याख्या, अतिशयोक्ति अलंकार, भाषा की बात एवं योग्यता-आधारित प्रश्न | CBSE 2026-27
- रचयिता: वीर रस के अमर कवि श्याम नारायण पाण्डेय (प्रसिद्ध महाकाव्य 'हल्दीघाटी' और 'जौहर' के रचनाकार)।
- ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: 18 जून 1576 का विश्वप्रसिद्ध हल्दीघाटी का युद्ध, जहाँ मेवाड़ के वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप ने मुग़ल सम्राट अकबर की विशाल सेना का मुकाबला किया था। इस महासमर में महाराणा प्रताप के स्वामीभक्त और पराक्रमी घोड़े 'चेतक' ने अपने अद्भुत युद्ध-कौशल और प्राणोत्सर्ग से इतिहास में अमर स्थान प्राप्त किया।
- मूल काव्यांश (स्मरणार्थ):
"रण बीच चौकड़ी भर-भर कर, चेतक बन गया निराला था।
राणाप्रताप के घोड़े से, पड़ गया हवा का पाला था॥
गिरता न कभी चेतक तन पर, राणाप्रताप का कोड़ा था।
वह दौड़ रहा अरि-मस्तक पर, या आसमान पर घोड़ा था॥
कौशल दिखलाया चालों में, उड़ गया भयानक भालों में।
निर्भीक गया वह ढालों में, सरपट दौड़ा करवालों में॥" - कठिन शब्दार्थ:
- चौकड़ी भरना: कुलाँचे मारना, तीव्र छलाँगें लगाना।
- हवा का पाला पड़ना: हवा से भी तेज गति से दौड़ना, वायुवेग।
- अरि-मस्तक: शत्रुओं के सिर (शत्रु सेना के हाथियों और सैनिकों के ऊपर)।
- करवाल: तलवार, खड्ग।
- निराला: अद्वितीय, अनोखा, अतुलनीय।
- वज्रपात: बिजली की तरह भीषण आघात।
प्रश्न: चेतक शत्रुओं की सेना पर किस प्रकार टूट पड़ता था?
(क) दबे पाँव धीरे-धीरे
(ख) आकाश से गिरती बिजली (वज्रपात) की तरह
(ग) केवल रक्षात्मक रूप में
(घ) दूर से चक्कर काटकर
सटीक उत्तर: विकल्प (ख) आकाश से गिरती बिजली (वज्रपात) की तरह
व्याख्या व तार्किक कारण: कविता में कहा गया है कि चेतक जब रणभूमि में कूदता था, तो वह शत्रु सेना के सिरों पर बिजली की गति से वज्र बनकर टूट पड़ता था। उसकी छलाँग इतनी भयानक और तीव्र होती थी कि विपक्षी सैनिकों को संभलने का अवसर ही नहीं मिलता था।
सही विकल्प चयन 1 अंक; वीर रस के भाव का स्पष्टीकरण 1 अंक (कुल 2 अंक)।
प्रश्न: "लेकर सवार उड़ जाता था।" इस पंक्ति में 'सवार' शब्द किसके लिए आया है?
(क) मानसिंह के लिए
(ख) महाराणा प्रताप के लिए
(ग) अकबर के सेनापति के लिए
(घ) चेतक के रक्षक के लिए
सटीक उत्तर: विकल्प (ख) महाराणा प्रताप के लिए
व्याख्या: चेतक मेवाड़ के वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप का अत्यंत प्रिय घोड़ा था। वह अपने वीर सवार (राणा प्रताप) को पीठ पर बैठाकर युद्ध के मैदान में इतनी फुर्ती से दौड़ता था मानो हवा में उड़ रहा हो।
सही विकल्प चयन 1 अंक; ऐतिहासिक संदर्भ का उल्लेख 1 अंक (कुल 2 अंक)।
प्रश्न: "गिरता न कभी चेतक तन पर, राणाप्रताप का कोड़ा था।" इस पंक्ति का क्या आशय है?
घोड़े को तेज दौड़ाने के लिए साधारणतः सवार को कोड़ा मारना पड़ता है। परंतु चेतक इतना चतुर, संवेदनशील और स्वामीभक्त घोड़ा था कि:
- उसे राणा प्रताप के मन का संकेत और आँख की पलक झपकाने का इशारा पहले ही समझ आ जाता था।
- राणा प्रताप के सोचने से पहले ही चेतक मुड़ जाता था या छलाँग लगा देता था। इसलिए राणा प्रताप को अपने पूरे जीवन में चेतक के शरीर पर कभी कोड़ा चलाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ी।
घोड़े की संवेदनशीलता व समझ का उल्लेख 1 अंक; स्वामीभक्ति का संदर्भ 1 अंक (कुल 2 अंक)।
प्रश्न: "राणाप्रताप के घोड़े से, पड़ गया हवा का पाला था।" इस पंक्ति में प्रयुक्त मुहावरे का अर्थ और काव्य-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
मुहावरे का अर्थ: 'हवा का पाला पड़ना' का अर्थ है—हवा से भी तेज गति से दौड़ना अथवा वायु से प्रतिस्पर्धा करना।
काव्य-सौंदर्य:
- अतिशयोक्ति अलंकार: कवि ने चेतक की तीव्र गति का वर्णन करने के लिए अतिशयोक्ति अलंकार का अत्यंत सुंदर प्रयोग किया है। ऐसा प्रतीत होता है मानो हवा और चेतक के बीच आगे निकलने की होड़ लगी हो और चेतक हवा को भी पीछे छोड़ रहा हो।
- वीर रस का ओज: पंक्ति में ओज गुण और द्रुत गति की लय है, जिससे पाठक के मन में युद्ध के मैदान का सजीव दृश्य उपस्थित हो जाता है।
मुहावरे का अर्थ 1 अंक; अतिशयोक्ति अलंकार व वीर रस का सौंदर्य 2 अंक (कुल 3 अंक)।
प्रश्न: हल्दीघाटी के युद्ध में चेतक की स्वामीभक्ति और बलिदान का वर्णन कीजिए। वह आज भी इतिहास में क्यों अमर है?
ऐतिहासिक घटना एवं बलिदान:
अमरत्व का कारण: चेतक केवल एक पशु नहीं था, वह स्वामिभक्ति, राष्ट्रप्रेम, साहस और निष्ठा का अद्वितीय प्रतीक था। इसीलिए आज भी हल्दीघाटी के बलिचा गाँव में चेतक का समाधि स्थल स्थित है, जहाँ लोग उसे नमन करते हैं।
युद्ध-कौशल 1.5 अंक; नाला लांघने व प्राणोत्सर्ग का प्रसंग 2 अंक; ऐतिहासिक महत्व 1.5 अंक (कुल 5 अंक)।
प्रश्न: (अ) 'अतिशयोक्ति अलंकार' की परिभाषा और उदाहरण लिखिए।
(ब) निम्नलिखित शब्दों के तीन-तीन मानक पर्यायवाची लिखिए:
घोड़ा, अरि, करवाल, रण, भाल।
(अ) अतिशयोक्ति अलंकार:
जहाँ किसी वस्तु, व्यक्ति या घटना का वर्णन लोक-मर्यादा या वास्तविकता से बहुत अधिक बढ़ा-चढ़ाकर किया जाता है, वहाँ अतिशयोक्ति अलंकार होता है।
उदाहरण: "वह दौड़ रहा अरि-मस्तक पर, या आसमान पर घोड़ा था।" (यहाँ घोड़े का आसमान पर दौड़ना बढ़ा-चढ़ाकर कहा गया है।)
(ब) पर्यायवाची शब्द:
- घोड़ा: अश्व, हय, तुरंग, वाजि।
- अरि: शत्रु, दुश्मन, रिपु, बैरी।
- करवाल: तलवार, कृपाण, असि, खड्ग।
- रण: युद्ध, संग्राम, समर, लड़ाई।
- भाल: मस्तक, ललाट, माथा।
अतिशयोक्ति अलंकार 1.5 अंक; पाँचों शब्दों के पर्यायवाची 2.5 अंक (कुल 4 अंक)।
प्रश्न: चेतक और महाराणा प्रताप का संबंध सिद्ध करता है कि यदि पशुओं के साथ स्नेह और विश्वास का व्यवहार किया जाए, तो वे मनुष्य के लिए अपने प्राण तक दे सकते हैं। वर्तमान समय में बेजुबान पशुओं के प्रति हमारे क्या कर्तव्य होने चाहिए?
कर्तव्य एवं संवेदनशीलता का विश्लेषण:
- सच्चा स्नेह और निष्ठा: चेतक की निष्ठा का आधार महाराणा प्रताप का उसके प्रति असीम प्रेम था। प्रताप ने कभी चेतक को कोड़ा नहीं मारा, बल्कि उसे अपने परिवार के सदस्य की तरह माना।
- पशु-क्रूरता का विरोध: आज हम देखते हैं कि सड़कों पर आवारा पशुओं, बैलों और घोड़ों पर अत्यधिक बोझ लादा जाता है और उनके साथ क्रूरता की जाती है। हमें 'पशु क्रूरता निवारण अधिनियम' का सम्मान करना चाहिए और बेजुबानों पर किसी भी प्रकार के अत्याचार का विरोध करना चाहिए।
- आहार और चिकित्सा की व्यवस्था: भीषण गर्मी में पक्षियों के लिए पानी के सकोरे रखना, आवारा पशुओं के लिए भोजन-पानी की व्यवस्था करना और घायल पशुओं के लिए पशु-चिकित्सालय (Animal Helpline) से मदद लेना हमारा नैतिक कर्तव्य है।
- सह-अस्तित्व की भावना: प्रकृति ने इस धरती पर जितना अधिकार मनुष्य को दिया है, उतना ही अन्य जीवों को भी। चेतक की गाथा हमें मूक प्राणियों के प्रति संवेदनशील और कृतज्ञ बनने की प्रेरणा देती है।
चेतक-प्रताप के संबंध की समीक्षा 2.5 अंक; पशुओं के प्रति चार व्यावहारिक कर्तव्य 2.5 अंक (कुल 5 अंक)।
पाठ 12: हिन्द महासागर में छोटा-सा हिंदुस्तान (यात्रा-वृत्तांत)
NCERT 'मल्हार' कक्षा 6 हिंदी — राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर' | संपूर्ण पाठ्यपुस्तक प्रश्नोत्तर, मॉरिशस की भारतीय संस्कृति, गिरमिटिया इतिहास, भाषा की बात एवं योग्यता-आधारित प्रश्न | CBSE 2026-27
- लेखक: राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर' (ओज और चिंतन के महान कवि, निबंधकार एवं साहित्य अकादेमी/ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता)।
- विधा: यात्रा-वृत्तांत (Travelogue) — दिनकर जी की मॉरिशस यात्रा का अत्यंत जीवंत, आत्मीय और ऐतिहासिक विवरण।
- मॉरिशस को 'छोटा-सा हिंदुस्तान' कहने का कारण:
- हिंद महासागर के सुदूर दक्षिण में स्थित यह सुंदर द्वीपीय देश भारत से हजारों किलोमीटर दूर है, परंतु यहाँ की 68% से अधिक आबादी भारतीय मूल की है।
- यहाँ के गाँव, शहर, गलियों के नाम (जैसे—काशी, गोकुल, पटना), वेशभूषा, खान-पान, तुलसीकृत रामचरितमानस का पाठ, शिवरात्रि और छठ पर्व बिल्कुल भारत जैसे ही धूमधाम से मनाए जाते हैं।
- यहाँ हिंदी, भोजपुरी और तमिल भाषाएँ गर्व के साथ बोली और पढ़ाई जाती हैं।
- गिरमिटिया मजदूरों का ऐतिहासिक संघर्ष: 1834 में अंग्रेजों द्वारा भारत (मुख्यतः बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश) से गरीब किसानों को एक विशेष समझौते (Agreement / गिरमिट) के तहत मजदूरी के लिए मॉरिशस ले जाया गया। इन मजदूरों ने अमानवीय यातनाएँ झेलीं, घने जंगलों और पथरीली चट्टानों को तोड़कर गन्ने के लहलहाते खेत बनाए। परंतु अपने साथ वे जो रामायण और हनुमान चालीसा की प्रतियाँ ले गए थे, उसी ने उनकी संस्कृति और आत्मसम्मान को जीवित रखा।
- गंगा तालाब (ग्रैंड बेसिन): मॉरिशस के पहाड़ों के बीच स्थित एक पावन प्राकृतिक झील, जिसे वहाँ के भारतीय 'गंगा तालाब' मानते हैं। शिवरात्रि के अवसर पर लाखों लोग श्वेत वस्त्र धारण कर काँवड़ लेकर यहाँ पैदल आते हैं और भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं।
- डोडो पक्षी: मॉरिशस का प्रसिद्ध विलुप्त हो चुका पक्षी, जो उड़ नहीं सकता था और जिसका शिकार करके उसे समाप्त कर दिया गया।
प्रश्न: पाठ के अनुसार, हिरन समूह में क्यों खड़े थे?
(क) उन्हें ठंड लग रही थी।
(ख) भागने पर उन्हें सिंह (शेर) के आक्रमण का डर था।
(ग) वे भोजन की तलाश में थे।
(घ) वे पर्यटकों को देख रहे थे।
सटीक उत्तर: विकल्प (ख) भागने पर उन्हें सिंह (शेर) के आक्रमण का डर था।
व्याख्या: लेखक ने मॉरिशस के एक प्राकृतिक पार्क का वर्णन करते हुए लिखा है कि हिरन झुंड बनाकर एक-दूसरे से सटकर खड़े थे, क्योंकि अलग होने या अकेले भागने पर हिंसक पशु उन पर आसानी से हमला कर सकते थे। समूह में रहना ही उनकी सुरक्षा का उपाय था।
सही विकल्प चयन 1 अंक; पाठ के संदर्भ का उल्लेख 1 अंक (कुल 2 अंक)।
प्रश्न: मॉरिशस को छोटे पैमाने पर भारतवर्ष (छोटा-सा हिंदुस्तान) क्यों कहा गया है?
(क) वहाँ की मुद्रा रुपया है।
(ख) वहाँ भारत की तरह जनसंख्या, धर्म, त्योहार, भाषा और संस्कृति मौजूद हैं।
(ग) वह भारत के पास स्थित है।
(घ) वहाँ केवल भारतीय लोग ही रहते हैं।
सटीक उत्तर: विकल्प (ख) वहाँ भारत की तरह जनसंख्या, धर्म, त्योहार, भाषा और संस्कृति मौजूद हैं।
व्याख्या: मॉरिशस में बहुसंख्यक आबादी भारतीय मूल की है। वहाँ शिवरात्रि, दीवाली, होली के पर्व वैसे ही मनाए जाते हैं, तुलसी रामायण पढ़ी जाती है, और गलियों-सड़कों के नाम भारतीय हैं। इसी सांस्कृतिक साम्य के कारण दिनकर जी ने इसे 'छोटा-सा हिंदुस्तान' कहा।
सही विकल्प चयन 1 अंक; सांस्कृतिक समानता का विवरण 1 अंक (कुल 2 अंक)।
प्रश्न: 'गिरमिटिया' किन्हें कहा गया है और मॉरिशस के निर्माण में उनका क्या योगदान रहा?
गिरमिटिया: 19वीं सदी (1834 के बाद) में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन द्वारा एक कानूनी समझौते (Agreement, जिसका देशज उच्चारण 'गिरमिट' हुआ) के तहत मजदूरी के लिए विदेश ले जाए गए भारतीय श्रमिकों को 'गिरमिटिया मजदूर' कहा गया।
योगदान: इन मजदूरों ने असह्य यातनाएँ सहकर मॉरिशस के पथरीले जंगलों को काटा, अपनी कड़ी मेहनत और पसीने से बंजर भूमि को उपजाऊ बनाकर गन्ने के हरे-भरे लहलहाते खेतों में बदल दिया। आज मॉरिशस जो एक समृद्ध और सुंदर राष्ट्र बना है, उसकी नींव में इन्हीं भारतीय गिरमिटिया पूर्वजों का पसीना और त्याग है।
गिरमिटिया शब्द का अर्थ 1 अंक; मॉरिशस निर्माण में योगदान 1 अंक (कुल 2 अंक)।
प्रश्न: मॉरिशस के 'गंगा तालाब' (ग्रैंड बेसिन) का वहाँ के भारतीय समुदाय के लिए क्या महत्व है?
गंगा तालाब का महत्व:
- यह मॉरिशस के पहाड़ों के बीच स्थित एक अत्यंत पवित्र प्राकृतिक झील है, जिसे वहाँ के प्रवासियों ने भारत की पावन 'गंगा' का प्रतीक माना है।
- महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर मॉरिशस के कोने-कोने से लाखों श्रद्धालु श्वेत वस्त्र पहनकर, अपने हाथों में सुंदर काँवड़ लेकर कई दिनों की कठिन पैदल यात्रा करके यहाँ पहुँचते हैं।
- वे गंगा तालाब के पावन जल से भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं। यह स्थल मॉरिशस में सनातन भारतीय आस्था और सांस्कृतिक एकता का सबसे बड़ा केंद्र है।
गंगा तालाब का स्वरूप 1 अंक; शिवरात्रि व काँवड़ परंपरा का उल्लेख 1 अंक (कुल 2 अंक)।
प्रश्न: कठोर यातनाओं और पराधीनता के बावजूद गिरमिटिया मजदूर अपनी भाषा और संस्कृति को कैसे जीवित रख पाए? इसमें तुलसीदास कृत 'रामचरितमानस' की क्या भूमिका रही?
सांस्कृतिक अस्मिता की रक्षा:
रामायण की भूमिका 2 अंक; सांस्कृतिक संघर्ष 2 अंक; निष्कर्ष 1 अंक (कुल 5 अंक)।
प्रश्न: (अ) निम्नलिखित शब्दों में 'इक' और 'ईय' प्रत्यय जोड़कर नए शब्द बनाइए:
उपनिवेश, इतिहास, भारत, राष्ट्र, संसार।
(ब) विलोम शब्द लिखिए:
विदेशी, पराधीनता, प्राचीन, एकता।
(अ) प्रत्यय जोड़कर शब्द निर्माण:
- उपनिवेश + इक = औपनिवेशिक
- इतिहास + इक = ऐतिहासिक
- संसार + इक = सांसारिक
- भारत + ईय = भारतीय
- राष्ट्र + ईय = राष्ट्रीय
(ब) विलोम शब्द:
- विदेशी × स्वदेशी
- पराधीनता × स्वाधीनता
- प्राचीन × नवीन / अर्वाचीन
- एकता × अनेकता
पाँचों प्रत्यय शब्द 2.5 अंक; चारों विलोम शब्द 2 अंक (कुल 4.5 अंक)।
प्रश्न: आज केवल मॉरिशस ही नहीं, बल्कि अमेरिका, ब्रिटेन, गुयाना, सूरीनाम, फिजी आदि अनेक देशों में प्रवासी भारतीय (Indian Diaspora) उच्च पदों और राजनीति में नेतृत्व कर रहे हैं।
दिनकर जी के पाठ 'हिन्द महासागर में छोटा-सा हिंदुस्तान' के आधार पर बताइए कि अपनी जड़ों और संस्कृति से जुड़े रहने पर मनुष्य किस प्रकार किसी भी देश में सफलता प्राप्त कर सकता है?
विश्लेषण एवं समकालीन परिप्रेक्ष्य:
- जड़ों से जुड़ाव ही शक्ति का आधार: दिनकर जी दिखाते हैं कि मॉरिशस के भारतीयों ने अपने पूर्वजों की संस्कृति, भाषा और मूल्यों को त्यागा नहीं, बल्कि उन्हें संजोकर रखा। जो व्यक्ति अपनी जड़ों का सम्मान करता है, उसके भीतर आत्मसम्मान और आत्मबल का कभी अभाव नहीं होता।
- कठिन परिश्रम और कर्मठता: भारतीय संस्कृति 'कर्मण्येवाधिकारस्ते' का पाठ पढ़ाती है। गिरमिटिया मजदूरों से लेकर आज के सिलिकॉन वैली के सीईओ (CEO) तक, भारतीयों ने अपनी प्रतिभा, ईमानदारी और परिश्रम से दुनिया भर में अपनी धाक जमाई है।
- विश्व बंधुत्व की भावना: भारतीय प्रवासी जिस भी देश में जाते हैं, वहाँ के कानून और समाज का सम्मान करते हुए दूध में चीनी की तरह घुल-मिल जाते हैं और उस देश के विकास में अपना सर्वस्व योगदान देते हैं।
- निष्कर्ष: यह पाठ हमें सिखाता है कि आधुनिकता और वैश्विक सफलता के लिए अपनी मातृभाषा, धर्म और सांस्कृतिक पहचान को छोड़ना आवश्यक नहीं है; बल्कि अपनी जड़ों से पोषण पाकर ही व्यक्ति का व्यक्तित्व वटवृक्ष की भाँति विस्तृत होता है।
सांस्कृतिक जड़ों का महत्व 2.5 अंक; वैश्विक प्रवासी भारतीयों का संदर्भ 2.5 अंक (कुल 5 अंक)।
पाठ 13: पेड़ की बात (वैज्ञानिक निबंध)
NCERT 'मल्हार' कक्षा 6 हिंदी — महान भारतीय वैज्ञानिक आचार्य जगदीश चंद्र बसु | संपूर्ण पाठ्यपुस्तक प्रश्नोत्तर, वनस्पति विज्ञान, पर्यावरण चेतना, भाषा की बात एवं योग्यता-आधारित प्रश्न | CBSE 2026-27
- लेखक: आचार्य जगदीश चंद्र बसु (बोस) — भारत के मूर्धन्य भौतिकशास्त्री एवं वनस्पति-विज्ञानी, जिन्होंने क्रिस्कोग्राफ (Crescograph) का आविष्कार करके पूरी दुनिया को यह वैज्ञानिक प्रमाण दिया था कि पेड़-पौधों में भी जीवन और संवेदनशीलता होती है।
- अनुवादक: शंकर सेन (मूल बांग्ला निबंध 'गाछेर कथा' से हिंदी अनुवाद)।
- निबंध के प्रमुख वैज्ञानिक बिंदु:
- पौधों में जीवन व संवेदनशीलता: पौधे जड़ वस्तु नहीं हैं; वे मनुष्य और पशुओं की तरह साँस लेते हैं, पोषण ग्रहण करते हैं, सुख और दुख का अनुभव करते हैं, तथा विश्राम करते हैं।
- बीज की सुप्त अवस्था व अंकुरण: सूखा बीज मृतप्राय दिखता है, परंतु उसके भीतर जीवन सुप्त (सोया हुआ) रहता है। जब उसे मिट्टी, नमी (जल) और उचित ताप मिलता है, तो वह जाग उठता है।
- दिशा-बोध (Gravitropism / Phototropism): गमले को यदि उल्टा भी लटका दिया जाए, तो भी पौधे की जड़ें नीचे पृथ्वी के अंधकार की ओर जाती हैं और तना घूमकर ऊपर प्रकाश की ओर बढ़ता है—मानो पौधे को सब भेद मालूम हो!
- सूर्य की ऊर्जा का संचयन (प्रकाश संश्लेषण): पेड़ सूर्य की किरणों के प्रकाश से अपना भोजन बनाते हैं। पौधे के रेशे-रेशे में सौर ऊर्जा संचित (आबद्ध) रहती है। जब हम लकड़ी या कोयला जलाते हैं, तो वही संचित सौर ऊर्जा प्रकाश और ऊष्मा बनकर बाहर प्रकट होती है।
- पारस्परिक निर्भरता (परागण): कीट-पतंगों (तितली, मधुमक्खी) और फूलों के बीच का पुराना संबंध परागण (Pollination) में सहायक होता है। पेड़ हवा को शुद्ध करके हमें जीवनदायिनी ऑक्सीजन प्रदान करते हैं।
प्रश्न: "जैसे पौधे को भी सब भेद मालूम हो गया हो" - पौधे को कौन-सा भेद पता लग गया था?
(क) कि पानी कहाँ से आ रहा है।
(ख) कि उसे उल्टा लटकाया गया है, इसलिए जड़ नीचे और तना ऊपर मुड़ गया।
(ग) कि सूरज डूबने वाला है।
(घ) कि उस पर कीट आक्रमण करने वाले हैं।
सटीक उत्तर: विकल्प (ख) कि उसे उल्टा लटकाया गया है, इसलिए जड़ नीचे और तना ऊपर मुड़ गया।
व्याख्या व वैज्ञानिक कारण: लेखक बताते हैं कि जब एक गमले को उल्टा करके लटका दिया गया, तो ऐसा लगा कि पौधा अब उल्टा बढ़ेगा। परंतु कुछ ही दिनों में आश्चर्यजनक रूप से पौधे की जड़ें मुड़कर नीचे धरती की ओर जाने लगीं और तना मुड़कर ऊपर आकाश व प्रकाश की ओर बढ़ने लगा। मानो पौधे को किसी रहस्यमय बुद्धि से पता चल गया हो कि उसका सही मार्ग क्या है!
सही विकल्प चयन 1 अंक; गुरुत्वानुवर्तन (Gravitropism) के स्पष्टीकरण पर 1 अंक (कुल 2 अंक)।
प्रश्न: पेड़-पौधे जीव-जंतुओं के सच्चे मित्र कैसे हैं?
(क) वे केवल सुंदर दिखते हैं।
(ख) वे हवा को शुद्ध करके जीवनदायिनी ऑक्सीजन प्रदान करते हैं और भोजन देते हैं।
(ग) वे पक्षियों को शिकारियों से बचाते हैं।
(घ) वे बारिश करवाते हैं।
सटीक उत्तर: विकल्प (ख) वे हवा को शुद्ध करके जीवनदायिनी ऑक्सीजन प्रदान करते हैं और भोजन देते हैं।
व्याख्या: समस्त जीव-जंतु श्वसन क्रिया में कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ते हैं और ऑक्सीजन ग्रहण करते हैं। यदि पेड़-पौधे प्रकाश संश्लेषण द्वारा उस कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करके ऑक्सीजन न छोड़ते, तो धरती पर जीवन का अस्तित्व ही समाप्त हो जाता। इसके अतिरिक्त वे सभी शाकाहारी व मांसाहारी जीवों के भोजन का मूल स्रोत हैं।
सही विकल्प चयन 1 अंक; वैज्ञानिक व्याख्या 1 अंक (कुल 2 अंक)।
प्रश्न: निम्नलिखित कथन का वैज्ञानिक एवं दार्शनिक आशय स्पष्ट कीजिए:
"पेड़-पौधों के रेशे-रेशे में सूरज की किरणें आबद्ध हैं। ईंधन को जलाने पर जो प्रकाश व ताप बाहर प्रकट होता है, वह सूर्य की ही ऊर्जा है।"
वैज्ञानिक आशय (Scientific Explanation):
- प्रकाश संश्लेषण और ऊर्जा रूपांतरण: हरे पेड़-पौधे अपनी पत्तियों में उपस्थित क्लोरोफिल की सहायता से सूर्य के प्रकाश की सौर ऊर्जा (Solar Energy) को रासायनिक ऊर्जा (Chemical Energy) में परिवर्तित करते हैं। इस प्रक्रिया में वे ग्लूकोज, सेल्यूलोज और काष्ठ (लकड़ी) का निर्माण करते हैं।
- ऊर्जा संरक्षण का नियम: विज्ञान का नियम है कि ऊर्जा कभी नष्ट नहीं होती, केवल रूप बदलती है। जो सौर ऊर्जा करोड़ों वर्षों में या वर्षों में पेड़ ने अपने भीतर संचित की थी, वह उसके रेशे-रेशे में रासायनिक बंधों के रूप में बंधी (आबद्ध) रहती है।
- ईंधन का जलना: जब हम सूखी लकड़ी या कोयले को जलाते हैं, तो वह दहन क्रिया के माध्यम से वही संचित सौर ऊर्जा पुनः प्रकाश और ताप (गर्मी) के रूप में मुक्त होकर हमारे सामने प्रकट होती है। वास्तव में हमारी आग का हर अंगारा सूर्य का ही रूप है।
वैज्ञानिक प्रक्रिया (प्रकाश संश्लेषण) 1.5 अंक; ऊर्जा रूपांतरण व दहन का स्पष्टीकरण 1.5 अंक (कुल 3 अंक)।
प्रश्न: "मधुमक्खी व तितली के साथ वृक्ष की चिरकाल से घनिष्ठता है।" इस पंक्ति में प्रकृति के किस महत्वपूर्ण नियम की ओर संकेत किया गया है?
इस पंक्ति में परागण (Pollination) और पारिस्थितिक सहजीविता (Symbiosis) की ओर संकेत किया गया है:
- पारस्परिक लाभ: पेड़-पौधे अपने सुंदर, रंग-बिरंगे फूलों और मीठे मकरंद (रस) के माध्यम से तितलियों और मधुमक्खियों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं, जिससे कीटों को भोजन प्राप्त होता है।
- प्रजनन व वंश-वृद्धि: जब ये कीट रस पीने आते हैं, तो उनके पैरों और पंखों पर परागकण चिपक जाते हैं। जब वे दूसरे फूलों पर बैठते हैं, तो परागण की क्रिया संपन्न होती है, जिससे फल और बीज बनते हैं। यदि कीट न हों, तो अधिकांश पेड़-पौधों की वंश-वृद्धि रुक जाएगी।
सहजीविता का उल्लेख 1 अंक; परागण प्रक्रिया का स्पष्टीकरण 1 अंक (कुल 2 अंक)।
प्रश्न: पाठ के आधार पर बताइए कि बीज की सुप्त अवस्था क्या होती है और वह किस प्रकार एक नन्हे पौधे के रूप में जन्म लेता है?
बीज का चमत्कारिक जीवन-चक्र:
सुप्त अवस्था का वर्णन 1.5 अंक; अनुकूल परिस्थितियों का उल्लेख 1.5 अंक; अंकुरण व दिशा-ज्ञान का विवरण 2 अंक (कुल 5 अंक)।
प्रश्न: (अ) निम्नलिखित शब्दों का संधि-विच्छेद कीजिए:
सूर्योर्जा, परोपकार, रूपांतरण, देशांतर।
(ब) 'ता' और 'इक' प्रत्यय जोड़कर दो-दो नए शब्द बनाइए।
(अ) संधि-विच्छेद:
- सूर्योर्जा = सूर्य + ऊर्जा (गुण स्वर संधि: अ + ऊ = ओ)
- परोपकार = पर + उपकार (गुण स्वर संधि: अ + उ = ओ)
- रूपांतरण = रूप + अंतरण (दीर्घ स्वर संधि: अ + अ = आ)
- देशांतर = देश + अंतर (दीर्घ स्वर संधि: अ + अ = आ)
(ब) प्रत्यय अभ्यास:
- 'ता' प्रत्यय: संवेदनशील + ता = संवेदनशीलता, सजीव + ता = सजीवता।
- 'इक' प्रत्यय: विज्ञान + इक = वैज्ञानिक, वनस्पति + इक = वानस्पतिक।
चारों संधि-विच्छेद 2 अंक; चारों प्रत्यय शब्द 2 अंक (कुल 4 अंक)।
प्रश्न: आचार्य जगदीश चंद्र बसु की इस खोज से पहले लोग पेड़ों को निर्जीव मानकर अंधाधुंध काटते थे।
जब यह वैज्ञानिक रूप से सिद्ध हो चुका है कि पेड़ों में भी हमारे जैसी ही संवेदनशीलता और पीड़ा होती है, तो वर्तमान जलवायु संकट (Climate Crisis) के दौर में पेड़ों को काटना किस प्रकार एक अपराध है? इस पर अपने विचार लिखिए।
गहन चिंतन एवं पर्यावरण-नैतिकता (Environmental Ethics):
- संवेदना और जीवन का सम्मान: जगदीश चंद्र बसु ने दुनिया को सिखाया कि जब हम किसी पेड़ की डाली तोड़ते हैं या कुल्हाड़ी चलाते हैं, तो पौधे को भी उसी प्रकार पीड़ा और आघात का अनुभव होता है जैसे किसी जीवित प्राणी को चोट लगने पर होता है। पेड़ों को केवल लकड़ी का संसाधन मानना संवेदनहीनता है।
- पारिस्थितिक तंत्र का रक्षक: पेड़ धरती के फेफड़े (Lungs of the Earth) हैं। आज जो ग्लोबल वार्मिंग, अनियमित वर्षा, प्रदूषण और तापमान वृद्धि का संकट हम झेल रहे हैं, वह वनों के विनाश का ही दुष्परिणाम है।
- नैतिक अपराध: जो पेड़ हमें निःस्वार्थ भाव से ऑक्सीजन, फल, छाया, वर्षा और जीवन प्रदान करते हैं, उन्हें स्वार्थवश काटना मानवता और आने वाली पीढ़ियों के प्रति सबसे बड़ा अपराध है।
- संकल्प: हमें 'चिपको आंदोलन' की भावना को अपनाते हुए प्रत्येक वृक्ष की रक्षा करनी चाहिए और 'एक पेड़ माँ के नाम' जैसी पहलों में सक्रिय भाग लेकर धरती को हरा-भरा बनाना चाहिए।
वैज्ञानिक संवेदना का विश्लेषण 2.5 अंक; पर्यावरण संरक्षण और नैतिक जिम्मेदारी 2.5 अंक (कुल 5 अंक)।