वयं वर्णमालां पठामः (हम सब वर्णमाला पढ़ते हैं)
संस्कृत वर्णमालायाः परिचयः — स्वराः, व्यञ्जनानि, अयोगवाहौ, उच्चारणस्थानानि, वर्णसंयोजनं वर्णवियोजनं च।
१. स्वराः (Vowels - १३): अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ॠ, ऌ, ए, ऐ, ओ, औ। (ह्रस्व स्वराः ५ — अ, इ, उ, ऋ, ऌ; दीर्घ स्वराः ८ — आ, ई, ऊ, ॠ, ए, ऐ, ओ, औ)।
२. व्यञ्जनानि (Consonants - ३३): क-वर्ग (क ख ग घ ङ), च-वर्ग (च छ ज झ ञ), ट-वर्ग (ट ठ ड ढ ण), त-वर्ग (त थ द ध न), प-वर्ग (प फ ब भ म) — एते २५ 'स्पर्शाः'। अन्तःस्थाः ४ — य, र, ल, व। ऊष्माणः ४ — श, ष, स, ह।
३. अयोगवाहौ (२): अनुस्वारः (ं) तथा विसर्गः (ः)।
चित्र-परिचयः एवं संस्कृते नामानि:
- (क) आम्रम् (Mango / आम) — अकारान्त नपुंसकलिङ्ग शब्दः।
- (ख) अश्वः (Horse / घोड़ा) — अकारान्त पुंल्लिङ्ग शब्दः।
- (ग) इक्षुः (Sugarcane / गन्ना) — इकारान्त पुंल्लिङ्ग शब्दः।
- (घ) कमलम् (Lotus / कमल का फूल) — अकारान्त नपुंसकलिङ्ग शब्दः।
- (ङ) गजः (Elephant / हाथी) — अकारान्त पुंल्लिङ्ग शब्दः।
मञ्जूषा: [आ, ई, उ, औ, क, च, ट, त, प]
- (क) अ, आ, इ, ई, उ, ऊ।
- (ख) ए, ऐ, ओ, औ।
- (ग) क, ख, ग, घ, ङ (क-वर्गः)।
- (घ) च, छ, ज, झ, ञ (च-वर्गः)।
- (ङ) ट, ठ, ड, ढ, ण (ट-वर्गः)।
- (च) त, थ, द, ध, न (त-वर्गः)।
- (छ) प, फ, ब, भ, म (प-वर्गः)।
- (क) अ $ ightarrow$ अश्वः (घोड़ा), अजा (बकरी)
- (ख) आ $ ightarrow$ आम्रम् (आम), आकाशः (आसमान)
- (ग) क $ ightarrow$ कमलम् (कमल), काकः (कौआ)
- (घ) ग $ ightarrow$ गजः (हाथी), गृहम् (घर)
- (ङ) म $ ightarrow$ मयूरः (मोर), माता (माँ)
- (च) श $ ightarrow$ शशकः (खरगोश), शुकः (तोता)
- बालकः = ब् + आ + ल् + अ + क् + अः
- पुस्तकम् = प् + उ + स् + त् + अ + क् + अ + म्
- लता = ल् + अ + त् + आ
- नदी = न् + अ + द् + ई
- फलम् = फ् + अ + ल् + अ + म्
आदर्श-प्रारूपम् (Model Format):
- (क) मम पितुः नाम: श्रीमान् राजेशकुमारः (पिता जी का नाम)
- (ख) मम मातुः नाम: श्रीमती सुनीतादेवी (माता जी का नाम)
- (ग) मम भ्रातुः नाम: आयुषः (भाई का नाम)
- (घ) मम भगिन्याः नाम: आन्या (बहन का नाम)
(छात्र अपने परिवार के सदस्यों के वास्तविक नाम शुद्ध संस्कृत वर्तनी में लिख सकते हैं।)
प्रश्न: संस्कृत वर्णमाला को वैज्ञानिक क्यों माना जाता है? इसके किन्हीं दो उच्चारण-स्थानों के नाम एवं उनसे उच्चरित होने वाले दो-दो वर्ण लिखिए।
उत्तर: संस्कृत वर्णमाला मुख के उच्चारण-स्थानों (कण्ठ, तालु, मूर्धा, दन्त, ओष्ठ) के स्वाभाविक क्रम पर पूर्णतः वैज्ञानिक रीति से व्यवस्थित है। जब वायु फेफड़ों से कंठ की ओर आती है तो सबसे पहले कंठ, फिर तालु, मूर्धा, दन्त और ओष्ठ का स्पर्श करती है।
दो प्रमुख उच्चारण स्थान:
- १. कण्ठः (Guttural): अ, आ, क, ख, ग, घ, ङ, ह (अकुहविसर्जनीयानां कण्ठः)।
- २. ओष्ठौ (Labial): उ, ऊ, प, फ, ब, भ, म (उपूपध्मानीयानामोष्ठौ)।
संयुक्त-व्यञ्जनानि (संयुक्त व्यंजन)
यदा द्वयोः व्यञ्जनयोः मध्ये स्वरः न भवति, तदा संयुक्तव्यञ्जनं भवति। वर्णसंयोजनम्, विच्छेदः तथा पदरचना।
प्रमुख संयुक्त-व्यञ्जनानि:
• क् + ष् = क्ष (यथा- वृक्षः, क्षमा)
• त् + र् = त्र (यथा- पत्रम्, मित्रम्)
• ज् + ञ् = ज्ञ (यथा- ज्ञानम्, ज्ञानी)
• श् + र् = श्र (यथा- श्रमः, श्रीमान्)
• द् + य् = द्य (यथा- विद्या, विद्यालयः)
• द् + ध् = द्ध (यथा- शुद्धः, युद्धम्)
- क्ष = क् + ष्
- त्र = त् + र्
- ज्ञ = ज् + ञ्
- श्र = श् + र्
- द्य = द् + य्
- प्र = प् + र्
- (क) व् + ऋ + क् + ष् + अः = वृक्षः (पेड़)
- (ख) म् + इ + त् + र् + अ + म् = मित्रम् (दोस्त)
- (ग) ज् + ञ् + आ + न् + अ + म् = ज्ञानम् (ज्ञान)
- (घ) श् + र् + अ + म् + अः = श्रमः (मेहनत)
- (ङ) व् + इ + द् + य् + आ = विद्या (शिक्षा)
- (क) छात्रः कक्षायां पठति। (त्र = त् + र्)
- (ख) सः ईश्वरं नमति।
- (ग) कृष्णः धेनुं चारयति।
- (घ) विद्यालयः सुन्दरः अस्ति। (द्य = द् + य्)
- (ङ) पुस्तकम् मेजे अस्ति। (स्त = स् + त्)
- 'त्र' युक्तपदानि: छात्रः, नेत्रम्, पत्रम्।
- 'क्ष' युक्तपदानि: पक्षी, कक्षा, रक्षकः।
- 'ज्ञ' युक्तपदानि: प्रतिज्ञा, विज्ञानम्, आज्ञा।
- 'श्र' युक्तपदानि: आश्रमः, विश्रामः, श्रमिकः।
प्रश्न: 'विद्यालयः' और 'विद्यार्थी' शब्दों में प्रयुक्त संयुक्त वर्ण कौन-सा है? इसका वर्ण-विच्छेद कर बताइए कि इसका शुद्ध उच्चारण 'द्या' है या 'ध्या'?
उत्तर: 'विद्यालयः' तथा 'विद्यार्थी' में प्रयुक्त संयुक्त वर्ण 'द्य' है।
• इसका वर्ण-विच्छेद: द् + य् + आ = द्या है।
• उच्चारण विश्लेषण: कई लोग भ्रमवश इसे 'ध्या' (ध् + य्) बोल देते हैं, जो कि अशुद्ध है। इसका शुद्ध उच्चारण 'द्या' (दकार + यकार) ही है।
एषः कः? एषा का? एतत् किम्? (यह कौन है? यह क्या है?)
संस्कृतस्य त्रिषु लिङ्गेषु समीपे स्थितानां वस्तूनां कृते सर्वनामप्रयोगः — पुंल्लिङ्गे 'एषः', स्त्रीलिङ्गे 'एषा', नपुंसकलिङ्गे 'एतत्'।
• पुंल्लिङ्ग (Masculine): एषः कः? (यह कौन है?) $
ightarrow$ एषः बालकः। (यह बालक है।)
• स्त्रीलिङ्ग (Feminine): एषा का? (यह कौन है?) $
ightarrow$ एषा बालिका। (यह बालिका है।)
• नपुंसकलिङ्ग (Neuter): एतत् किम्? (यह क्या है?) $
ightarrow$ एतत् पुस्तकम् / फलम्। (यह पुस्तक/फल है।)
- एषः कः? (चित्रम्: गजः) $ ightarrow$ एषः गजः अस्ति। (यह हाथी है।)
- एषा का? (चित्रम्: चटका) $ ightarrow$ एषा चटका अस्ति। (यह चिड़िया है।)
- एतत् किम्? (चित्रम्: छत्रम्) $ ightarrow$ एतत् छत्रम् अस्ति। (यह छाता है।)
- एषः कः? (चित्रम्: शिक्षकः) $ ightarrow$ एषः शिक्षकः अस्ति। (यह शिक्षक हैं।)
- एषा का? (चित्रम्: अध्यापिका) $ ightarrow$ एषा अध्यापिका अस्ति। (यह अध्यापिका हैं।)
- एतत् किम्? (चित्रम्: कन्दुकम्) $ ightarrow$ एतत् कन्दुकम् अस्ति। (यह गेंद है।)
- (क) एषः सिंहः गर्जति। (पुंल्लिङ्ग)
- (ख) एषा लता विकसति। (स्त्रीलिङ्ग)
- (ग) एतत् पत्रम् पतति। (नपुंसकलिङ्ग)
- (घ) एषः मयूरः नृत्यति। (पुंल्लिङ्ग)
- (ङ) एषा महिला पचति। (स्त्रीलिङ्ग)
- (च) एतत् विमानम् उत्पतति। (नपुंसकलिङ्ग)
| स्तम्भ 'क' | स्तम्भ 'ख' | शुद्ध-मेलनम् |
|---|---|---|
| (१) एषः | वाटिका | एषः अश्वः |
| (२) एषा | अश्वः | एषा वाटिका |
| (३) एतत् | कमलम् | एतत् कमलम् |
| (४) कः | घटिका | कः बालकः? |
| (५) का | बालकः | का घटिका? |
प्रश्न: संस्कृत में तीन लिङ्ग होते हैं। यदि आपको किसी मित्र को अपने कमरे की तीन वस्तुएँ (मेज, घड़ी, पंखा) संस्कृत में सर्वनाम सहित बतानी हों, तो आप किन वाक्यों का प्रयोग करेंगे?
उत्तर: तीनों लिङ्गों के अनुसार कमरे की वस्तुओं का परिचय:
- मेज (उत्पीठिका - स्त्रीलिङ्ग): एषा उत्पीठिका अस्ति। (यह मेज है।)
- घड़ी (घटिका - स्त्रीलिङ्ग): एषा घटिका अस्ति। (यह घड़ी है।)
- पंखा (व्यजनम् - नपुंसकलिङ्ग): एतत् व्यजनम् अस्ति। (यह पंखा है।)
- दीप/बल्ब (दीपः - पुंल्लिङ्ग): एषः दीपः अस्ति। (यह दीपक/प्रकाश है।)
अहं च त्वं च (मैं और तुम — संवादः)
अस्मद् (अहम् = मैं) तथा युष्मद् (त्वम् = तुम) सर्वनामपदानां लट्-लकार-क्रियाभिः सह सरल-संवाद-प्रयोगः।
• उत्तम पुरुषः: अहम् पठामि (मैं पढ़ता हूँ), अहम् गच्छामि (मैं जाता हूँ), अहम् खादामि (मैं खाता हूँ)।
• मध्यम पुरुषः: त्वम् पठसि (तुम पढ़ते हो), त्वम् गच्छसि (तुम जाते हो), त्वम् खादसि (तुम खाते हो)।
• 'च' अव्ययम्: 'च' का अर्थ 'और' (And) होता है, जो संस्कृत में संबंधित शब्दों के बाद प्रयुक्त होता है (यथा- अहम् त्वम् च = मैं और तुम)।
मञ्जूषा: [पठामि, पठसि, गच्छामि, गच्छसि, क्रीडामि, क्रीडसि]
- (क) अहम् पुस्तकं पठामि।
- (ख) त्वम् किं पठसि?
- (ग) अहम् विद्यालयं गच्छामि।
- (घ) त्वम् कुत्र गच्छसि?
- (ङ) अहम् कन्दुकेन क्रीडामि।
- (च) त्वम् मित्रैः सह क्रीडसि।
राधिका: नमो नमः! त्वं कः असि?
माधवः: नमो नमः! अहम् माधवः अस्मि। त्वं का असि?
राधिका: अहम् राधिका अस्मि। त्वं कुत्र पठसि?
माधवः: अहम् केन्द्रीयविद्यालये पठामि। त्वं कुत्र पठसि?
राधिका: अहम् अपि तत्रैव पठामि। आवां मित्रे स्वः।
- अहम् / छात्रः: अहम् षष्ठकक्षायाः छात्रः अस्मि। (मैं कक्षा ६ का छात्र हूँ।)
- त्वम् / गायकः: त्वम् मधुरं गायसि। (तुम मीठा गाते हो।)
- अहम् च त्वम् च: अहम् च त्वम् च सङ्गतेन क्रीडावः। (मैं और तुम मिलकर खेलते हैं।)
- लेखनं / लिखामि: अहम् सुन्दरं लेखं लिखामि। (मैं सुंदर लेख लिखता हूँ।)
- कथां / शृणोषि: त्वम् आनन्देन कथां शृणोषि। (तुम आनंद से कहानी सुनते हो।)
प्रश्न: संस्कृत में क्रियापद कर्ता के पुरुष और वचन के अनुसार बदलता है। यदि कोई कहे "अहम् गच्छसि", तो यह वाक्य क्यों अशुद्ध है? इसका शुद्ध रूप क्या होगा?
उत्तर: यह वाक्य व्याकरण की दृष्टि से अशुद्ध है क्योंकि 'अहम्' उत्तम पुरुष का कर्ता है, जबकि 'गच्छसि' मध्यम पुरुष की क्रिया है। नियम के अनुसार उत्तम पुरुष के कर्ता के साथ उत्तम पुरुष की ही क्रिया लगती है।
• शुद्ध वाक्य: "अहम् गच्छामि" (मैं जाता हूँ)। अथवा यदि मध्यम पुरुष बनाना हो तो "त्वम् गच्छसि" (तुम जाते हो)।
संख्यागणना ननु सरला (संख्या गणना वास्तव में सरल है)
संस्कृते संख्यावाचक-शब्दानां परिचयः (१ तः २० पर्यन्तम्) — गणनं, प्रयोगः, वाक्यरचना च।
• १ से ४ संख्याएँ तीनों लिङ्गों में भिन्न होती हैं:
१: एकः (पुं०), एका (स्त्री०), एकम् (नपुं०)
२: द्वौ (पुं०), द्वे (स्त्री०), द्वे (नपुं०)
३: त्रयः (पुं०), तिस्रः (स्त्री०), त्रीणि (नपुं०)
४: चत्वारः (पुं०), चतस्रः (स्त्री०), चत्वारि (नपुं०)
• ५ से आगे सभी लिङ्गों में समान: पञ्च (५), षट् (६), सप्त (७), अष्ट (८), नव (९), दश (१०), एकादश (११), द्वादश (१२), त्रयोदश (१३), चतुर्दश (१४), पञ्चदश (१५), षोडश (१६), सप्तदश (१७), अष्टादश (१८), नवदश/एकोनविंशतिः (१९), विंशतिः (२०)।
- (क) ५ $ ightarrow$ पञ्च
- (ख) ८ $ ightarrow$ अष्ट
- (ग) १२ $ ightarrow$ द्वादश
- (घ) १५ $ ightarrow$ पञ्चदश
- (ङ) १८ $ ightarrow$ अष्टादश
- (च) २० $ ightarrow$ विंशतिः
- (३) कन्दुकानि (३ गेंदें): त्रीणि कन्दुकानि। (नपुंसकलिङ्ग)
- (४) बालकाः (४ लड़के): चत्वारः बालकाः। (पुंल्लिङ्ग)
- (२) बालिके (२ लड़कियाँ): द्वे बालिके। (स्त्रीलिङ्ग)
- (७) पत्राणि (७ पत्ते): सप्त पत्राणि।
- (१०) पुष्पाणि (१० फूल): दश पुष्पाणि।
- (क) सप्ताहे सप्त दिनानि भवन्ति। (सप्ताह में सात दिन होते हैं।)
- (ख) वर्षे द्वादश मासाः भवन्ति। (वर्ष में बारह महीने होते हैं।)
- (ग) मम हस्ते पञ्च अङ्गुल्यः सन्ति। (मेरे हाथ में पाँच उँगलियाँ हैं।)
- (घ) एकस्मिन् पक्षे पञ्चदश तिथयः भवन्ति। (एक पक्ष में पंद्रह तिथियाँ होती हैं।)
- (ङ) नेत्रे द्वे भवतः। (आँखें दो होती हैं।)
प्रश्न: संस्कृत में १ से ४ तक की संख्याओं के लिङ्ग-भेद का एक व्यावहारिक उदाहरण दीजिए। 'तीन' संख्या का प्रयोग बालक, बालिका और फल के साथ करके बताइए।
उत्तर: संस्कृत में १ से ४ तक की संख्याएँ विशेषण के रूप में विशेष्य के लिङ्ग के अनुसार बदलती हैं। 'तीन' (३) संख्या के तीनों लिङ्गों में रूप:
- पुंल्लिङ्ग: त्रयः बालकाः (तीन लड़के)
- स्त्रीलिङ्ग: तिस्रः बालिकाः (तीन लड़कियाँ)
- नपुंसकलिङ्ग: त्रीणि फलानि (तीन फल)
जबकि ५ से आगे संख्याएँ सभी लिङ्गों में समान रहती हैं (यथा- पञ्च बालकाः, पञ्च बालिकाः, पञ्च फलानि)।
अहं प्रातः उत्तिष्ठामि (मैं सुबह उठता हूँ — दैनिकचर्या)
दैनिकचर्यायाः वर्णनम्, संस्कृत-समयलेखनम् (पञ्चवादने, सार्धषड्वादने), शिष्टाचारस्य सद्गुणानां च परिचयः।
• समयवाचक-शब्दाः: पञ्चवादने (५:०० बजे), सार्धपञ्चवादने (५:३० बजे), षड्वादने (६:०० बजे), सार्धषड्वादने (६:३० बजे), सप्तवादने (७:०० बजे), अष्टवादने (८:०० बजे)।
• दैनिक-शिष्टाचारः: प्रातः उत्थाय भूमेः वन्दनम्, मातापित्रोः पादस्पर्शः, दन्तधावनम्, व्यायामः, स्नानम्, अध्ययनम्, विद्यालयगमनं च।
मञ्जूषायाः शिष्टाचार-पदानि (सद्गुणाः):
- गुरुवन्दनम् (गुरुजनों की वंदना व सम्मान)
- वृद्धसेवा (बुजुर्गों और वृद्धों की सेवा)
- अतिथिसत्कारः (अतिथियों का आदर-सत्कार)
- मातृप्रेम पितृभक्तिः च (माता से प्रेम और पिता के प्रति श्रद्धा)
- ज्येष्ठेषु आदरः (अपने से बड़ों का आदर)
- कनिष्ठेषु प्रीतिः (छोटों के प्रति स्नेह व वात्सल्य)
- सत्यकथनम् (सदैव सत्य बोलना)
- प्राणिषु दया (सभी जीवों पर करुणा रखना)
- समयपालनम् (समय का पाबंद होना)
- स्वच्छता प्रकृतिरक्षणम् च (साफ-सफाई और प्रकृति की सुरक्षा)
(नोट: कलहः, अहङ्कारः, असूया, परस्परद्वेषः तथा हिंसा दुर्गुणाः सन्ति, अतः शिष्टाचारपदेषु न गण्यन्ते।)
- (क) ५:०० $ ightarrow$ पञ्चवादने (पाँच बजे)
- (ख) ६:०० $ ightarrow$ षड्वादने (छह बजे)
- (ग) ६:३० $ ightarrow$ सार्धषड्वादने (साढ़े छह बजे)
- (घ) ७:०० $ ightarrow$ सप्तवादने (सात बजे)
- (ङ) ८:०० $ ightarrow$ अष्टवादने (आठ बजे)
- (क) अहम् प्रातः कतिवादने उत्तिष्ठामि?
उत्तरम्: अहम् प्रातः पञ्चवादने उत्तिष्ठामि। (मैं सुबह पाँच बजे उठता हूँ।) - (ख) उत्थाय प्रथमं किं करोमि?
उत्तरम्: उत्थाय प्रथमं भूमेः वन्दनं करोमि, मातापितरौ च नमामि। (उठकर सबसे पहले पृथ्वी की वंदना करता हूँ और माता-पिता को प्रणाम करता हूँ।) - (ग) कतिवादने विद्यालयं गच्छामि?
उत्तरम्: अहम् अष्टवादने विद्यालयं गच्छामि। (मैं आठ बजे विद्यालय जाता हूँ।) - (घ) विद्यालये किं कुर्मः?
उत्तरम्: विद्यालये वयं ध्यानेन पठामः, लिखामः, मित्रेण सह क्रीडामः च। (विद्यालय में हम ध्यान से पढ़ते, लिखते और मित्रों के साथ खेलते हैं।)
प्रश्न: 'अहं प्रातः उत्तिष्ठामि' पाठ से एक विद्यार्थी को अपने दैनिक जीवन के समय-प्रबंधन (Time Management) और नैतिक मूल्यों (Moral Values) के बारे में क्या प्रेरणा मिलती है?
उत्तर: यह पाठ विद्यार्थी को दो प्रमुख जीवन-कौशल सिखाता है:
- १. अनुशासित दिनचर्या व समय-प्रबंधन: ब्रह्ममुहूर्त (प्रातः ५ बजे) में उठना, व्यायाम व स्वच्छता करना और निश्चित समय पर अध्ययन तथा विद्यालय जाना दिन को ऊर्जावान और व्यवस्थित बनाता है।
- २. कृतज्ञता व शिष्टाचार (Cultural Values): धरती माता की वंदना और माता-पिता का चरण-स्पर्श हमारी संस्कृति में कृतज्ञता और विनय के सर्वोच्च संस्कार हैं।
शूराः वयं धीराः वयम् (हम शूरवीर हैं, हम धैर्यवान हैं)
राष्ट्रभक्ति-प्रेरकं बालगीतम् (रचयिता: डॉ. श्रीधर भास्कर वर्णेकरः) — साहसः, धैर्यम्, विजयसङ्कल्पः वचनपरिवर्तनं च।
गीत-सार: "शूराः वयं धीराः वयं, भारतीयाः सदा जयगामिनः।" हम भारतीय वीर, साहसी और दृढ़ इच्छाशक्ति वाले हैं। हम दूसरों के शुभचिंतक हैं, परंतु समरांगण (कर्मक्षेत्र/युद्धक्षेत्र) में विजय के लिए अविचल रहते हैं।
वचन-नियम: अहम् (एकवचन) $
ightarrow$ वयम् (बहुवचन); शूरः (एक०) $
ightarrow$ शूराः (बहु०); धीरः $
ightarrow$ धीराः।
- (क) शूराः के? (शूरवीर कौन हैं?) $ ightarrow$ वयम् / भारतीयाः (हम सब भारतीय)
- (ख) वयं कीदृशमानसाः स्मः? (हम किस प्रकार के मन वाले हैं?) $ ightarrow$ दृढमानसाः (दृढ़ संकल्प वाले)
- (ग) वयं कीदृशचिन्तकाः स्मः? (हम कैसा चिंतन करने वाले हैं?) $ ightarrow$ शुभचिन्तकाः (कल्याण चाहने वाले)
- (घ) वयं कुत्र अतिनिश्चलाः स्मः? (हम किसमें पूर्णतः अडिग हैं?) $ ightarrow$ विजये (विजय प्राप्ति में)
- (ङ) वयं विजयार्थिनः कुत्र यामः? (हम विजयी होकर कहाँ जाते हैं?) $ ightarrow$ समराङ्गणम् (युद्धक्षेत्र / कर्मक्षेत्र में)
यथा: शूराः वयम् $ ightarrow$ शूरः अहम्
- (क) वीराः वयम् $ ightarrow$ वीरः अहम्
- (ख) धीराः वयम् $ ightarrow$ धीरः अहम्
- (ग) बलशालिनः जयगामिनः $ ightarrow$ बलशाली जयगामी
- (घ) दृढमानसाः प्रियसाहसाः $ ightarrow$ दृढमानसः प्रियसाहसः
- (ङ) अतिभावुकाः शुभचिन्तकाः $ ightarrow$ अतिभावुकः शुभचिन्तकः
शूराः वयं धीराः वयम्,
मानवकुले वीराः वयम्।
दृढमानसाः प्रियसाहसाः,
सदा जयगामिनः वयम्॥
प्रश्न: इस गीत के रचयिता कौन हैं? गीत में भारतीयों को "शुभचिन्तकाः" और "दृढमानसाः" दोनों क्यों कहा गया है? इसका भारतीय दर्शन से क्या संबंध है?
उत्तर: इस गीत के रचयिता आधुनिक संस्कृत के मूर्धन्य कवि पद्मश्री डॉ. श्रीधर भास्कर वर्णेकर हैं।
• शुभचिन्तकाः: भारतीय संस्कृति 'वसुधैव कुटुम्बकम्' और 'सर्वे भवन्तु सुखिनः' की भावना रखती है, अर्थात् हम संसार के सभी प्राणियों का शुभ और कल्याण चाहते हैं।
• दृढमानसाः: जब धर्म, सत्य और राष्ट्र-रक्षा की बात आती है, तो भारतीय कभी पीछे नहीं हटते, बल्कि वज्र की भाँति दृढ़ संकल्प होकर विजय प्राप्त करते हैं।
सः एव महान् चित्रकारः (वही सच्चा चित्रकार है — कथा)
कलायाः महत्त्वम्, एकाग्रता, चातुर्यं तथा आत्ममूल्याङ्कनस्य प्रेरणादायिका कथा।
कथा-सार: एकः राजा उत्तमं चित्रकारं परीक्षितुम् ऐच्छत्। सः चित्रकाराणाम् आह्वानम् अकरोत्। एकः चित्रकारः अद्वितीयं सजीवं च चित्रं निर्मितवान्। यदा राजा चित्रस्य रहस्यम् अपृच्छत्, तदा चित्रकारः अवदत् — "केवलं तूलिकया चित्रं न भवति, हृदयेन एकाग्रतया च भवति।"
व्याकरणम्: क्त्वा-प्रत्ययः (कृत्वा, दृष्ट्वा), लङ्-लकारः (अभवत्, अवदत्)।
- (क) राजा कस्य परीक्षां कर्तुम् ऐच्छत्? $ ightarrow$ चित्रकारस्य (चित्रकार की)
- (ख) चित्रकारः कीदृशं चित्रं निर्मितवान्? $ ightarrow$ सजीवम् / अनुपमम् (सजीव चित्र)
- (ग) चित्रे किं दृष्ट्वा सर्वे विस्मिताः अभवन्? $ ightarrow$ सौन्दर्यम् (सुंदरता)
- (घ) कलायाः कृते किं परमावश्यकम्? $ ightarrow$ एकाग्रता / साधना (एकाग्रता)
- (ङ) महान् चित्रकारः कः अभवत्? $ ightarrow$ सत्यसाधकः
- (क) राजा चित्रकाराय किं पारितोषिकम् अयच्छत्?
उत्तरम्: राजा प्रसन्नः भूत्वा चित्रकाराय स्वर्णमुद्राः बहुमूल्यं पारितोषिकं च अयच्छत्। - (ख) चित्रकारः राजानं किं न्यवेदयत्?
उत्तरम्: चित्रकारः न्यवेदयत् यत् कला धनार्थं न, अपितु आत्मसन्तुष्टये समाजकल्याणाय च अस्ति।
- (क) महान् $ imes$ लघुः / क्षुद्रः
- (ख) सुन्दरम् $ imes$ कुरूपम्
- (ग) प्रसन्नः $ imes$ खिन्नः / अप्रसन्नः
- (घ) सत्यम् $ imes$ असत्यम्
प्रश्न: इस कथा से विद्यार्थियों को अपनी रचनात्मकता (Creativity) और कौशल विकास में क्या संदेश मिलता है?
उत्तर: यह कथा सिखाती है कि किसी भी कला या विद्या में उत्कृष्टता केवल साधनों (जैसे अच्छी तूलिका या रंग) से नहीं, बल्कि निरंतर अभ्यास, गहरी एकाग्रता और आंतरिक समर्पण से आती है। सच्चा कलाकार अपनी कला को अहंकार का साधन न बनाकर साधना मानता है।
अतिथिदेवो भव (अतिथि भगवान स्वरूप होता है — कथा)
राधिकायाः मार्जारी-शावकैः सह आत्मीयता, भारतीय-अतिथिसत्कार-परम्परा च।
कथा-सार: राधिकायाः गृहे एका मार्जारी (बिल्ली) आगच्छति। तस्याः चत्वारः शावकाः (चार बच्चे) सन्ति — तन्वी, मृद्वी, शबलः, भीमः च। राधिका तान् दृष्ट्वा अतीव प्रसन्ना भवति। सा तेभ्यः क्षीरं (दूध) पाययति। पितामही राधिकां वदति — "अतिथिदेवो भव"। मुग्धभावेन राधिका शावकान् अपि स्व-अतिथयः मत्वा तेषां सेवां करोति।
संख्याज्ञानम्: एका मार्जारी, चत्वारः शावकाः, पञ्च अतिथयः।
- (क) राधिका कथं चलति स्म? $ ightarrow$ कूर्दमाना (उछलती-कूदती हुई)
- (ख) गृहे कति अतिथयः सन्ति? $ ightarrow$ पञ्च (पाँच: १ मार्जारी + ४ शावकाः)
- (ग) कां दृष्ट्वा शावकाः भीताः न भवन्ति? $ ightarrow$ राधिकाम् (राधिका को देखकर)
- (घ) मार्ज्याः कति शावकाः? $ ightarrow$ चत्वारः (चार)
- (ङ) राधिका मार्जायै किं ददाति? $ ightarrow$ क्षीरम् (दूध)
- (च) चित्रवर्णः कः अस्ति? $ ightarrow$ शबलः (चित्र-विचित्र रंग वाला शावक)
- (क) मार्जारीशावकानां नामानि कानि सन्ति?
उत्तरम्: मार्जारीशावकानां नामानि तन्वी, मृद्वी, शबलः भीमः च इति सन्ति। - (ख) राधिका मार्जारीशावकान् किं पाठयति?
उत्तरम्: राधिका मार्जारीशावकान् पाठयति — "जानन्ति किम्? अतिथिदेवो भव।" - (ग) विशिष्टाः अतिथयः के सन्ति?
उत्तरम्: काचित् मार्जारी तस्याः चत्वारः शावकाः च विशिष्टाः अतिथयः सन्ति। - (घ) पितामही राधिकां किं वदति?
उत्तरम्: पितामही वदति यत् यदा केऽपि अतिथयः आगच्छन्ति, तदा तेषां प्रेमपूर्वकं सत्कारः करणीयः।
- (क) विशिष्टाः $ ightarrow$ अतिथयः
- (ख) चत्वारः $ ightarrow$ शावकाः
- (ग) स्निग्धम् $ ightarrow$ क्षीरम्
- (घ) प्रसन्ना $ ightarrow$ राधिका
प्रश्न: राधिका द्वारा मूक पशुओं (बिल्ली व उसके बच्चों) को 'अतिथि' मानकर दूध पिलाना भारतीय संस्कृति के किस उच्च मानवीय मूल्य को दर्शाता है?
उत्तर: यह प्रसंग 'प्राणिमात्र पर दया' (Compassion for all living beings) और 'सर्वभूतहिते रताः' के वैदिक सिद्धांत को दर्शाता है। भारतीय संस्कृति केवल मनुष्यों ही नहीं, बल्कि पशु-पक्षियों और प्रकृति के प्रति भी संवेदनशील होने तथा उन्हें परिवार का हिस्सा मानने की शिक्षा देती है।
बुद्धिः सर्वार्थसाधिका (बुद्धि से ही सब कार्य सिद्ध होते हैं — पञ्चतन्त्रकथा)
शशक-गजराज-कथा — बलेन सह बुद्धेः विजयः, चातुर्येण सङ्कटनिवारणम्।
कथा-सार: सरोवरस्य तीरे शशकाः (खरगोश) सुखेन वसन्ति स्म। एकदा ग्रीष्मकाले जलपिपासया व्याकुलाः गजाः (हाथी) तत्र आगच्छन्। गजानां पादैः बहवः शशकाः मृताः। शशकराजः चतुरः आसीत्। सः चन्द्रस्य नाम्ना गजराजं भीतं कृत्वा अवदत् — "अहं चन्द्रस्य दूतः अस्मि, भगवान् चन्द्रः कुपितः अस्ति।" गजराजः सरोवरे कम्पमानं चन्द्रबिम्बं दृष्ट्वा क्षमां याचित्वा गजैः सह दूरम् अगच्छत्। शशकाः सुरक्षिताः अभवन्।
नीति-वचनम्: "बुद्धिर्यस्य बलं तस्य निर्बुद्धेस्तु कुतो बलम्।" (जिसके पास बुद्धि है, उसी के पास वास्तविक बल है।)
- (क) सरोवरस्य तीरे बिलेषु के निवसन्ति स्म? $ ightarrow$ शशकाः (खरगोश)
- (ख) केषां परिभ्रमणेन शशकाः मृताः अभवन्? $ ightarrow$ गजानाम् (हाथियों के)
- (ग) शशकराजः कस्य समीपं गच्छति? $ ightarrow$ गजराजस्य (गजराज के पास)
- (घ) शशकः कस्य दूतः इति अवदत्? $ ightarrow$ चन्द्रस्य (चन्द्रमा का)
- (ङ) सरोवरे कः कम्पितः अभवत्? $ ightarrow$ चन्द्रबिम्बः (चन्द्रमा की परछाईं)
- (च) कः चन्द्रं प्रणम्य पलायितः? $ ightarrow$ गजराजः (हाथी)
- (क) शशकाः किमर्थं चिन्तिताः अभवन्?
उत्तरम्: गजानां पादैः प्रतिदिनं बहवः शशकाः मृताः भवन्ति स्म, अतः स्वरक्षार्थं शशकाः चिन्तिताः अभवन्। - (ख) चन्द्रः केन नाम्ना प्रसिद्धः अस्ति?
उत्तरम्: चन्द्रः अङ्के शशकस्य चिह्नात् 'शशाङ्कः' इति नाम्ना प्रसिद्धः अस्ति। - (ग) गजराजः किमर्थं क्षमां याचितवान्?
उत्तरम्: गजराजः कुपितं चन्द्रं मत्वा भयेन क्षमां याचितवान्। - (घ) अनया कथया किं शिक्षामहे?
उत्तरम्: अनया शिक्षामहे यत् बुद्धिबलेन विशालं शत्रुम् अपि पराजेतुं शक्यते।
- (क) शशकाः गुहासु निवसन्ति स्म। $ ightarrow$ न (बिलेषु निवसन्ति स्म)
- (ख) गजाः पिपासिताः आसन्। $ ightarrow$ आम्
- (ग) शशकराजः चतुरः आसीत्। $ ightarrow$ आम्
- (घ) गजाः शशकान् युद्धे पराजितवन्तः। $ ightarrow$ न
प्रश्न: छोटे से खरगोश ने विशालकाय हाथी को बिना लड़े केवल बुद्धि के बल पर भगा दिया। यह घटना आज के जीवन में 'समस्या-समाधान' (Problem Solving & Critical Thinking) के संदर्भ में क्या सिखाती है?
उत्तर: यह घटना सिखाती है कि जब कोई समस्या या विरोधी हमसे शारीरिक रूप से अधिक शक्तिशाली हो, तो क्रोध या सीधे टकराव के बजाय सूझ-बूझ, परिस्थिति के सटीक विश्लेषण और बुद्धिमत्ता से काम लेना चाहिए। बुद्धि से किसी भी बड़ी से बड़ी विपत्ति का शांतिपूर्ण समाधान निकाला जा सकता है।
यः जानाति सः पण्डितः (जो जानता है, वही विद्वान है — प्रहेलिकाः)
संस्कृत-प्रहेलिकानां (पहेलियों) चमत्कारः, बुद्धेः तीक्ष्णता, पदच्छेदः अन्वयश्च।
प्रहेलिका-सार:
१. "अपदो दूरगामी च साक्षरो न च पण्डितः। अमखः स्फुटवक्ता च यो जानाति स पण्डितः॥" $
ightarrow$ उत्तरम्: पत्रम् (Letter/पत्र)। (पैर नहीं हैं पर दूर जाता है, अक्षरयुक्त है पर विद्वान नहीं, मुख नहीं है पर स्पष्ट बोलता है)।
२. "वृक्षाग्रवासी न च पक्षीराजः, त्रिनेत्रधारी न च शूलपाणिः। त्वग्वस्त्रधारी न च सिद्धयोगी, जलं च बिभ्रन्न घटो न मेघः॥" $
ightarrow$ उत्तरम्: नारिकेलम् (Coconut/नारियल)।
३. "दन्तैर्हीनः शिलाभक्षी निर्जीवो बहुभाषकः। गुणस्यूतिसमृद्धोऽपि परपादेन गच्छति॥" $
ightarrow$ उत्तरम्: पादरक्षा / उपानह् (Shoe/जूता)।
- (क) अपदो दूरगामी च साक्षरो न च पण्डितः? $ ightarrow$ पत्रम् (चिट्ठी / पत्र)
- (ख) वृक्षाग्रवासी न च पक्षीराजः, त्रिनेत्रधारी न च शूलपाणिः? $ ightarrow$ नारिकेलफलम् (नारियल)
- (ग) दन्तैर्हीनः शिलाभक्षी निर्जीवो बहुभाषकः? $ ightarrow$ उपानह् / पादरक्षा (जूता)
- (घ) कृष्णमुखी न मार्जारी द्विजिह्वा न च सर्पिणी? $ ightarrow$ लेखनी / कलमम् (कलम/पेन)
- (ङ) एकचक्षुर्न काकोऽयम्? $ ightarrow$ सूची (सुई)
- (क) अपदो = अ + पदः
- (ख) साक्षरो = स + अक्षरः
- (ग) वृक्षाग्रवासी = वृक्ष + अग्रवासी
- (घ) त्रिनेत्रधारी = त्रि + नेत्रधारी
- (ङ) बहुभाषकः = बहु + भाषकः
- (क) अपदो दूरगामी च $ ightarrow$ साक्षरो न च पण्डितः।
- (ख) अमुखः स्फुटवक्ता च $ ightarrow$ यो जानाति स पण्डितः॥
- (ग) वृक्षाग्रवासी न च पक्षीराजः $ ightarrow$ त्रिनेत्रधारी न च शूलपाणिः।
- (घ) जलं च बिभ्रन्न घटो न मेघः $ ightarrow$ त्वग्वस्त्रधारी न च सिद्धयोगी॥
प्रश्न: संस्कृत में प्रहेलिकाओं (पहेलियों) का प्रयोग प्राचीन काल से क्यों किया जाता रहा है? इससे विद्यार्थी के मस्तिष्क में किस प्रकार के कौशलों का विकास होता है?
उत्तर: संस्कृत प्रहेलिकाएँ केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि भाषा की सूक्ष्मता, तर्कशक्ति (Logical Reasoning), बौद्धिक चातुर्य और एकाग्रता को परखने की उत्कृष्ट विधा हैं। यह विद्यार्थियों में शब्दों के गूढ़ अर्थों को खोजने, उपमा-अलंकार को समझने और बौद्धिक समस्या-समाधान (Critical Problem Solving) की क्षमता को प्रखर करती हैं।
त्वम् आपणं गच्छ (तुम बाज़ार जाओ — संवादः)
दैनिक-व्यवहारे आपणस्य (बाज़ारस्य) संवादः — फल-शाक-मूल्य-पृच्छा, क्रय-विक्रयः, लोट्-लकारस्य आज्ञार्थक-प्रयोगः।
संवाद-सार: माता पुत्रं वदति — "पुत्र! त्वम् आपणं गच्छ, फलानि शाकानि च आनय।" आपणिकेन (दुकानदार) सह वार्तालापः — "कदलीफलस्य मूल्यं किम्?", "आम्रस्य मूल्यं किम्?"। आपणिकः अवदत् — "कदलीफलानि विंशति-रूप्यकाणि, आम्रस्य मूल्यं पञ्चाशत् रूप्यकाणि।"
लोट्-लकारः (Imperative Mood): गच्छ (जाओ), आनय (लाओ), ददातु (दीजिए), स्वीकुरु (स्वीकार करो)।
- (क) माता पुत्रं कुत्र गन्तुं कथयति? $ ightarrow$ आपणम् (बाज़ार)
- (ख) आपणिकः कं फलानि ददाति? $ ightarrow$ पुत्राय / ग्राहकाय (ग्राहक को)
- (ग) कदलीफलस्य मूल्यं किम्? $ ightarrow$ विंशति-रूप्यकाणि (बीस रुपये)
- (घ) आपणिकः किम् आनयति? $ ightarrow$ फलानि शाकानि च (फल और सब्ज़ियाँ)
- (ङ) 'दुकानदार' इत्यस्य संस्कृतपदं किम्? $ ightarrow$ आपणिकः
ग्राहकः: भ्रातः! एतेषां सेवान्नानां (सेब) मूल्यं किम्?
आपणिकः: सेवान्नस्य मूल्यं प्रति-किलो शतं रूप्यकाणि अस्ति।
ग्राहकः: कृपया एक-किलोमितं ददातु।
आपणिकः: अस्तु, एतत् स्वीकरोतु।
ग्राहकः: धन्यवादाः! एतानि रूप्यकाणि नयतु।
फलानि (Fruits):
- आम $ ightarrow$ आम्रम्
- केला $ ightarrow$ कदलीफलम्
- सेब $ ightarrow$ सेवफलम्
- अनार $ ightarrow$ दाडिमम्
शाकानि (Vegetables):
- आलू $ ightarrow$ आलुकम्
- टमाटर $ ightarrow$ रक्तफलम् / वार्त्ताकम्
प्रश्न: दैनिक जीवन में व्यावहारिक संस्कृत (Conversational Sanskrit) का क्या महत्व है? यदि आपको बाज़ार में जाकर दुकानदार से संस्कृत में ५ आम माँगने हों, तो आप क्या वाक्य बोलेंगे?
उत्तर: संस्कृत केवल प्राचीन ग्रंथों की भाषा नहीं, अपितु एक सजीव, मधुर एवं व्यावहारिक संप्रेषण की भाषा है। बाज़ार में ५ आम माँगने हेतु व्यावहारिक वाक्य:
• "भो आपणिक! कृपया मह्यं पञ्च आम्राणि ददातु।" (अरे दुकानदार भाई! कृपया मुझे पाँच आम दीजिए।)
• "एतेषां मूल्यं कियत् अस्ति?" (इनका मूल्य कितना है?)
पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि (पृथ्वी पर तीन रत्न — सुभाषितानि)
सदाचार-प्रेरकाः नीतिश्लोकाः — जलम् अन्नं सुभाषितं, उद्यमस्य महत्त्वं, मातृभूमेः महिमा च।
प्रमुख श्लोकार्थाः:
१. "पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि जलमन्नं सुभाषितम्। मूढैः पाषाणखण्डेषु रत्नसंज्ञा विधीयते॥" (पृथ्वी पर जल, अन्न और मधुर वाणी ही तीन सच्चे रत्न हैं, मूर्ख लोग पत्थर के टुकड़ों को रत्न कहते हैं)।
२. "उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः। न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥" (परिश्रम से ही कार्य सिद्ध होते हैं, केवल सोचने से नहीं)।
३. "विद्या ददाति विनयं विनयाद्याति पात्रताम्।"
४. "जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।" (माता और मातृभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर हैं)।
- (क) पृथिव्यां कति रत्नानि सन्ति? $ ightarrow$ त्रीणि (तीन)
- (ख) कार्याणि कैः सिध्यन्ति? $ ightarrow$ उद्यमेन (परिश्रम से)
- (ग) अयं निजः परो वेति गणना केषां भवति? $ ightarrow$ लघुचेतसाम् (संकीर्ण मन वालों की)
- (घ) विद्या किं ददाति? $ ightarrow$ विनयम् (विनम्रता)
- (ङ) जननी जन्मभूमिश्च कस्मात् गरीयसी? $ ightarrow$ स्वर्गात् (स्वर्ग से भी महान)
- (क) पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि कानि सन्ति?
उत्तरम्: पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि जलम्, अन्नं सुभाषितं च सन्ति। - (ख) मूढैः कुत्र रत्नसंज्ञा विधीयते?
उत्तरम्: मूढैः पाषाणखण्डेषु (पत्थर के टुकड़ों में) रत्नसंज्ञा विधीयते। - (ग) उदारचरितानां कृते किं कुटुम्बकम् अस्ति?
उत्तरम्: उदारचरितानां कृते वसुधा एव (सम्पूर्ण पृथ्वी) कुटुम्बकम् अस्ति। - (घ) सुप्तस्य सिंहस्य मुखे के न प्रविशन्ति?
उत्तरम्: सुप्तस्य सिंहस्य मुखे मृगाः न प्रविशन्ति।
- (क) पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि $ ightarrow$ जलमन्नं सुभाषितम्।
- (ख) उद्यमेन हि सिध्यन्ति $ ightarrow$ कार्याणि न मनोरथैः।
- (ग) उदारचरितानां तु $ ightarrow$ वसुधैव कुटुम्बकम्।
- (घ) जननी जन्मभूमिश्च $ ightarrow$ स्वर्गादपि गरीयसी।
प्रश्न: श्लोक के अनुसार हीरे-मोती जैसे बहुमूल्य पत्थरों की तुलना में 'जल, अन्न और सुभाषित' को पृथ्वी का वास्तविक रत्न क्यों कहा गया है? अपने विचार लिखिए।
उत्तर: सोना-चांदी, हीरा या माणिक्य केवल भौतिक वस्तुएँ हैं, वे किसी भूखे व्यक्ति की भूख नहीं मिटा सकते और न ही प्यासे की प्यास बुझा सकते हैं। जल और अन्न जीवन की रक्षा करते हैं और 'सुभाषित' (मधुर एवं नीतिपूर्ण वचन) मन को शांति व समाज में सद्भाव लाते हैं। इसलिए मानव जीवन के अस्तित्व और उत्कर्ष हेतु ये तीनों ही पृथ्वी के वास्तविक रत्न हैं।
आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः (आलस्य सबसे बड़ा शत्रु है)
आलस्यस्य त्यागः, परिश्रमस्य महत्त्वम्, कार्येषु तत्परता च।
नीति-श्लोकः: "आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः। नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति॥"
भावार्थः: मनुष्यों के शरीर में रहने वाला 'आलस्य' ही उनका सबसे बड़ा शत्रु है। परिश्रम (उद्यम) के समान कोई सच्चा मित्र/बंधु नहीं है, जिसे करके मनुष्य कभी दुखी नहीं होता।
समानार्थक-पदानि: रिपुः = शत्रुः; उद्यमः = परिश्रमः; बन्धुः = मित्रम्।
- (क) मनुष्याणां शरीरस्थः महान् रिपुः कः? $ ightarrow$ आलस्यम् (आलस्य)
- (ख) कस्य समः बन्धुः नास्ति? $ ightarrow$ उद्यमसमः / परिश्रमसमः (परिश्रम के समान)
- (ग) कं कृत्वा मनुष्यः नावसीदति? $ ightarrow$ उद्यमम् (परिश्रम करके)
- (घ) 'रिपुः' इत्यस्य पदस्य विलोमपदं किम्? $ ightarrow$ मित्रम् / बन्धुः
- (ङ) आलस्यं कुत्र तिष्ठति? $ ightarrow$ शरीरे (शरीर में)
अन्वयः:
मनुष्याणां शरीरस्थः आलस्यम् हि महान् रिपुः अस्ति।
उद्यमसमः बन्धुः न अस्ति, यं कृत्वा (मनुष्यः) न अवसीदति।
- (क) रिपुः $ ightarrow$ शत्रुः
- (ख) उद्यमः $ ightarrow$ परिश्रमः
- (ग) बन्धुः $ ightarrow$ मित्रम्
- (घ) शरीरम् $ ightarrow$ देहः
प्रश्न: एक विद्यार्थी के जीवन में 'आलस्य' किस प्रकार उसका सबसे बड़ा शत्रु बन जाता है? परीक्षा एवं अध्ययन के संदर्भ में इसे स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: विद्यार्थी जीवन में आलस्य के कारण कार्य को कल पर टालने की प्रवृत्ति (Procrastination) जन्म लेती है। इससे समय नष्ट होता है, पाठ्यक्रम समय पर पूरा नहीं होता और परीक्षा के समय भारी तनाव उत्पन्न होता है। इसके विपरीत, जो विद्यार्थी प्रतिदिन नियमपूर्वक परिश्रम (उद्यम) करता है, वह आत्मविश्वास से सफलता प्राप्त करता है।
माधवस्य प्रियम् अङ्गम् (माधव का प्रिय अंग — शरीराङ्गानि)
मानवशरीरस्य अङ्गानां परिचयः, तेषां कार्याणि, संख्यावाचक-शब्दानां प्रयोगः च।
शरीराङ्गानि कार्याणि च:
• नेत्रे (आँखें): पश्यतः (देखती हैं)।
• कर्णौ (कान): शृणुतः (सुनते हैं)।
• नासिका (नाक): जिघ्रति / आघ्राणं करोति (सूँघती है)।
• मुखम् / जिह्वा (जीभ): वदति, आस्वादनं करोति (बोलता है, स्वाद लेती है)।
• हस्तौ (हाथ): कार्यं कुरुतः (कार्य करते हैं)।
• पादौ (पैर): चलतः (चलते हैं)।
मञ्जूषा: [पश्यति, शृणोति, जिघ्रति, वदति, चलति, खादति]
- (क) मुखम् $ ightarrow$ वदति / खादति (बोलता है / खाता है)
- (ख) पादः $ ightarrow$ चलति (चलता है)
- (ग) कर्णः $ ightarrow$ शृणोति (सुनता है)
- (घ) नासिका $ ightarrow$ जिघ्रति (सूँघती है)
- (ङ) नेत्रम् $ ightarrow$ पश्यति (देखता है)
- (च) हस्तः $ ightarrow$ लिखति / कार्यं करोति (लिखता है / कार्य करता है)
- (क) मम एकम् शिरः अस्ति। [एकम् / द्वे]
- (ख) मम द्वौ हस्तौ स्तः। [द्वौ / त्रीणि]
- (ग) मम द्वे नेत्रे स्तः। [एकम् / द्वे]
- (घ) मम द्वौ पादौ स्तः। [द्वौ / चत्वारः]
- (ङ) मम हस्ते पञ्च अङ्गुल्यः सन्ति। [पञ्च / सप्त]
(क) माधवस्य प्रियम् अङ्गं किम् अस्ति?
उत्तरम्: माधवस्य प्रियम् अङ्गं हस्तौ अस्ति, यतो हि हस्ताभ्यां सः सर्वाणि शुभकार्याणि करोति।
(ख) वयं नेत्राभ्यां किं कुर्मः?
उत्तरम्: वयं नेत्राभ्यां सुन्दरं संसारं पश्यामः, पुस्तकानि च पठामः।
प्रश्न: शरीर के सभी अंग मिलकर ही व्यक्ति को स्वस्थ व सक्रिय बनाते हैं। इस पाठ के माध्यम से 'टीम-वर्क' (Teamwork & Collaboration) का क्या संदेश मिलता है?
उत्तर: जैसे हाथ, पैर, आँख, कान और मुख में से कोई एक भी अंग अलग रहकर कार्य नहीं कर सकता और जब सभी अंग परस्पर तालमेल से काम करते हैं तभी शरीर स्वस्थ रहता है, वैसे ही समाज, परिवार और विद्यालय में सभी सदस्यों का पारस्परिक सहयोग (टीम वर्क) ही सफलता का मूल आधार है।
वृक्षाः सत्पुरुषाः इव (वृक्ष सज्जनों के समान होते हैं — सुभाषितम्)
वृक्षाणां परोपकारित्वम्, प्रकृति-संरक्षणम्, छाया-फल-पुष्प-दानम्, पर्यावरण-चेतना च।
नीति-श्लोकार्थाः:
१. "पिबन्ति नद्यः स्वयमेव नाम्भः स्वयं न खादन्ति फलानि वृक्षाः। नादन्ति सस्यं खलु वारिवाहाः परोपकाराय सतां विभूतयः॥" (नदियाँ अपना जल स्वयं नहीं पीतीं, वृक्ष अपने फल स्वयं नहीं खाते, मेघ अपने उगाए अन्न को स्वयं नहीं खाते— सज्जनों का जीवन केवल परोपकार के लिए होता है)।
२. "छायामन्यस्य कुर्वन्ति तिष्ठन्ति स्वयमातपे। फलान्यपि परार्थाय वृक्षाः सत्पुरुषा इव॥" (वृक्ष स्वयं धूप में तपते हैं पर दूसरों को शीतल छाया देते हैं, उनके फल भी दूसरों के लिए होते हैं)।
- (क) वृक्षाः स्वयं कुत्र तिष्ठन्ति? $ ightarrow$ आतपे (धूप में)
- (ख) परोपकाराय का वहन्ति? $ ightarrow$ नद्यः (नदियाँ)
- (ग) सत्पुरुषाः इव के सन्ति? $ ightarrow$ वृक्षाः (पेड़)
- (घ) वृक्षाः स्वयं कानि न खादन्ति? $ ightarrow$ फलानि (फल)
- (ङ) सतां विभूतयः किमर्थं भवन्ति? $ ightarrow$ परोपकाराय (दूसरों की भलाई के लिए)
- (क) वृक्षाः अस्मभ्यं किं किं यच्छन्ति?
उत्तरम्: वृक्षाः अस्मभ्यं पुष्पं, फलं, छायां, मूलं, काष्ठं (दारु), प्राणवायुं च यच्छन्ति। - (ख) वृक्षाणां सत्पुरुषैः सह तुलना किमर्थं कृता?
उत्तरम्: यथा सत्पुरुषाः स्वार्थं विहाय सर्वदा परोपकारं कुर्वन्ति, तथैव वृक्षाः अपि सर्वं परार्थाय यच्छन्ति, अतः वृक्षाणां सत्पुरुषैः सह तुलना कृता। - (ग) नद्यः किं कुर्वन्ति?
उत्तरम्: नद्यः स्वजलम् अपिबन्त्यः सर्वसंसारस्य तृषां शमयन्ति।
- (क) वृक्षाः $ ightarrow$ पादपाः / तरवः
- (ख) अम्भः $ ightarrow$ जलम् / तोयम्
- (ग) वारिवाहाः $ ightarrow$ मेघाः / जलदाः
- (घ) सत्पुरुषाः $ ightarrow$ सज्जनाः / साधवः
प्रश्न: वर्तमान समय में पर्यावरण प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग की समस्या को देखते हुए 'वृक्षाः सत्पुरुषाः इव' पाठ की प्रासंगिकता (Relevance) अपने शब्दों में स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: यह पाठ हमें सिखाता है कि वृक्ष प्रकृति के सबसे बड़े परोपकारी संत हैं। वे विषैली कार्बन डाईऑक्साइड को सोखकर हमें जीवनदायिनी ऑक्सीजन (प्राणवायु) देते हैं, वर्षा लाते हैं, भूमि का क्षरण रोकते हैं और अनगिनत जीवों को आश्रय देते हैं। वृक्षों का संरक्षण और अधिक से अधिक वृक्षारोपण ही पर्यावरण संकट का एकमात्र स्थायी समाधान है।
शब्दपरिचयः I (अकारान्त-पुंल्लिङ्ग-शब्दाः)
संस्कृत पाठ्यपुस्तक | CBSE पाठ्यक्रम 2026-27 | सानुवाद-प्रश्नोत्तराणि
प्रस्तुत पाठ में अकारान्त पुंल्लिङ्ग शब्दों (जिन शब्दों के अंत में 'अ' स्वर आता है, जैसे—चषकः, सौचिकः, शुनकः, बलि Bardः, वृद्धः) तथा समीपवाची सर्वनाम (एषः, एतौ, एते) एवं दूरवाची सर्वनाम (सः, तौ, ते) के एकवचन, द्विवचन और बहुवचन रूपों का परिचय चित्रों के माध्यम से कराया गया है।
📖 मूल पाठ्यांश एवं सरल हिंदी अनुवाद
सभी अकारान्त पुंल्लिङ्ग शब्दों के अंत में स्थित विसर्ग (:) का उच्चारण आधे 'ह्' की भाँति होता है:
- छात्रः (छा-त्र-ह), शिक्षकः (शि-क्ष-क-ह), मयूरः (म-यू-र-ह), शुकः (शु-क-ह)
- बालकः (बा-ल-क-ह), गजः (ग-ज-ह), मकरः (म-क-र-ह), बिडालः (बि-डा-ल-ह)
- मूषकः (मू-ष-क-ह), चन्द्रः (चन्-द्र-ह), गायकः (गा-य-क-ह)
- कृषकः = किसान (farmer)
- वृषभः = बैल (bull)
- भल्लूकः = भालू (bear)
- मण्डूकः = मेंढक (frog)
- कपोतः = कबूतर (pigeon)
- पर्यङ्कः = पलंग (bed)
- दूरभाषः = टेलीफोन (telephone)
- काकः = कौआ (crow)
- सौचिकः = दर्जी (tailor)
- १. च् + अ + ष् + अ + क् + अः = चषकः
- २. स् + औ + च् + इ + क् + अः = सौचिकः
- ३. श् + उ + न् + अ + क् + औ = शुनकौ
- ४. ध् + आ + व् + अ + त् + अः = धावतः
- ५. व् + ऋ + द् + ध् + आः = वृद्धाः
- ६. ग् + आ + य् + अ + न् + त् + इ = गायन्ति
- लघुः = ल् + अ + घ् + उः
- सीव्यति = स् + ई + व् + य् + अ + त् + इ
- वर्णाः = व् + अ + र् + ण् + आः
- कुक्कुरौ = क् + उ + क् + क् + उ + र् + औ
- मयूराः = म् + अ + य् + ऊ + र् + आः
- बालकः = ब् + आ + ल् + अ + क् + अः
- यथा — चषकः | चषकौ | चषकाः
- बलि Bardः | बलि Bardौ | बलि Bardाः
- शुनकः | शुनकौ | शुनकाः
- मृगः | मृगौ | मृगाः
- सौचिकः | सौचिकौ | सौचिकाः
- मयूरः | मयूरौ | मयूराः
- हाथी → गजः
- कौआ → काकः
- चन्द्रमा → चन्द्रः
- ताला → तालः
- भालू → भल्लूकः
- बिल्ली → बिडालः
यथा — बालकः किं करोति? → बालकः पठति।
(क) अश्वौ किं कुरुतः? → अश्वौ धावतः।
(ख) कुक्कुराः किं कुर्वन्ति? → कुक्कुराः बुक्कन्ति।
(ग) छात्रौ किं कुरुतः? → छात्रौ तिष्ठतः / गायनम् कुरुतः।
(घ) कृषकः किं करोति? → कृषकः क्षेत्रं कर्षति।
(ङ) गजौ किं कुरुतः? → गजौ चलतः।
- गजाः → चलन्ति (हाथी चलते हैं)
- सिंहौ → गर्जतः (दो शेर गरजते हैं)
- गायकः → गायति (गायक गाता है)
- बालकौ → पठतः (दो बालक पढ़ते हैं)
- मयूराः → नृत्यन्ति (मोर नाचते हैं)
(क) मयूराः नृत्यन्ति।
(ख) गजौ चलतः।
(ग) वृक्षाः फलन्ति।
(घ) सिंहौ गर्जतः।
(ङ) वानरः खादति।
(च) अश्वः धावति।
यथा — अश्वः धावति। → सः धावति।
(क) गजाः चलन्ति। → ते चलन्ति। (बहुवचन)
(ख) छात्रौ पठतः। → तौ पठतः। (द्विवचन)
(ग) वानराः क्रीडन्ति। → ते क्रीडन्ति। (बहुवचन)
(घ) गायकः गायति। → सः गायति। (एकवचन)
(ङ) मयूराः नृत्यन्ति। → ते नृत्यन्ति। (बहुवचन)
प्रश्न: "सः वस्त्रं सिव्यति" तथा "तौ क्षेत्रं कर्षतः" अनयोः वाक्ययोः सौचिकस्य कृषकस्य च महत्त्वं स्पष्टीकुरुत।
उत्तर: समाजस्य मूलभूतावश्यकतासु 'वस्त्रम्' 'अन्नम्' च प्रमुखे स्तः। सौचिकः (दर्जी) वस्त्रं सीव्यति येन मनुष्यस्य लज्जा-रक्षणं शीत-तापात् रक्षणं च भवति। कृषकः (किसान) क्षेत्रं कर्षति अन्नानि च उत्पादयति येन समग्र-संसारस्य पोषणं भवति। उभौ श्रमजीविनौ समाजस्य आधारस्तम्भौ स्तः।
शब्दपरिचयः II (आकारान्त-स्त्रीलिङ्ग-शब्दाः)
संस्कृत पाठ्यपुस्तक | CBSE पाठ्यक्रम 2026-27 | सानुवाद-प्रश्नोत्तराणि
प्रस्तुत पाठ में आकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों (जिन शब्दों के अंत में 'आ' स्वर आता है, जैसे—दोला, घटिका, चटका, महिला, चालिका, स्थालिका) तथा समीपवाची सर्वनाम (एषा, एते, एताः) एवं दूरवाची सर्वनाम (सा, ते, ताः) के एकवचन, द्विवचन और बहुवचन रूपों का अभ्यास कराया गया है।
📖 मूल पाठ्यांश एवं सरल हिंदी अनुवाद
ये सभी आकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्द हैं, जिनके अंत में दीर्घ 'आ' स्वर का स्पष्ट उच्चारण होता है:
छात्रा, लता, प्रयोगशाला, लेखिका, शिक्षिका, पेटिका, नौका, चटका, महिला, मापिका, वीणा, छुरीका।
- सूचिका = सुई (needle)
- पिपीलिका = चींटी (ant)
- कुञ्चिका = चाबी (key)
- द्विचक्रिका = साइकिल (bicycle)
- उत्पीठिका = मेज (table)
- मक्षिका = मक्खी (fly)
- अग्निपेटिका = माचिस (matchbox)
- मापिका = स्केल/पटरी (ruler)
- वीणा = वीणा (lute/veena)
- १. क् + उ + र् + उ + त् + अः = कुरुतः
- २. उ + द् + य् + आ + न् + ए = उद्याने
- ३. स् + थ् + आ + ल् + इ + क् + आः = स्थालिकाः
- ४. घ् + अ + ट् + इ + क् + आ = घटिका
- ५. स् + त् + र् + ई + ल् + इ + ङ् + ग् + अः = स्त्रीलिङ्गः
- ६. म् + आ + प् + इ + क् + आ = मापिका
- कोकिले = क् + ओ + क् + इ + ल् + ए
- चटके = च् + अ + ट् + अ + क् + ए
- धाविकाः = ध् + आ + व् + इ + क् + आः
- कुञ्चिका = क् + उ + ञ् + च् + इ + क् + आ
- खट्वा = ख् + अ + ट् + व् + आ
- छुरिका = छ् + उ + र् + इ + क् + आ
- मेज → उत्पीठिका
- संदूक/पेटी → पेटिका
- नाव → नौका
- चिड़िया → चटका
- महिला → महिला
- स्केल/पटरी → मापिका
- यथा — लता | लते | लताः
- गीता | गीते | गीताः
- पेटिका | पेटिके | पेटिकाः
- खट्वा | खट्वे | खट्वाः
- सा | ते | ताः
- रोटिका | रोटिके | रोटिकाः
(क) अजे चरतः। (अजा/अजे) — द्विवचन
(ख) द्विचक्रिकाः सन्ति। (द्विचक्रिके/द्विचक्रिकाः) — बहुवचन
(ग) नौका चलति। (नौके/नौका) — एकवचन
(घ) सूचिका अस्ति। (सूचिके/सूचिका) — एकवचन
(ङ) मक्षिकाः उत्पतन्ति। (मक्षिकाः/मक्षिके) — बहुवचन
यथा — लता अस्ति। → सा अस्ति।
(क) महिलाः धावन्ति। → ताः धावन्ति।
(ख) सुधा वदति। → सा वदति।
(ग) जवनिते दोलतः। → ते दोलतः।
(घ) पिपीलिकाः चलन्ति। → ताः चलन्ति।
(ङ) चटके कूजतः। → ते कूजतः।
(क) पुष्पमालाः सन्ति।
(ख) बालकः पश्यति।
(ग) लेखिका लिखति।
(घ) सिंहः गर्जति।
(ङ) त्रिचक्रिका चलति।
(क) सौम्या नृत्यति।
(ख) चटके विहरतः।
(ग) बालिके गायतः।
(घ) छात्राः लिखन्ति।
(ङ) जनाः पश्यन्ति।
प्रश्न: "ते चालिके स्तः। ते वाहनं चालयतः।" अस्मिन् पाठ्यांशे महिला-सशक्तीकरणस्य (Women Empowerment) कः सन्देशः निहितः अस्ति?
उत्तर: अस्मिन् पाठे महिलाः केवलं गृहकार्ये संलग्नाः न दर्शिताः, अपितु ताः 'चालिके' भूत्वा आधुनिक-वाहनानि चालयन्त्यः दर्शिताः। एतत् दर्शयति यत् नारी समाजस्य प्रत्येकस्मिन् क्षेत्रे समर्था, स्वावलम्बिनी, आत्मविश्वासेन परिपूर्णा च अस्ति।
शब्दपरिचयः III (अकारान्त-नपुंसकलिङ्ग-शब्दाः)
संस्कृत पाठ्यपुस्तक | CBSE पाठ्यक्रम 2026-27 | सानुवाद-प्रश्नोत्तराणि
प्रस्तुत पाठ में अकारान्त नपुंसकलिङ्ग शब्दों (जैसे—खनित्रम्, विश्रामगृहम्, भित्तिकम्, अङ्गुलीयकम्, बसयानम्, रेलस्थानकम्, पुस्तकम्, करवस्त्रम्, फलम्) तथा समीपवाची सर्वनाम (एतत्, एते, एतानि) एवं दूरवाची सर्वनाम (तत्, ते, तानि) के एकवचन, द्विवचन और बहुवचन रूपों का अभ्यास कराया गया है।
📖 मूल पाठ्यांश एवं सरल हिंदी अनुवाद
सभी अकारान्त नपुंसकलिङ्ग शब्दों के अंत में हलन्त 'म्' का शुद्ध नासिक्य उच्चारण होता है:
फलम्, द्वारम्, सूत्रम्, गृहम्, विमानम्, छत्रम्, पात्रम्, कमलम्, भवनम्, जलम्, पुस्तकम्।
- पर्णम् = पत्ता (leaf)
- क्रीडनकम् = खिलौना (toy)
- नारिकेलम् = नारियल (coconut)
- सङ्गणकम् = कंप्यूटर (computer)
- वातायनम् = खिड़की (window)
- सोपानम् = सीढ़ी (stairs)
- उद्यानम् = बगीचा (garden)
- उपनेत्रम् = चश्मा (spectacles)
- कङ्कतम् = कंघी (comb)
- १. प् + अ + र् + ण् + अ + म् = पर्णम्
- २. ख् + अ + न् + इ + त् + र् + अ + म् = खनित्रम्
- ३. प् + उ + र् + आ + ण् + आ + न् + इ = पुराणानि
- ४. प् + ओ + ष् + अ + क् + आ + ण् + इ = पोषकाणि
- ५. क् + अ + ङ् + क् + अ + त् + अ + म् = कङ्कतम्
- व्यजनम् = व् + य् + अ + ज् + अ + न् + अ + म्
- पुस्तकम् = प् + उ + स् + त् + अ + क् + अ + म्
- भित्तिकम् = भ् + इ + त् + त् + इ + क् + अ + म्
- नूतनानि = न् + ऊ + त् + अ + न् + आ + न् + इ
- वातायनम् = व् + आ + त् + आ + य् + अ + न् + अ + म्
- उपनेत्रम् = उ + प् + अ + न् + ए + त् + र् + अ + म्
- आम → आम्रम्
- पत्ता → पर्णम्
- पंखा → व्यजनम्
- रूमाल → करवस्त्रम्
- धागा → सूत्रम्
- छाता → छत्रम्
(क) किं पतति? → फलं पतति। (फल गिरता है)
(ख) मयूरौ किं कुरुतः? → मयूरौ नृत्यतः। (दो मोर नाचते हैं)
(ग) एते के स्तः? → एते क्रीडनके स्तः। (ये दो खिलौने हैं)
(घ) बालिकाः किं कुर्वन्ति? → बालिकाः पठन्ति। (बालिकाएँ पढ़ती हैं)
(ङ) कानि विकसन्ति? → पुष्पाणि विकसन्ति। (फूल खिलते हैं)
यथा — एतत् पतति। (बहुवचने) → एतानि पतन्ति।
(क) एते पर्णे स्तः। (बहुवचने) → एतानि पर्णानि सन्ति।
(ख) मयूरः नृत्यति। (बहुवचने) → मयूराः नृत्यन्ति।
(ग) एतानि यानानि। (द्विवचने) → एते याने।
(घ) छात्रे लिखतः। (बहुवचने) → छात्राः लिखन्ति।
(ङ) नारिकेलं पतति। (द्विवचने) → नारिकेले पततः।
- कोकिले → कूजतः (दो कोयल कूकती हैं)
- पवनः → वहति (हवा बहती है)
- पुष्पम् → विकसति (फूल खिलता है)
- खगः → उत्पतति (पक्षी उड़ता है)
- मयूराः → नृत्यन्ति (मोर नाचते हैं)
- सिंहाः → गर्जन्ति (शेर गरजते हैं)
प्रश्न: "तानि कदलीफलानि सन्ति। तानि मधुराणि पोषकाणि च।" अस्मिन् पाठ्यांशे फलस्य पोषण-महत्त्वं किम् अस्ति तथा च स्वस्थ-जीवनाय फलसेवनं किमर्थम् आवश्यकम्?
उत्तर: कदलीफलानि (केले) मधुराणि (मीठे) पोषकाणि (ऊर्जावर्धक/पोषक) च भवन्ति। एतेन अस्माकं शरीराय ऊर्जा, विटामिन्स, खनिजतत्त्वानि च प्राप्यन्ते। जङ्क-फूडस्य त्यागेन प्राकृतिक-फलानां सेवनम् एव 'स्वस्थ भारत, समृद्ध भारत' इत्यस्य आधारः अस्ति।
विद्यालयः (हमारा विद्यालय — संवाद एवं सर्वनाम)
संस्कृत पाठ्यपुस्तक | CBSE पाठ्यक्रम 2026-27 | सानुवाद-प्रश्नोत्तराणि
इस पाठ में विद्यालय परिसर, कंप्यूटर प्रयोगशाला (सङ्गणकयन्त्र-प्रयोगशाला), पुस्तकालय, बगीचा आदि का परिचय दिया गया है। साथ ही छात्रों के आपसी परिचय के सरल संस्कृत संवादों द्वारा अस्मद् (अहम्, आवाम्, वयम्) एवं युष्मद् (त्वम्, युवाम्, यूयम्) सर्वनामों का अत्यंत व्यावहारिक प्रयोग सिखाया गया है।
📖 मूल पाठ्यांश एवं सरल हिंदी संवाद-अनुवाद
अस्मद् (मैं/हम): प्रथमा: अहम् (मैं) - आवाम् (हम दोनों) - वयम् (हम सब) | द्वितीया: माम् - आवाम् - अस्मान् | षष्ठी: मम (मेरा) - आवयोः (हम दोनों का) - अस्माकम् (हमारा/हम सबका)
युष्मद् (तुम/आप): प्रथमा: त्वम् (तू/तुम) - युवाम् (तुम दोनों) - यूयम् (तुम सब) | द्वितीया: त्वाम् - युवाम् - युष्मान् | षष्ठी: तव (तुम्हारा) - युवयोः (तुम दोनों का) - युष्माकम् (तुम सबका)
यथा — अहं पठामि। (बहुवचने) → वयं पठामः।
(क) अहं नृत्यामि। (बहुवचने) → वयं नृत्यामः।
(ख) त्वं पठसि। (बहुवचने) → यूयं पठथ।
(ग) युवां क्रीडथः। (एकवचने) → त्वं क्रीडसि।
(घ) आवां गच्छावः। (बहुवचने) → वयं गच्छामः।
(ङ) अस्माकं पुस्तकानि। (एकवचने) → मम पुस्तकम्।
(च) तव गृहम्। (द्विवचने) → युवयोः गृहे।
(क) अहम् पठामि। (वयम्/अहम्)
(ख) युवाम् गच्छथः। (युवाम्/यूयम्)
(ग) एतत् मम पुस्तकम्। (माम्/मम)
(घ) युष्माकम् क्रीडनकानि। (युष्मान्/युष्माकम्)
(ङ) आवाम् छात्रे स्वः। (वयम्/आवाम्)
(च) एषा तव लेखनी। (तव/त्वाम्)
यथा — अहं पठामि।
(क) त्वं पठसि।
(ख) आवां गच्छावः।
(ग) यूयं पश्यथ।
(घ) अहं लिखामि।
(ङ) युवां क्रीडथः।
(च) वयं धावामः।
(क) एतत् मम गृहम्। (यह मेरा घर है)
(ख) आवयोः मैत्री दृढा। (हम दोनों की मित्रता पक्की है)
(ग) एषः तव विद्यालयः। (यह तुम्हारा विद्यालय है)
(घ) एषा युवयोः अध्यापिका। (यह तुम दोनों की अध्यापिका हैं)
(ङ) भारतम् अस्माकम् देशः। (भारत हमारा देश है)
(च) एतानि युष्माकम् पुस्तकानि। (ये तुम सब की पुस्तकें हैं)
- एषः → एते (बहुवचन)
- सः → ते (बहुवचन)
- ताः → सा (एकवचन)
- त्वम् → यूयम् (बहुवचन)
- एताः → एषा (एकवचन)
- तव → युष्माकम् (बहुवचन)
- अस्माकम् → मम (एकवचन)
- तानि → तत् (एकवचन)
(क) वार्तालाप रिक्तस्थान पूर्ति:
प्रियंवदा: शकुन्तले! त्वं किं करोषि?
शकुन्तला: प्रियंवदे! अहं नृत्यामि। त्वं किं करोषि?
प्रियंवदा: शकुन्तले! अहं गायामि। किं त्वं न गायसि?
शकुन्तला: प्रियंवदे! अहं न गायामि, अहं तु नृत्यामि।
प्रियंवदा: शकुन्तले! किं तव माता नृत्यति?
शकुन्तला: आम्, मम माता अपि नृत्यति।
प्रियंवदा: साधु! आवां चलावः।
(ख) सर्वनाम एवं अर्थ मिलान:
- सा → वह (स्त्रीलिङ्ग)
- तानि → वे (नपुंसकलिङ्ग)
- अस्माकम् → हमारा
- यूयम् → तुम सब
- आवाम् → हम दोनों
- मम → मेरा
- युवयोः → तुम दोनों का
- तव → तुम्हारा
प्रश्न: विद्यालये सङ्गणक-प्रयोगशालायाः (Computer Lab) पुस्तकालयस्य च उपस्थित्या छात्राणां सर्वाङ्गीण-विकासे कीदृशः प्रभावः भवति?
उत्तर: सङ्गणक-प्रयोगशाला आधुनिक-डिजिटल-कौशलानां (Digital Literacy) विकासाय सहायिका भवति, यत् NEP 2020 इत्यस्य प्रमुखं लक्ष्यम् अस्ति। पुस्तकालयेन च स्वाध्यायस्य, भाषा-दक्षतायाः, ज्ञान-विस्तारस्य च संस्कारः दृढो भवति।
वृक्षाः (वृक्ष — प्रकृति के परोपकारी संत)
डॉ. हर्षदेव माधव | CBSE पाठ्यक्रम 2026-27 | सान्वय-भावार्थ-अभ्यास-प्रश्नोत्तराणि
प्रसिद्ध संस्कृत कवि डॉ. हर्षदेव माधव द्वारा रचित यह कविता वृक्षों की महिमा और उनके परोपकारी स्वभाव का अत्यंत सजीव चित्रण करती है। वृक्ष प्रत्येक वन में निवास करते हैं और वनों की रचना करते हैं। वे अपनी जड़ों से पाताल को छूते हैं और सिर पर आकाश को ढोते हैं। वे केवल हवा और पानी पीकर तपस्वियों की भाँति जीते हैं और अपनी छाया रूपी बिछौने से सभी का सत्कार करते हैं।
📖 मूल श्लोकाः, अन्वयः एवं सरल हिंदी भावार्थ
भावार्थ: वृक्ष प्रत्येक वन में निवास करते हैं और इस प्रकार वृक्ष ही प्रत्येक वन की रचना करते हैं।)
श्लोक २: शाखादोलासीना विहगाः। तैः किमपि कूजन्ति वृक्षाः॥ (अन्वयः: विहगाः शाखादोलासीनाः (सन्ति), तैः वृक्षाः किमपि कूजन्ति।
भावार्थ: पक्षी डालियों रूपी झूले पर बैठे हैं, उनके द्वारा मानो वृक्ष भी कुछ-कुछ मधुर कूक रहे हैं।)
श्लोक ३: पिबन्ति पवनं जलं सन्ततम्। साधुजना इव सर्वे वृक्षाः॥ (अन्वयः: सर्वे वृक्षाः सन्ततं पवनं जलं पिबन्ति, (ते) साधुजनाः इव (सन्ति)।
भावार्थ: सभी पेड़ निरंतर केवल हवा और पानी पीते हैं, वे तपस्वी साधुओं की तरह परोपकारी हैं।)
श्लोक ४: स्पृशन्ति पादैः पातालं च। नभः शिरस्सु वहन्ति वृक्षाः॥ (अन्वयः: वृक्षाः पादैः पातालं च स्पृशन्ति, शिरस्सु नभः वहन्ति।
भावार्थ: वृक्ष अपने जड़ रूपी पैरों से पाताल को छूते हैं और सिर पर आकाश का भार ढोते हैं।)
श्लोक ५: पयोदर्पणे स्वप्रतिबिम्बम्। कौतुकेन पश्यन्ति वृक्षाः॥ (अन्वयः: वृक्षाः पयोदर्पणे कौतुकेन स्वप्रतिबिम्बं पश्यन्ति।
भावार्थ: वृक्ष जल रूपी दर्पण में आश्चर्य और कौतूहल से अपनी परछाईं को देखते हैं।)
श्लोक ६: प्रसार्य स्वच्छायासंस्तरणम्। कुर्वन्ति सत्कारं वृक्षाः॥ (अन्वयः: वृक्षाः स्वच्छायासंस्तरणं प्रसार्य सत्कारं कुर्वन्ति।
भावार्थ: वृक्ष अपनी छाया रूपी बिछौने को फैलाकर सभी प्राणियों का आदर-सत्कार करते हैं।)
- यथा — वनम् | वने | वनानि
- जलम् | जले | जलानि
- बिम्बम् | बिम्बे | बिम्बानि
- यथा — वृक्षम् | वृक्षौ | वृक्षान्
- पवनम् | पवनौ | पवनान्
- जनम् | जनौ | जनान्
यथा — अहं रोटिकाम् खादामि। (रोटिका)
(क) त्वं जलम् पिबसि। (जल)
(ख) छात्रः दूरदर्शनम् पश्यति। (दूरदर्शन)
(ग) वृक्षाः पवनम् पिबन्ति। (पवन)
(घ) ताः कथाम् लिखन्ति। (कथा)
(ङ) आवां जन्तुशालाम् गच्छावः। (जन्तुशाला)
- (क) वृक्षाः नभः शिरस्सु वहन्ति। → कर्तृपदम्: वृक्षाः
- (ख) विहगाः वृक्षेषु कूजन्ति। → कर्तृपदम्: विहगाः
- (ग) पयोदर्पणे वृक्षाः स्वप्रतिबिम्बं पश्यन्ति। → कर्तृपदम्: वृक्षाः
- (घ) कृषकः अन्नानि उत्पादयति। → कर्तृपदम्: कृषकः
- (ङ) सरोवरे मत्स्याः सन्ति। → कर्तृपदम्: मत्स्याः
(क) वृक्षाः कैः पातालं स्पृशन्ति?
उत्तरम्: पादैः (अपनी जड़ों रूपी पैरों से)
(ख) वृक्षाः किं रचयन्ति?
उत्तरम्: वनम् (जंगल बनाते हैं)
(ग) विहगाः कुत्र आसीनाः?
उत्तरम्: शाखादोलासीनाः / शाखासु (डालियों रूपी झूले पर)
(घ) कौतुकेन वृक्षाः किं पश्यन्ति?
उत्तरम्: स्वप्रतिबिम्बम् (अपनी परछाईं को)
- प्रथमा: गजः - गजौ - गजाः | अश्वः - अश्वौ - अश्वाः
- द्वितीया: सूर्यम् - सूर्यौ - सूर्यान् | चन्द्रम् - चन्द्रौ - चन्द्रान्
- तृतीया: विडालेन - विडालाभ्याम् - विडालैः | मण्डूकेन - मण्डूकाभ्याम् - मण्डूकैः
- चतुर्थी: सर्पाय - सर्पाभ्याम् - सर्पेभ्यः | वानराय - वानराभ्याम् - वानरेभ्यः
- पञ्चमी: मोदकात् - मोदकाभ्याम् - मोदकेभ्यः | वृक्षात् - वृक्षाभ्याम् - वृक्षेभ्यः
- षष्ठी: जनस्य - जनयोः - जनानाम् | शुकस्य - शुकयोः - शुकानाम्
- सप्तमी: शिक्षके - शिक्षकयोः - शिक्षकेषु | मयूरे - मयूरयोः - मयूरेषु
- सम्बोधनम्: हे बालक! - हे बालकौ! - हे बालकाः! | हे नर्तक! - हे नर्तकौ! - हे नर्तकाः!
- क. गङ्गा, लता, यमुना, नर्मदा → लता (अन्य तीनों नदियाँ हैं, लता बेल है)
- ख. उद्यानम्, कुसुमम्, चित्रम्, वाटिका → चित्रम् (अन्य तीनों बगीचे/प्रकृति से सम्बद्ध हैं)
- ग. लेखनी, तूलिका, चटका, कलिका → चटका (चटका पक्षी है, अन्य पठन/लेखन/पुष्प हैं)
- घ. आम्रम्, कदलीफलम्, मोदकम्, नारङ्गम् → मोदकम् (मोदक मिठाई है, अन्य सभी फल हैं)
प्रश्न: "साधुजना इव सर्वे वृक्षाः" — वृक्षाणां परोपकारी-स्वभावेन मानव-समाजेन का शिक्षा प्राप्यते? पर्यावरण-संरक्षणाय वृक्षाणां महत्त्वं विशदयत।
उत्तर: वृक्षाः केवलं पवनं जलं च पीत्वा जीवनं यापयन्ति, किन्तु ते मानवेभ्यः फलं, छायां, प्राणवायुम् (ऑक्सीजन), काष्ठं, औषधं च निःस्वार्थभावेन यच्छन्ति। मानव-समाजेन अपि वृक्षाणां जीवनशैलीतः निःस्वार्थ-परोपकारः, त्यागः, सहनशीलता, पर्यावरण-रक्षणं च शिक्षणीयम्। वृक्षाणाम् अभावे भूमौ जीवनम् एव असम्भवं भविष्यति।
समुद्रतटः (भारतस्य प्रमुख-समुद्रतटाः)
संस्कृत पाठ्यपुस्तक | CBSE पाठ्यक्रम 2026-27 | सानुवाद-अभ्यास-प्रश्नोत्तराणि
प्रस्तुत पाठ में तृतीया विभक्ति (करण कारक — से, के द्वारा) के प्रयोग का सुंदर वर्णन भारत के प्रसिद्ध समुद्र तटों के माध्यम से किया गया है। भारत तीनों ओर से समुद्रों (पूर्व में बङ्गोपसागर, दक्षिण में हिन्दमहासागर तथा पश्चिम में अरबसागर) से घिरा होने के कारण प्रायद्वीपः (Peninsula) कहलाता है। मुम्बई का जुहूतट, गोवा का तट, कोच्चि, विशाखापत्तनम् तथा चेन्नै का प्रसिद्ध 'मेरीनातट' (भारत का सबसे लम्बा तट) दर्शनीय हैं। कन्याकुमारी के तट पर तीनों सागरों का संगम होता है।
📖 मूल पाठ्यांश एवं सरल हिंदी अनुवाद
छात्र कक्षा में शिक्षक के साथ शुद्ध उच्चारण का अभ्यास करें:
- तरङ्गैः (त-रङ्-गैः) — तृतीया विभक्ति बहुवचन
- मत्स्यजीविनः (मत्-स्य-जी-वि-नः) — प्रथमा बहुवचन
- नारिकेलफलेभ्यः (ना-रि-के-ल-फ-लेभ्यः) — चतुर्थी/पञ्चमी बहुवचन
- तिसृषु (ति-सृ-षु) — स्त्रीलिङ्ग सप्तमी बहुवचन
- वैदेशिकपर्यटकेभ्यः (वै-दे-शि-क-पर्-य-ट-केभ्यः)
- सङ्गमः (सङ्-ग-मः)
- बङ्गोपसागरः (बङ्-गो-प-सा-ग-रः)
- चन्द्रोदयः (चन्-द्रो-द-यः)
(क) जनाः काभिः जलविहारं कुर्वन्ति?
उत्तरम्: जनाः नौकाभिः जलविहारं कुर्वन्ति। (लोग नावों के द्वारा जलविहार करते हैं।)
(ख) भारतस्य दीर्घतमः समुद्रतटः कः?
उत्तरम्: भारतस्य दीर्घतमः समुद्रतटः चेन्नैनगरस्य मेरीनातटः अस्ति। (भारत का सबसे लम्बा समुद्र तट चेन्नै नगर का मेरीना तट है।)
(ग) जनाः कुत्र स्वैरं विहरन्ति?
उत्तरम्: जनाः मुम्बईनगस्य जुहूतटे स्वैरं विहरन्ति। (लोग मुम्बई नगर के जुहू तट पर बेरोक-टोक घूमते हैं।)
(घ) बालकाः बालुकाभिः किं रचयन्ति?
उत्तरम्: बालकाः बालुकाभिः बालुकागृहं रचयन्ति। (बालक रेत से रेत का घरौंदा बनाते हैं।)
(ङ) कोच्चितटः केभ्यः ज्ञायते?
उत्तरम्: कोच्चितटः नारिकेलफलेभ्यः ज्ञायते। (कोच्चि का तट नारियल के फलों के लिए जाना जाता है।)
(क) भारतदेशः प्रायद्वीपः इति कथ्यते।
(ख) भारतस्य पूर्वदिशायां बङ्गोपसागरः अस्ति।
(ग) भारतस्य दक्षिणदिशायां हिन्दमहासागरः पश्चिमदिशायां च अरबसागरः अस्ति।
(घ) भारतस्य तिसृषु दिशासु समुद्राः सन्ति, अतः सः प्रायद्वीपः।
(ङ) त्रयाणाम् अपि सागराणां सङ्गमः कन्याकुमारीतटे भवति।
| स्तम्भ 'क' | स्तम्भ 'ख' (उचित मेल) | अर्थः |
|---|---|---|
| समुद्रतटः | पर्यटनाय | घूमने के लिए |
| क्रीडनकम् | खेलनाय | खेलने के लिए |
| दुग्धम् | पोषणाय | पोषण के लिए |
| दीपकः | प्रकाशाय | उजाले के लिए |
| विद्या | ज्ञानाय | ज्ञान प्राप्ति के लिए |
व्याकरण-टिप्पणी: यहाँ 'चतुर्थी विभक्ति' (तादर्थ्ये चतुर्थी — प्रयोजन के लिए) का प्रयोग हुआ है।
यथा — व्योमः मित्रेण सह गच्छति। (मित्र)
(क) बालकाः बालिकाभिः सह पठन्ति। (बालिका — आकारान्त स्त्रीलिङ्ग तृतीया बहुवचन)
(ख) तड़ागः कमलैः विभाति। (कमल — अकारान्त नपुंसकलिङ्ग तृतीया बहुवचन)
(ग) अहम् अपि कन्दुकेन खेलामि। (कन्दुक — अकारान्त पुंल्लिङ्ग तृतीया एकवचन)
(घ) अश्वाः अश्वैः सह धावन्ति। (अश्व — अकारान्त पुंल्लिङ्ग तृतीया बहुवचन)
(ङ) मृगाः मृगैः सह चरन्ति। (मृग — तृतीया बहुवचन)
(च) सः नेत्राभ्याम् पश्यति। (नेत्र — द्विवचन 'नेत्राभ्याम्')
(क) गङ्गा, यमुना, नर्मदा, लता — भिन्न पदम्: लता (कारण: गङ्गा, यमुना, नर्मदा नदियाँ हैं, लता बेल है।)
(ख) उद्यानम्, कुसुमम्, फलम्, चित्रम् — भिन्न पदम्: चित्रम् (कारण: उद्यान, कुसुम, फल प्रकृति/बगीचे से सम्बद्ध हैं।)
(ग) लेखनी, तूलिका, चटका, कलिका — भिन्न पदम्: चटका (कारण: चटका पक्षी है, अन्य लेखन/चित्रकला साधन या वनस्पति हैं।)
(घ) आम्रम्, कदलीफलम्, मोदकम्, नारङ्गम् — भिन्न पदम्: मोदकम् (कारण: मोदक मिठाई है, अन्य सभी फल हैं।)
प्रश्न: "भारतदेशः प्रायद्वीपः इति किमर्थं कथ्यते?" अस्मिन् वाक्ये 'प्रायद्वीपः' शब्दस्य भौगोलिकः अर्थः कः तथा च भारतस्य त्रिषु भागेषु स्थितानां त्रयाणां सागराणां नामानि लिखत।
उत्तर: यः भूभागः तिसृषु दिशासु जलेन परिवेष्टितः भवति, सः 'प्रायद्वीपः' (Peninsula) कथ्यते। भारतदेशः अपि त्रिभिः सागरैः आवृतः अस्ति:
- पूर्वदिशायाम् — बङ्गोपसागरः (Bay of Bengal)
- दक्षिणदिशायाम् — हिन्दमहासागरः (Indian Ocean)
- पश्चिमदिशायाम् — अरबसागरः (Arabian Sea)
अतः अस्मादेव कारणात् भारतदेशः 'प्रायद्वीपः' इति कथ्यते।
बकस्य प्रतीकारः (बगुले का बदला — जैसी करनी वैसी भरनी)
संस्कृत पाठ्यपुस्तक | CBSE पाठ्यक्रम 2026-27 | सानुवाद-अभ्यास-प्रश्नोत्तराणि
यह पंचतंत्र शैली की एक प्रसिद्ध शिक्षाप्रद नीति-कथा है, जिसमें अव्यय पदों (Indéclinables — यदा, तदा, कदा, एकदा, अपि, अधुना, सहसा, एव आदि) का प्रचुर प्रयोग हुआ है। एक वन में सियार (शृगालः) और बगुला (बकः) रहते थे। सियार ने कपट भाव से बगुले को खीर खाने का निमंत्रण दिया और चौड़ी थाली (स्थाली) में खीर परोस दी, जिससे लंबी चोंच वाला बगुला खीर नहीं खा सका और सियार सारी खीर खा गया। बगुले ने भी सियार को सबक सिखाने के लिए संकीर्ण मुख वाले सुराहीदार कलश (सङ्कीर्णमुखे कलशे) में खीर परोसी। सियार उसमें मुँह नहीं डाल सका और बगुले ने सारी खीर खाकर बदला ले लिया।
📖 मूल पाठ्यांश एवं सरल हिंदी अनुवाद
ये सभी पद अव्यय (अपरिवर्तनीय शब्द) हैं, जिनका रूप तीनों लिङ्गों, सभी विभक्तियों और वचनों में एकसमान रहता है:
- यत्र (जहाँ), तत्र (वहाँ), कुत्र (कहाँ), अत्र (यहाँ), एकत्र (इकट्ठा), अन्यत्र (दूसरी जगह)
- यदा (जब), तदा (तब), कदा (कब), एकदा (एक बार)
- अद्य (आज), श्वः (कल - आने वाला), ह्यः (कल - बीता हुआ), प्रातः (सुबह), सायम् (शाम), चिरम् (देर तक)
- सहसा (अचानक), एव (ही), कुतः (कहाँ से), अपि (भी), च (और)
(क) प्रातः भ्रमणं स्वास्थ्याय भवति। (सुबह घूमना स्वास्थ्य के लिए अच्छा होता है।)
(ख) सर्वदा सत्यं वद। (हमेशा सच बोलो।)
(ग) त्वं कदा मातुलगृहं गमिष्यसि? (तुम कब मामा के घर जाओगे?)
(घ) दिनेशः विद्यालयं गच्छति, अहम् अपि तेन सह गच्छामि। (दिनेश विद्यालय जाता है, मैं भी उसके साथ जाता हूँ।)
(ङ) अधुना विज्ञानस्य युगः अस्ति। (अब विज्ञान का युग है।)
(च) अद्य रविवासरः अस्ति। (आज रविवार है।)
(क) शृगालस्य मित्रं कः आसीत्?
उत्तरम्: शृगालस्य मित्रं बकः आसीत्। (सियार का मित्र बगुला था।)
(ख) स्थालितः कः भोजनं खादितुं न अशक्नोत् / न अखादत्?
उत्तरम्: स्थालितः बकः भोजनं खादितुं न अशक्नोत्। (थाली से बगुला भोजन नहीं खा सका।)
(ग) बकः शृगालाय भोजने किम् अयच्छत्?
उत्तरम्: बकः शृगालाय भोजने सङ्कीर्णमुखे कलशे क्षीरोदनम् अयच्छत्। (बगुले ने सियार को भोजन में संकीर्ण मुख वाले कलश में खीर दी।)
(घ) शृगालस्य स्वभावः कीदृशः भवति?
उत्तरम्: शृगालस्य स्वभावः कुटिलः (कुटिलस्वभावः) भवति। (सियार का स्वभाव धूर्त/कपटी होता है।)
- शत्रुः — मित्रम्
- सुखदम् — दुःखदम्
- दुर्व्यवहारः — सद्व्यवहारः
- शत्रुता — मित्रता
- सायम् — प्रातः
- अप्रसन्नः — प्रसन्नः
- असमर्थः — समर्थः
एकदा एकः काकः पिपासितः आसीत्। सः जलं पातुम् इतस्ततः अभ्रमत्। परं कुत्रापि जलं न प्राप्नोत्। अन्ते सः एकं घटम् अपश्यत्। घटे स्वल्पम् जलम् आसीत्। अतः सः जलं पातुम् असमर्थः अभवत्। सः एकम् उपायम् अचिन्तयत्। सः पाषाणस्य खण्डानि घटे अक्षिपत्। एवं क्रमेण घटस्य जलम् उपरि आगच्छत्। काकः जलम् पीत्वा सन्तुष्टः अभवत्। परिश्रमेण एव कार्याणि सिध्यन्ति न तु मनोरथैः।
- सियार — शृगालः
- कौआ — काकः
- मक्खी — मक्षिका
- बन्दर — वानरः
- बगुला — बकः
- चोंच — चञ्चुः
- नाक — नासिका
प्रश्न: "आत्मदुर्व्यवहारस्य फलं भवति दुःखदम्। तस्मात् सद्व्यवहर्तव्यं मानवेन सुखैषिणा॥" श्लोकस्यास्य आधारेण स्पष्टीकुरुत यत् शृगालेन सह बकस्य व्यवहारः नैतिकदृष्ट्या समीचीनः आसीत् अथवा न? अस्याः कथायाः वयं किं शिक्षामः?
उत्तर: बकेन शृगालाय स्वकृत-अपराधस्य बोधं कारयितुं तादृशः एव व्यवहारः कृतः। शृगालः ज्ञातवान् यत् यदा कश्चित् अपरं प्रतारयति, तदा तस्य स्वस्य अपि तादृशी एव पीड़ा भवति। अतः एषः व्यवहारः शृगालस्य नेत्रोन्मीलनार्थं (आँखें खोलने के लिए) आवश्यकः आसीत्।
मुख्य शिक्षा: वयं कदापि केनापि सह कपटपूर्णं दुर्व्यवहारं न कुर्याम। यदि वयं स्वस्मै सुखं वाञ्छामः तर्हि सर्वैः सह सद्व्यवहारः एव करणीयः। (Tit for tat teaches a lesson, but good behavior brings true harmony).
सूक्तिस्तबकः (सुभाषितों का गुलदस्ता)
संस्कृत पाठ्यपुस्तक | CBSE पाठ्यक्रम 2026-27 | सान्वय-भावार्थ-अभ्यास-प्रश्नोत्तराणि
'सूक्तिस्तबकः' का अर्थ है 'अच्छी बातों का गुच्छा/गुलदस्ता' (सूक्ति = सु+उक्ति, स्तबकः = गुच्छा)। इस पाठ में पाँच अत्यंत प्रेरणादायी एवं नीतिपरक श्लोक संकलित हैं, जो परिश्रम का महत्त्व, पढ़े हुए ज्ञान को जीवन में उतारना, मीठी वाणी की महत्ता, निरंतर प्रयास की शक्ति, तथा बाहरी रूप-रंग के बजाय आंतरिक गुणों की पहचान सिखाते हैं।
📖 मूल श्लोकाः, अन्वयः एवं सरल हिंदी भावार्थ
उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥
अन्वयः: कार्याणि उद्यमेन हि सिध्यन्ति, मनोरथैः न। सुप्तस्य सिंहस्य मुखे मृगाः न हि प्रविशन्ति।
(सरल भावार्थ: सभी कार्य परिश्रम करने से ही सिद्ध (सफल) होते हैं, केवल मन की इच्छाओं से नहीं। सोए हुए शेर के मुँह में हिरण स्वयं कभी प्रवेश नहीं करते, शेर को भी शिकार के लिए परिश्रम करना पड़ता है।)
श्लोक २:
पुस्तके पठितः पाठः जीवने नैव साधितः।
किं भवेत् तेन पाठेन जीवने यो न सार्थकः॥
अन्वयः: पुस्तके पठितः पाठः यदि जीवने न एव साधितः। यः पाठः जीवने सार्थकः न (अस्ति), तेन पाठेन किं भवेत्?
(सरल भावार्थ: पुस्तक में पढ़ा गया पाठ यदि जीवन में नहीं अपनाया गया, तो ऐसे पाठ से क्या लाभ जो जीवन में उपयोगी और सार्थक ही न बने!)
श्लोक ३:
प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः।
तस्मात् प्रियं हि वक्तव्यं वचने का दरिद्रता॥
अन्वयः: सर्वे जन्तवः प्रियवाक्यप्रदानेन तुष्यन्ति। तस्मात् प्रियं हि वक्तव्यम्, वचने दरिद्रता का (स्यात्)?
(सरल भावार्थ: मीठे और प्रिय वचन बोलने से सभी प्राणी प्रसन्न होते हैं। इसलिए हमेशा मीठा ही बोलना चाहिए, मीठे बोल बोलने में कैसी गरीबी या कंजूसी!)
श्लोक ४:
गच्छन् पिपीलिको याति योजनानां शतान्यपि।
अगच्छन् वैनतेयोऽपि पदमेकं न गच्छति॥
अन्वयः: गच्छन् पिपीलिकः योजनानां शतानि अपि याति। अगच्छन् वैनतेयः अपि एकं पदम् न गच्छति।
(सरल भावार्थ: चलती हुई छोटी सी चींटी भी सैकड़ों योजन (हजारों मील) की दूरी तय कर लेती है। परन्तु न चलने वाला गरुड़ (पक्षीराज) भी एक कदम भी आगे नहीं बढ़ पाता। अर्थात् निरंतर प्रयास ही सफलता दिलाता है।)
श्लोक ५:
काकः कृष्णः पिकः कृष्णः को भेदः पिककाकयोः।
वसन्तसमये प्राप्ते काकः काकः पिकः पिकः॥
अन्वयः: काकः कृष्णः (भवति), पिकः कृष्णः (भवति), पिककाकयोः कः भेदः (अस्ति)? वसन्तसमये प्राप्ते (सति) काकः काकः (भवति), पिकः पिकः (भवति)।
(सरल भावार्थ: कौआ भी काला होता है और कोयल भी काली होती है, फिर कौए और कोयल में क्या अंतर है? वसंत ऋतु के आने पर (जब कोयल मधुर स्वर में कूकती है और कौआ काँव-काँव करता है) तब पता चल जाता है कि कौआ कौआ है और कोयल कोयल है!)
छात्र कक्षा में इन अनुष्टुप् छन्द के श्लोकों को सुर, ताल और लय के साथ गाएँ:
"उद्यमेन हि सिध्यन्ति... कार्याणि न मनोरथैः।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य... प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥"
| श्लोकांश 'क' | श्लोकांश 'ख' (शुद्ध मेल) |
|---|---|
| तस्मात् प्रियं हि वक्तव्यम् | वचने का दरिद्रता। |
| गच्छन् पिपीलिको याति | योजनानां शतान्यपि। |
| प्रियवाक्यप्रदानेन | सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः। |
| किं भवेत् तेन पाठेन | जीवने यो न सार्थकः। |
| काकः कृष्णः पिकः कृष्णः | को भेदः पिककाकयोः। |
(क) सर्वे जन्तवः केन तुष्यन्ति?
उत्तरम्: सर्वे जन्तवः प्रियवाक्यप्रदानेन तुष्यन्ति। (सभी प्राणी मीठी वाणी बोलने से संतुष्ट होते हैं।)
(ख) पिककाकयोः भेदः कदा भवति?
उत्तरम्: वसन्तसमये पिककाकयोः भेदः भवति। (वसंत ऋतु के समय कोयल और कौए का भेद प्रकट होता है।)
(ग) कः गच्छन् योजनानां शतान्यपि याति?
उत्तरम्: पिपीलिकः (चींटी) गच्छन् योजनानां शतान्यपि याति। (चलती हुई चींटी सैकड़ों योजन पार कर लेती है।)
(घ) अस्माभिः किं वक्तव्यम्?
उत्तरम्: अस्माभिः प्रियं वक्तव्यम्। (हमारे द्वारा मीठे वचन बोले जाने चाहिए।)
(क) काकः कृष्णः न भवति। — न (कौआ काला होता है)
(ख) अस्माभिः प्रियं वक्तव्यम्। — आम् (हाँ, हमें प्रिय बोलना चाहिए)
(ग) वसन्तसमये पिककाकयोः भेदः भवति। — आम् (हाँ)
(घ) वैनतेयः पशुः अस्ति। — न (वैनतेय पक्षी/गरुड़ है, पशु नहीं)
(ङ) वचने दरिद्रता न कर्तव्या। — आम् (हाँ, बोलने में कंजूसी नहीं करनी चाहिए)
- वचने — कथने
- वैनतेयः — गरुड़ः
- पुस्तके — ग्रन्थे
- उद्यमेन — परिश्रमेण
- पिकः / रविः — सूर्यः
| पदम् | विलोमपदम् |
|---|---|
| सार्थकः | निरर्थकः |
| कृष्णः | श्वेतः |
| अनुक्तम् | उक्तम् |
| गच्छति | आगच्छति |
| जागृतस्य | सुप्तस्य |
प्रश्न: "गच्छन् पिपीलिको याति योजनानां शतान्यपि। अगच्छन् वैनतेयोऽपि पदमेकं न गच्छति॥" अनयोः पङ्क्त्योः पिपीलिकायाः वैनतेयस्य च उदाहरणेन छात्राणां जीवनाय कः सन्देशः दत्तः? आधुनिके परीक्षा-सन्द Lig्भे अस्य महत्त्वं विशदयत।
उत्तर: अनयोः पङ्क्त्योः निरन्तरतायाः (Consistency) तथा परिश्रमस्य (Effort) महिमा वर्णिता। यद्यपि पिपीलिका (चींटी) अतिलघुः दुर्बला च अस्ति, तथापि सा नित्यं चलन्ती महतीं दूरीं तरति। परन्तु गरुड़ः (वैनतेयः) महाबली वेगवान् च भूत्वापि यदि गतिं न करोति तर्हि एकमपि पादं न चलति।
संदेश: प्रतिभा (Talent) अपेक्षया नित्य-परिश्रमः (Hard work & Discipline) श्रेष्ठः। यः छात्रः प्रतिदिनम् अल्पमपि स्वाध्यायं करोति, सः परीक्षायै शत-प्रतिशतं सफलो भवति; परन्तु प्रतिभासम्पन्नोऽपि आलसी छात्रः पश्चात्तापं प्राप्नोति।
क्रीडास्पर्धा (खेलकूद प्रतियोगिता — समावेशी शिक्षा)
संस्कृत पाठ्यपुस्तक | CBSE पाठ्यक्रम 2026-27 | सानुवाद-अभ्यास-प्रश्नोत्तराणि
इस पाठ में अस्मद् (अहम्, आवाम्, वयम्) तथा युष्मद् (त्वम्, युवाम्, यूयम्) सर्वनाम शब्दों का व्यावहारिक प्रयोग संवादों द्वारा सिखाया गया है। साथ ही NEP 2020 की मूल भावना 'समावेशी शिक्षा' (Inclusive Education) का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत किया गया है, जहाँ दिव्यांग मित्र 'फेकन' (दृष्टिबाधित) के लिए विशेष खेलों (जैसे—ब्रेल, शतरंज/चेस, क्रिकेट) और सहभागिता की व्यवस्था की चर्चा की गई है।
📖 मूल पाठ्यांश एवं सरल हिंदी संवाद-अनुवाद
(हुमा: तुम सब कहाँ जा रहे हो?)
इन्दरः: वयं विद्यालयं गच्छामः।
(इन्दर: हम सब स्कूल जा रहे हैं।)
फेकनः: तत्र क्रीडास्पर्धाः सन्ति। वयं खेलिष्यामः।
(फेकन: वहाँ खेल प्रतियोगिताएँ हैं। हम खेलेंगे।)
रामचरणः: किं स्पर्धाः केवलं बालकेभ्यः एव सन्ति?
(रामचरण: क्या प्रतियोगिताएँ केवल बालकों (लड़कों) के लिए ही हैं?)
प्रसन्ना: नहि, बालिकाः अपि खेलिष्यन्ति।
(प्रसन्ना: नहीं, लड़कियाँ भी खेलेंगी।)
रामचरणः: किं यूयं सर्वे एकस्मिन् दले स्थ? अथवा पृथक्-पृथक् दले?
(रामचरण: क्या तुम सब एक ही टीम में हो? या अलग-अलग टीम में?)
प्रसन्ना: तत्र बालिकाः बालकाः च मिलित्वा खेलिष्यन्ति।
(प्रसन्ना: वहाँ लड़के और लड़कियाँ मिलकर खेलेंगे।)
फेकनः: आम्, बैडमिण्टन-क्रीडायां मम सहभागिनी जूली अस्ति।
(फेकन: हाँ, बैडमिंटन खेल में मेरी जोड़ीदार जूली है।)
हुमा: एतदतिरिच्य कबड्डी, नियुद्धम् (जूडो), पादकन्दुकम् (फुटबॉल), हस्तकन्दुकम् (वॉलीबॉल), चतुरङ्गः (चेस) इत्यादयः स्पर्धाः भविष्यन्ति।
इन्दरः: हुमे! किं त्वं न क्रीडसि? तव भगिनी तु मम पक्षे क्रीडति।
(इन्दर: हुमा! क्या तुम नहीं खेल रही हो? तुम्हारी बहन तो मेरी टीम में खेलती है।)
हुमा: नहि, मह्यं चलच्चित्रं रोचते। परम् अत्र अहं दर्शकरूपेण स्थास्यामि।
(हुमा: नहीं, मुझे सिनेमा देखना पसंद है। परन्तु यहाँ मैं दर्शक बनकर रहूँगी।)
फेकनः: अहो! पूरनः कुत्र अस्ति? किं सः कस्यामपि स्पर्धायां प्रतिभागी नास्ति?
(फेकन: अरे! पूरन कहाँ है? क्या वह किसी भी खेल में भाग नहीं ले रहा?)
रामचरणः: सः द्रष्टुं न शक्नोति। तस्मै अस्माकं विद्यालये पठनाय तु विशेषव्यवस्था वर्तते, परं क्रीडायै प्रबन्धः नास्ति।
(रामचरण: वह देख नहीं सकता। उसके लिए हमारे विद्यालय में पढ़ने की तो विशेष व्यवस्था है, परन्तु खेलने के लिए प्रबंध नहीं है।)
हुमा: अयं कथमपि न न्यायसङ्गतः। पूरनः सक्षमः, परं प्रबन्धस्य अभावात् क्रीडितुं न शक्नोति।
(हुमा: यह किसी भी प्रकार से न्यायसंगत नहीं है। पूरन योग्य है, पर व्यवस्था के अभाव से खेल नहीं सकता।)
इन्दरः: अस्माकं तादृशाः बहवः मित्राणि सन्ति। वस्तुतः तानि 'अन्यथासमर्थानि' (Differently-abled) सन्ति।
(इन्दर: हमारे वैसे बहुत से मित्र हैं। वास्तव में वे 'अन्यथासमर्थ' हैं।)
फेकनः: अतः वयं सर्वे प्राचार्यं मिलामः। तं कथयामः— शीघ्रमेव तेषां कृते व्यवस्था भविष्यति।
(फेकन: इसलिए हम सब प्रधानाचार्य जी से मिलते हैं। उनसे कहते हैं— जल्दी ही उनके लिए भी खेल की व्यवस्था हो जाएगी।)
अस्मद् (मैं / हम) रूप:
- प्रथमा: अहम् (मैं), आवाम् (हम दोनों), वयम् (हम सब)
- द्वितीया: माम् (मुझको), आवाम् (हम दोनों को), अस्मान् (हम सबको)
- षष्ठी: मम (मेरा), आवयोः (हम दोनों का), अस्माकम् (हमारा/हम सबका)
युष्मद् (तुम / आप) रूप:
- प्रथमा: त्वम् (तू/तुम), युवाम् (तुम दोनों), यूयम् (तुम सब)
- द्वितीया: त्वाम् (तुझको), युवाम् (तुम दोनों को), युष्मान् (तुम सबको)
- षष्ठी: तव (तेरा/तुम्हारा), युवयोः (तुम दोनों का), युष्माकम् (तुम सबका)
यथा — अहं क्रीडामि। (बहुवचने) → वयं क्रीडामः।
(क) अहं नृत्यामि। (बहुवचने) → वयं नृत्यामः।
(ख) त्वं पठसि। (बहुवचने) → यूयं पठथ।
(ग) युवां गच्छथः। (एकवचने) → त्वं गच्छसि।
(घ) अस्माकं पुस्तकानि। (एकवचने) → मम पुस्तकम्।
(ङ) तव गृहम्। (द्विवचने) → युवयोः गृहे।
(क) अहम् पठामि। (वयम्/अहम्) — (उत्तम पुरुष एकवचन क्रिया 'पठामि' के साथ कर्ता 'अहम्')
(ख) युवाम् गच्छथः। (युवाम्/यूयम्) — (मध्यम पुरुष द्विवचन क्रिया 'गच्छथः' के साथ कर्ता 'युवाम्')
(ग) एतत् मम पुस्तकम्। (माम्/मम) — (सम्बन्ध षष्ठी 'मम' = मेरी पुस्तक)
(घ) युष्माकम् क्रीडनकानि। (युष्मान्/युष्माकम्) — (षष्ठी बहुवचन 'युष्माकम्' = तुम्हारे खिलौने)
(ङ) आवाम् छात्रे स्वः। (वयम्/आवाम्) — (द्विवचन क्रिया 'स्वः' के साथ कर्ता 'आवाम्')
(च) एषा तव लेखनी। (तव/त्वाम्) — (सम्बन्ध षष्ठी 'तव' = तुम्हारी कलम)
- त्वं लेखं लेखिष्यसि। (तुम लेख लिखोगे।)
- आवां पुस्तकं पठिष्यावः। (हम दोनों पुस्तक पढ़ेंगे।)
- यूयं चित्राणि रचयिष्यथ। (तुम सब चित्र बनाओगे।)
- अहं चलच्चित्रं द्रक्ष्यामि। (मैं सिनेमा देखूँगा।)
- युवां कथां कथयिष्यथः। (तुम दोनों कहानी कहोगे।)
- वयं दूरदर्शनं पश्यामः/द्रक्ष्यामः। (हम सब दूरदर्शन देखेंगे।)
यथा — एषा मम पुस्तिका।
(क) एतत् मम गृहम्। (यह मेरा घर है।)
(ख) आवयोः मैत्री दृढा। (हम दोनों की मित्रता पक्की है।)
(ग) एषः तव विद्यालयः। (यह तुम्हारा विद्यालय है।)
(घ) एषा युवयोः अध्यापिका। (यह तुम दोनों की अध्यापिका हैं।)
(ङ) भारतम् अस्माकम् देशः। (भारत हमारा देश है।)
(च) एतानि युष्माकम् पुस्तकानि। (ये तुम सब की पुस्तकें हैं।)
- एषः (एकवचन) → एते (बहुवचन)
- सः (एकवचन) → ते (बहुवचन)
- ताः (बहुवचन) → सा (एकवचन)
- त्वम् (एकवचन) → यूयम् (बहुवचन)
- एताः (बहुवचन) → एषा (एकवचन)
- तव (एकवचन) → युष्माकम् (बहुवचन)
- अस्माकम् (बहुवचन) → मम (एकवचन)
- तानि (बहुवचन) → तत् (एकवचन)
प्रश्न: पाठे 'पूरनः' दृष्टिबाधितः अस्ति। हुमा कथयति— "अयं कथमपि न न्यायसङ्गतः। पूरनः सक्षमः, परं प्रबन्धस्य अभावात् क्रीडितुं न शक्नोति।" अयं संवादः आधुनिके समावेशी-शिक्षायां (Inclusive Education) दिव्यांग-जनानां कृते कान् अधिकारान् प्रतिपादयति?
उत्तर: अयं संवादः स्पष्टीकरोति यत् दिव्यांग-जनाः (अन्यथासमर्थाः) दयायाः पात्राणि न सन्ति, अपितु ते समान-अवसरस्य (Equal Opportunity) अधिकारिणः सन्ति। पूरनः प्रतिभासम्पन्नः अस्ति, केवलं तस्य अनुकूल-साधनानां (विशेष-क्रीडा-उपकरणानां) अभावः वर्तते।
NEP 2020 दृष्टिकोण: प्रत्येकस्मिन् विद्यालये दिव्यांग-छात्रेभ्यः सुगम्य-वातावरणम् (Accessible Environment), ब्रेल-पुस्तकानि, विशेष-क्रीडा-सामग्री तथा सहानुभूति-पूर्णं सहकार-वातावरणं भवेत्, येन कोऽपि छात्रः स्वप्रतिभायाः विकासात् वञ्चितः न स्यात्।
कृषिकाः कर्मवीराः (परिश्रमी किसान — अन्नदाता)
संस्कृत पाठ्यपुस्तक | CBSE पाठ्यक्रम 2026-27 | सान्वय-भावार्थ-अभ्यास-प्रश्नोत्तराणि
प्रस्तुत कविता में देश के सच्चे अन्नदाता किसानों (कृषक एवं कृषिका) के कठोर परिश्रम, त्याग और कष्टमय जीवन का अत्यंत मर्मस्पर्शी चित्रण किया गया है। भीषण गर्मी हो या हाड़ कंपाने वाली सर्दी, घनघोर वर्षा हो—किसान निरंतर अपने हल-कुदाल से धरती को सींचते हैं। स्वयं फटे पुराने वस्त्र पहनते हैं, नंगे पाँव रहते हैं, अभावों में जीते हैं, लेकिन पूरे संसार को अन्न, साग, फल और दूध प्रदान करते हैं। उनकी मेहनत से ही सूखी और काँटों भरी धरती लहलहाती हरी-भरी फसल से परिपूर्ण हो जाती है।
📖 मूल श्लोकाः, अन्वयः एवं सरल हिंदी भावार्थ
सूर्यस्तपतु मेघा वा वर्षन्तु विपुलं जलम्।
कृषिका कृषिको नित्यं शीतकालेऽपि कर्मठौ॥
अन्वयः: सूर्यः तपतु, मेघाः वा विपुलं जलं वर्षन्तु, कृषिका कृषिकः (च) शीतकाले अपि नित्यं कर्मठौ (स्तः)।
(सरल भावार्थ: चाहे सूर्य कितना भी तपाए अथवा बादल अत्यधिक जल बरसाएँ, किसान और उसकी पत्नी (किसान दम्पति) भीषण ठंड में भी निरंतर अपने कार्य में जुटे रहते हैं।)
श्लोक २:
ग्रीष्मे शरीरं सस्वेदं शीते कम्पमयं सदा।
हलेन च कुदालेन तौ तु क्षेत्राणि कर्षतः॥
अन्वयः: ग्रीष्मे शरीरं सस्वेदं (भवति), शीते सदा कम्पमयं (भवति), तथापि तौ हलेन कुदालेन च क्षेत्राणि कर्षतः।
(सरल भावार्थ: गर्मी में उनका शरीर पसीने से लथपथ रहता है और सर्दी में ठंड से काँपता रहता है, फिर भी वे दोनों हल और कुदाल से अपने खेतों को जोतते रहते हैं।)
श्लोक ३:
पादयोर्न पदत्राणे शरीरे वसनानि नो।
निर्धनं जीवनं कष्टं सुखं दूरे हि तिष्ठति॥
अन्वयः: पादयोः पदत्राणे न (स्तः), शरीरे वसनानि नो (सन्ति)। जीवनं निर्धनं कष्टं (च अस्ति), सुखं तु दूरे हि तिष्ठति।
(सरल भावार्थ: उनके पैरों में जूते नहीं हैं, शरीर पर पर्याप्त वस्त्र नहीं हैं। उनका जीवन निर्धनता और कष्टों से भरा है, सुख तो उनसे कोसों दूर ही रहता है।)
श्लोक ४:
गृहं जीर्णं न वर्षासु वृष्टिं वारयितुं क्षमम्।
तथापि कर्मवीरत्वं कृषिकाणां न नश्यति॥
अन्वयः: गृहं जीर्णं (अस्ति), वर्षासु वृष्टिं वारयितुं न क्षमम्। तथापि कृषिकाणां कर्मवीरत्वं न नश्यति।
(सरल भावार्थ: उनका घर इतना पुराना और टूटा-फूटा है कि बरसात में पानी टपकने से रोकने में भी असमर्थ है, फिर भी किसानों की कर्मनिष्ठा (परिश्रम की भावना) कभी नष्ट नहीं होती।)
श्लोक ५:
तयोः श्रमेण क्षेत्राणि सस्यपूर्णानि सर्वदा।
धरित्री सरसा जाता या शुष्का कण्टकावृता॥
अन्वयः: तयोः श्रमेण क्षेत्राणि सर्वदा सस्यपूर्णानि (भवन्ति)। या धरित्री शुष्का कण्टकावृता (आसीत्), सा सरसा जाता।
(सरल भावार्थ: उन दोनों (किसान और किसान-पत्नी) के परिश्रम से खेत हमेशा हरी-भरी फसलों से लहलहा उठते हैं। जो धरती पहले सूखी और काँटों से भरी थी, वह अब रसभरी (उपजाऊ व हरी-भरी) हो जाती है।)
श्लोक ६:
शाकमन्नं फलं दुग्धं दत्त्वा सर्वेभ्य एव तौ।
क्षुधातृषाकुलौ नित्यं विचित्रौ जनपालकौ॥
अन्वयः: तौ सर्वेभ्यः एव शाकम्, अन्नम्, फलं, दुग्धं दत्त्वा, नित्यं क्षुधातृषाकुलौ (तिष्ठतः)। तौ विचित्रौ जनपालकौ (स्तः)।
(सरल भावार्थ: वे दोनों सबको साग-सब्जी, अन्न, फल और दूध देकर स्वयं भूख और प्यास से व्याकुल रहते हैं। सचमुच, वे दोनों कितने विचित्र और महान लोकपालक (अन्नदाता) हैं!)
छात्र संयुक्ताक्षरों का ध्यान रखते हुए शुद्ध उच्चारण करें:
- सूर्यस्तपतु (सूर्-यस्-त-प-तु)
- शीतकालेऽपि (शीतकाले + अपि) — पूर्वरूप सन्धि
- सस्यपूर्णानि (सस्-य-पूर्-णा-नि) — फसलों से युक्त
- कण्टकावृता (कण्-ट-का-वृ-ता) — काँटों से भरी
- क्षुधातृषाकुलौ (क्षु-धा-तृ-षा-कु-लौ) — भूख-प्यास से व्याकुल
| श्लोकांश 'क' | श्लोकांश 'ख' (शुद्ध मेल) |
|---|---|
| गृहं जीर्णं न वर्षासु | वृष्टिं वारयितुं क्षमम्। |
| हलेन च कुदालेन | तौ तु क्षेत्राणि कर्षतः। |
| पादयोर्न पदत्राणे | शरीरे वसनानि नो। |
| तयोः श्रमेण क्षेत्राणि | सस्यपूर्णानि सर्वदा। |
| धरित्री सरसा जाता | या शुष्का कण्टकावृता। |
(क) कृषकाः शीतकालेऽपि कर्मठाः भवन्ति। — आम्
(ख) कृषकाः हलेन क्षेत्राणि न कर्षन्ति। — न (वे हल से खेत जोतते हैं)
(ग) कृषकाः सर्वेभ्यः अन्नं यच्छन्ति। — आम्
(घ) कृषकाणां जीवनं सुखप्रदं भवति। — न (उनका जीवन कष्टमय होता है)
(ङ) कृषकः क्षेत्राणि सस्यपूर्णानि करोति। — आम्
(च) श्रमेण धरित्री सरसा भवति। — आम्
- वस्त्राणि — वसनानि
- सूर्यः — रविः
- तृष्णा — पिपासा / तृषा
- विपुलम् — अधिकम्
- जीर्णम् — जर्जरम्
- पृथ्वी — धरित्री
- सुखम् — दुःखम्
- दूरे — पार्श्वे (समीपे)
- निर्धनम् — धनीकम्
- क्षमम् — अक्षमम्
- ग्रीष्मे — शीते
- सरसा — नीरसा
(क) कृषकाः केन क्षेत्राणि कर्षन्ति?
उत्तरम्: कृषकाः हलेन कुदालेन च क्षेत्राणि कर्षन्ति। (किसान हल और कुदाल से खेतों को जोतते हैं।)
(ख) केषां कर्मवीरत्वं न नश्यति?
उत्तरम्: कृषिकाणां (कृषकाणां) कर्मवीरत्वं न नश्यति। (किसानों की कर्मनिष्ठा कभी नष्ट नहीं होती।)
(ग) श्रमेण का सरसा भवति?
उत्तरम्: श्रमेण धरित्री सरसा भवति। (परिश्रम से धरती रसभरी/हरी-भरी हो जाती है।)
(घ) कृषकाः सर्वेभ्यः किं किं यच्छन्ति?
उत्तरम्: कृषकाः सर्वेभ्यः शाकम्, अन्नम्, फलं, दुग्धं च यच्छन्ति। (किसान सभी को शाक, अन्न, फल और दूध देते हैं।)
(ङ) कृषकात् दूरे किं तिष्ठति?
उत्तरम्: कृषकात् दूरे सुखं तिष्ठति। (किसान से सुख सदा दूर ही रहता है।)
प्रश्न: "शाकमन्नं फलं दुग्धं दत्त्वा सर्वेभ्य एव तौ। क्षुधातृषाकुलौ नित्यं विचित्रौ जनपालकौ॥" श्लोकस्यास्य आधारेण कृषकाणां त्यागमयं जीवनं विवृणुत तथा च देशस्य आर्थिक-विकासार्थं कृषकाणां योगदानं प्रति वयं कथं कृतज्ञतां ज्ञापयेम?
उत्तर: श्लोके कविना कृषकाणां विडम्बनापूर्णं किन्तु त्यागमयं रूपं दर्शितम्। यः जनः समग्रं संसारं पालयति, तस्मै अन्नं दुग्धं च यच्छति, सः स्वयमेव निर्धनता-कारणात् क्षुधया पिपासया च पीडितः भवति। अतः तौ 'विचित्रौ जनपालकौ' कथितौ।
कृतज्ञता-ज्ञापनस्य उपायाः:
- अन्नस्य अपव्ययं (Food wastage) कदापि न कुर्याम।
- कृषकेभ्यः तेषां श्रमोत्पादस्य उचितं मूल्यं (Fair MSP/Remuneration) सर्वकारेण समाजेन च देयम्।
- आधुनिक-कृषि-प्रविधीनां (Modern farming technology) सुविधया कृषकाणां जीवनस्तरः समुन्नमयितव्यः। 'जय जवान जय किसान' इति केवलं घोषः न स्यात्, आचरणे भवेत्।
पुष्पोत्सवः (फूलवालों की सैर — साम्प्रदायिक सौहार्द)
संस्कृत पाठ्यपुस्तक | CBSE पाठ्यक्रम 2026-27 | सानुवाद-अभ्यास-प्रश्नोत्तराणि
प्रस्तुत पाठ में सप्तमी विभक्ति (अधिकरण कारक — में, पर / आधारोऽधिकरणम्) के प्रयोग के साथ दिल्ली के प्रसिद्ध ऐतिहासिक उत्सव 'फूलवालों की सैर' (पुष्पोत्सवः) का वर्णन किया गया है। भारत 'उत्सवप्रिय' देश है। दिल्ली के मेहरौली क्षेत्र में प्रतिवर्ष अक्टूबर मास में यह उत्सव आयोजित होता है, जहाँ लोग हिन्दू और मुस्लिम दोनों मिलकर योगमाया मन्दिर तथा ख्वाजा बख्तियार काकी की दरगाह (समाधिस्थल) पर फूलों से बने पंखे (व्यजनानि) अर्पित करते हैं। यह उत्सव भारतीय साम्प्रदायिक सद्भाव एवं सांस्कृतिक एकता का अनुपम प्रतीक है।
📖 मूल पाठ्यांश एवं सरल हिंदी अनुवाद
- उत्सवेषु — उत्सव + एषु (सप्तमी बहुवचन)
- समाधिस्थले — समाधिस्थल + ए (सप्तमी एकवचन)
- मेहरौलीक्षेत्रे — मेहरौलीक्षेत्र + ए (सप्तमी एकवचन)
- पाटलपुष्पैः — पाटलपुष्प + ऐः (तृतीया बहुवचन)
- मल्लिकापुष्पैः — मल्लिकापुष्प + ऐः (तृतीया बहुवचन)
यथा — सरोवरे मीनाः सन्ति। (सरोवर)
(क) कच्छापाः तडागे भ्रमन्ति। (तडाग)
(ख) सैनिकाः शिविरेषु सन्ति। (शिविर)
(ग) यानानि राजमार्गे चलन्ति। (राजमार्ग)
(घ) रत्नानि धरायाम् सन्ति। (धरा)
(ङ) बालाः क्रीडाक्षेत्रे क्रीडन्ति। (क्रीडाक्षेत्र)
(च) खगाः नीडेषु निवसन्ति। (नीड)
(क) वयं विद्यालये पठामः।
(ख) जनाः उद्यानेषु भ्रमन्ति।
(ग) नौकाः सरोवरे सन्ति।
(घ) भ्रमराः पुष्पेषु गुञ्जन्ति।
(ङ) फलानि वृक्षेषु पच्यन्ते।
(क) जनाः पुष्पव्यजनानि कुत्र अर्पयन्ति?
उत्तरम्: जनाः पुष्पव्यजनानि मेहरौली-क्षेत्रे स्थिते योगमाया-मन्दिरे बख्तियार-काकी इत्यस्य समाधिस्थले च अर्पयन्ति।
(ख) पुष्पोत्सवस्य आयोजनं कदा भवति?
उत्तरम्: पुष्पोत्सवस्य आयोजनम् अक्तूबर-मासे भवति।
(ग) अस्माकं भारतदेशः कीदृशः अस्ति?
उत्तरम्: अस्माकं भारतदेशः उत्सवप्रियः अस्ति।
(घ) पुष्पोत्सवः केन नाम्ना प्रसिद्धः अस्ति?
उत्तरम्: पुष्पोत्सवः 'फूलवालों की सैर' इति नाम्ना प्रसिद्धः अस्ति।
(ङ) मेहरौली-क्षेत्रे कस्य मन्दिरं कस्य च समाधिस्थलम् अस्ति?
उत्तरम्: मेहरौली-क्षेत्रे योगमाया-मन्दिरं बख्तियार-काकी इत्यस्य समाधिस्थलं च अस्ति।
यथा — मीनाः तडागे सन्ति। (तडाग)
(क) कच्छपः सरोवरे भ्रमति। (सरोवर)
(ख) सैनिकाः शिविरे सन्ति। (शिविर)
(ग) यानानि राजमार्गे धावन्ति। (राजमार्ग)
(घ) मक्षिकाः मधुकोशे तिष्ठन्ति। (मधुकोश)
(ङ) बालकाः क्रीडाङ्गणे क्रीडन्ति। (क्रीडाङ्गण)
(च) नराः नगरे निवसन्ति। (नगर)
(क) खगाः गगने उत्पतन्ति। (पक्षी आकाश में उड़ते हैं)
(ख) गावः वनेषु चरन्ति। (गायें वनों में चरती हैं)
(ग) पुष्पाणि लतासु विकसन्ति। (फूल लताओं पर खिलते हैं)
(घ) भक्ताः मन्दिरेषु प्रार्थयन्ति। (भक्त मंदिरों में प्रार्थना करते हैं)
(ङ) फलानि वृक्षे सन्ति। (फल वृक्ष पर हैं)
(च) मीनाः तडागे तरन्ति। (मछलियाँ तालाब में तैरती हैं)
प्रश्न: देहल्याः 'फूलवालों की सैर' (पुष्पोत्सवः) इत्ययं पर्वः भारतीय-संस्कृतेः साम्प्रदायिक-सौहार्दस्य (Communal Harmony) कथं सर्वोत्तमम् उदाहरणम् अस्ति?
उत्तर: 'पुष्पोत्सवः' भारतस्य 'गङ्गा-जमुनी तहज़ीब' तथा साम्प्रदायिक-एकतायाः ज्वलन्तं प्रतीकम् अस्ति। अस्मिन् उत्सवे हिन्दू-मुस्लिम-उभये सम्प्रदायाः मिलित्वा योगमाया-मन्दिरे तथा ख्वाजा बख्तियार काकी समाधिस्थले (दरगाह) पुष्पव्यजनानि समर्पयन्ति। एषा परम्परा दर्शयति यत् भारतीय-संस्कृतिः अखण्डतायाः भ्रातृत्वस्य च आधारशिला अस्ति।
दशमः त्वम् असि (दसवें तुम हो — संख्या ज्ञान)
संस्कृत पाठ्यपुस्तक | CBSE पाठ्यक्रम 2026-27 | सानुवाद-अभ्यास-प्रश्नोत्तराणि
यह एक अत्यंत रोचक और हास्यप्रद कथा है जिसके माध्यम से छात्रों को संस्कृत संख्यावाचक शब्दों (एकः, द्वौ, त्रयः, चत्वारः, पञ्च, षट्, सप्त, अष्ट, नव, दश) का बोध कराया जाता है। दस बालक नदी में स्नान करने जाते हैं। पार आने पर जब उनका नायक गिनती करता है तो वह सबको गिनता है लेकिन खुद को गिनना भूल जाता है। तब राहगीर आकर कहता है— "दशमः त्वम् असि" (दसवें तुम स्वयं हो!)।
📖 मूल पाठ्यांश एवं सरल हिंदी अनुवाद
| संख्या | पुंल्लिङ्गम् | स्त्रीलिङ्गम् | नपुंसकलिङ्गम् |
|---|---|---|---|
| १ | एकः | एका | एकम् |
| २ | द्वौ | द्वे | द्वे |
| ३ | त्रयः | तिस्रः | त्रीणि |
| ४ | चत्वारः | चतस्रः | चत्वारि |
| ५-१० | पञ्च, षट्, सप्त, अष्ट, नव, दश | ||
(क) कति बालकाः स्नानाय अगच्छन्?
उत्तरम्: दश बालकाः स्नानाय अगच्छन्।
(ख) ते स्नानाय कुत्र अगच्छन्?
उत्तरम्: ते स्नानाय नदीम् अगच्छन्।
(ग) ते कं निश्चयं अकुर्वन्?
उत्तरम्: ते निश्चयं अकुर्वन् यत् दशमः नद्यां मग्नः इति।
(घ) मार्गे कः आगच्छत्?
उत्तरम्: मार्गे कश्चित् पथिकः आगच्छत्।
(ङ) पथिकः किम् अवदत्?
उत्तरम्: पथिकः अवदत्— "दशमः त्वम् असि" इति।
(क) दश बालकाः स्नानाय अगच्छन्। — ✔
(ख) सर्वे वाटिकायाम् अभ्रमन्। — ✘
(ग) ते वस्तुतः नव बालकाः एव आसन्। — ✘
(घ) बालकः स्वं न अगणयत्। — ✔
(ङ) एकः बालकः नद्यां मग्नः। — ✘
(च) ते सुखिताः तूष्णीं अतिष्ठन्। — ✘
(छ) कोऽपि पथिकः न आगच्छत्। — ✘
(ज) नायकः अवदत् "दशमः त्वम् असि" इति। — ✘
(झ) ते सर्वे प्रहृष्टाः भूत्वा गृहम् अगच्छन्। — ✔
- ८ कन्दुकानि → अष्ट कन्दुकानि
- ३ चटकाः → तिस्रः चटकाः (स्त्रीलिङ्ग बहुवचन)
- २ पुस्तके → द्वे पुस्तके (नपुंसकलिङ्ग द्विवचन)
- २ मयूरौ → द्वौ मयूरौ (पुंल्लिङ्ग द्विवचन)
- ४ बालकाः → चत्वारः बालकाः (पुंल्लिङ्ग बहुवचन)
- ५ कपोताः → पञ्च कपोताः
प्रश्न: 'दशमः त्वम् असि' इति कथायाः आत्मनिरीक्षण-सम्बद्धः (Self-Introspection) दार्शनिकः सन्देशः कः अस्ति?
उत्तर: बालकेन सर्वे मित्राणि गणितानि, परं सः स्वं गणयितुं विस्मृतवान्। एवमेव मानवः बाह्य-जगति सर्वान् दोषान् गुणांश्च पश्यति, परं स्वस्य आत्मनिरीक्षणं न करोति। समस्यायाः समाधानं स्वस्मिन् एव निहितं भवति।
विमानयानं रचयाम (आओ हवाई जहाज बनाएँ — बाल वैज्ञानिक)
संस्कृत पाठ्यपुस्तक | CBSE पाठ्यक्रम 2026-27 | सान्वय-भावार्थ-अभ्यास-प्रश्नोत्तराणि
डॉ. विश्वास द्वारा रचित यह एक अत्यंत मनोहारी और उत्साहवर्धक संस्कृत बालगीत है। इसमें बच्चे (राघव, माधव, सीता, ललिता) हवाई जहाज बनाकर नीले आकाश में सैर करना चाहते हैं, बादलों की माला लाकर धरती के किसानों के चेहरों पर खुशहाली लाना चाहते हैं।
📖 मूल श्लोकाः एवं सरल भावार्थ
श्लोक २: उन्नतवृक्षं तुङ्गं भवनं क्रान्त्वाकाशं खलु याम। कृत्वा हिमवन्तं सोपानं चन्दिरलोकं प्रविशाम॥ (भावार्थ: ऊँचे वृक्ष और भवन को लाँघकर आकाश में चलें। बर्फ की सीढ़ी बनाकर चंद्रलोक में प्रवेश करें।)
श्लोक ३: शुक्रश्चन्द्रः सूर्यो गुरुरिति ग्रहान् हि सर्वान् गणयाम। विविधाः सुन्दरताराश्चित्वा मौक्तिकहारं रचयाम॥ (भावार्थ: शुक्र, चंद्र, सूर्य, गुरु आदि सभी ग्रहों की गिनती करें और सुंदर तारों को चुनकर मोतियों का हार बनाएँ।)
श्लोक ४: अम्बुदमालांम्बरभूषां आदायैव हि प्रतियाम। दुःखितपीडितकृषिकजनानां गृहेषु हर्षं जनयाम॥ (भावार्थ: आकाश की शोभा बढ़ाने वाले बादलों की माला को साथ लेकर लौटें और पीड़ित किसानों के घरों में खुशहाली लाएँ।)
छात्र कक्षा में उत्साहपूर्वक इस बालगीत का गायन करें:
"राघव! माधव! सीते! ललिते! विमानयानं रचयाम... नीले गगने विपुले विमले वायुविहारं करवाम..."
यथा — नभः चन्द्रेण शोभते। (चन्द्र)
(क) सा विमलेन जलेन मुखं प्रक्षालयति। (विमल)
(ख) राघवः विमानयानेन विहरति। (विमानयान)
(ग) कण्ठः मौक्तिकहारेण शोभते। (मौक्तिकहार)
(घ) नभः सूर्येण प्रकाशते। (सूर्य)
(ङ) पर्वतशिखरं अम्बुदमालया शोभते। (अम्बुदमाला)
(क) सूर्यः, चन्द्रः, अम्बुदः, शुक्रः — भिन्न पदम्: अम्बुदः (अम्बुद बादल है, अन्य खगोलीय पिंड हैं)
(ख) पत्राणि, पुष्पाणि, फलानि, मित्राणि — भिन्न पदम्: मित्राणि (अन्य वृक्ष के अंग हैं)
(ग) जलचरः, खेचरः, भूचरः, निशाचरः — भिन्न पदम्: निशाचरः (अन्य जीव-वास वर्गीकरण हैं)
(घ) गावः, सिंहाः, कच्छापाः, गजाः — भिन्न पदम्: कच्छापाः (अन्य स्थलचर पशु हैं)
- उन्नतम् — अवनतम्
- गगने — पृथिव्याम्
- सुन्दरः — असुन्दरः
- चित्वा — विकीर्य
- हर्षः — शोकः
- प्रथमा: भानुः - भानू - भानवः | गुरुः - गुरू - गुरवः
- द्वितीया: गुरुम् - गुरू - गुरून् | पशुम् - पशू - पशून्
- तृतीया: पशुना - पशुभ्याम् - पशुभिः | साधुना - साधुभ्याम् - साधुभिः
- चतुर्थी: साधवे - साधुभ्याम् - साधुभ्यः | गुरवे - गुरुभ्याम् - गुरुभ्यः
- पञ्चमी: गुरोः - गुरुभ्याम् - गुरुभ्यः | भानोः - भानुभ्याम् - भानुभ्यः
- षष्ठी: भानोः - भान्वोः - भानूनाम् | शिशोः - शिश्वोः - शिशूनाम्
- सप्तमी: शिशौ - शिश्वोः - शिशुषु | गुरौ - गुर्वोः - गुरुषु
- सम्बोधनम्: हे विष्णो! - हे विष्णू! - हे विष्णवः! | हे भानो! - हे भानू! - हे भानवः!
(क) के विमानयानं रचयन्ति?
उत्तरम्: राघवः, माधवः, सीता, ललिता च विमानयानं रचयन्ति।
(ख) विमानयानं कम् कम् क्रान्त्वा उपरि गच्छति?
उत्तरम्: विमानयानं उन्नतवृक्षं तुङ्गं भवनं च क्रान्त्वा उपरि गच्छति।
(ग) वयं कीदृशं सोपानं रचयाम?
उत्तरम्: वयं हिमवन्तं सोपानं रचयाम।
(घ) वयं कस्मिन् लोके प्रविशाम?
उत्तरम्: वयं चन्दिरलोके प्रविशाम।
(ङ) आकाशे काः चित्वा मौक्तिकहारं रचयाम?
उत्तरम्: आकाशे विविधाः सुन्दरताराः चित्वा मौक्तिकहारं रचयाम।
(च) केषां गृहेषु हर्षं जनयाम?
उत्तरम्: दुःखित-पीडित-कृषिकजनानां गृहेषु हर्षं जनयाम।
प्रश्न: "दुःखितपीडितकृषिकजनानां गृहेषु हर्षं जनयाम" — अस्मिन् पद्ये बाल-वैज्ञानिकानां सामाजिक-कल्याणस्य दृष्टिः कथं व्यक्ता भवति?
उत्तर: बालकाः केवलं मनोरञ्जनाय आकाशे न विहरन्ति, अपितु तेषां प्रमुखं लक्ष्यं वृष्टिं (वर्षां) कारयित्वा अन्नदातॄणां कृषकाणां कष्ट-निवारणम् अस्ति। विज्ञानस्य तकनीकस्य च विकासः समाजस्य अन्तिम-जनस्य उपकाराय स्यात्, इदमेव बालगीतस्य मुख्यं शिक्षणम् अस्ति।
अहह आः च (दर्द और चीख — चतुर अजीज की कथा)
संस्कृत पाठ्यपुस्तक | CBSE पाठ्यक्रम 2026-27 | सानुवाद-अभ्यास-प्रश्नोत्तराणि
यह एक अत्यंत रोचक और नीतिपरक हास्य-कथा है जिसमें 'अहह' (कष्टसूचक अव्यय) और 'आः' (पीड़ासूचक अव्यय) का ध्वन्यात्मक प्रयोग समझाया गया है। अजीज नाम का परिश्रमी सेवक अपनी बुद्धिमान वृद्धा की सहायता से कंजूस मालिक को सबक सिखाकर अपना पूरा वेतन और अवकाश प्राप्त करता है।
📖 मूल पाठ्यांश एवं सरल हिंदी अनुवाद
छात्र कठिन संयुक्ताक्षरों का शुद्ध उच्चारण करें:
लीनः, स्वामिने, कार्येषु, प्राप्स्यसि, प्रत्यर्पयितुम्, नितान्तम्, उच्चैः, चीत्करोति।
(क) अजीजः गृहाद् गन्तुं किं वाञ्छति?
उत्तरम्: अजीजः गृहं गन्तुम् अवकाशं वाञ्छति।
(ख) स्वामी कीदृशः आसीत्?
उत्तरम्: स्वामी चतुरः लब्धः (कृपणः) च आसीत्।
(ग) अजीजः कां व्यथां श्रावयति?
उत्तरम्: अजीजः एकां वृद्धां स्वकीयां व्यथां श्रावयति।
(घ) मक्षिके कं व्यथयतः?
उत्तरम्: मक्षिके स्वामिनं व्यथयतः।
(ङ) स्वामी अजीजाय किं दातुं न इच्छति स्म?
उत्तरम्: स्वामी अजीजाय अवकाशस्य वेतनस्य च धनं दातुं न इच्छति स्म।
(क) अजीजः सरलः परिश्रमी च आसीत्।
(ख) सः स्वामिनः एव सेवायां लीनः आसीत्।
(ग) सः वस्तुद्वयम् आनेतुम् इतस्ततः अभ्रमत्।
(घ) स्वामी उच्चैः अवदत्— 'अहह!' इति।
(ङ) एषः अवकाशस्य अपि वेतनं ग्रहीष्यति।
- चतुरः — मूर्खः
- सरलः — कुटिलः
- स्वामी — सेवकः
- प्रसन्नः — खिन्नः / अप्रसन्नः
- उच्चैः — नीचैः
- आनेतुम् — नेतुम्
(क) अजीजः गृहं गन्तुम् अवकाशं वाञ्छति।
(ख) स्वामी चतुरः लब्धः (कृपणः) च आसीत्।
(ग) अजीजः एकां वृद्धां स्वकीयां व्यथां श्रावयति।
(घ) सा वृद्धा तस्मै एकां लघुमञ्जूषां ददाति।
(ङ) मक्षिका स्वामिनः हस्तं दंशति।
- स्वस्थः — प्रातः भ्रमणं स्वास्थ्याय भवति, वयं स्वस्थाः भवेम।
- परिश्रमी — अजीजः सरलः परिश्रमी च सेवकः आसीत्।
- अवकाशः — छात्रः पितुः गृहाय अवकाशं वाञ्छति।
- मक्षिका — मक्षिका सङ्कीर्णे पात्रे प्रविशति / मक्षिका मिष्टान्नम् उपविशति।
- उच्चैः — सिंहः वने उच्चैः गर्जति / स्वामी उच्चैः चीत्करोति।
प्रश्न: अजीजस्य कथा श्रमिक-कल्याणस्य (Workers' Rights) विषये समाजाय किं शिक्षयति? 'बुद्धिर्यस्य बलं तस्य' इति सूक्तिः अत्र कथं चरितार्था भवति?
उत्तर: एषा कथा शिक्षयति यत् स्वामिना श्रमिकाणां शोषणं न करणीयम्, तेषां श्रमोपार्जितं वेतनम् अवकाशश्च न्यायसङ्गतः अधिकारः अस्ति। वृद्धायाः चतुर-उपायेन विना हिंसाम् एव लोभी-स्वामी पराजितः जातः, येन 'बुद्धिर्यस्य बलं तस्य' इति सिद्धं भवति।
मातुल चन्द्र! (चंदा मामा! — मधुर बालगीत)
संस्कृत पाठ्यपुस्तक | CBSE पाठ्यक्रम 2026-27 | सान्वय-भावार्थ-अभ्यास-प्रश्नोत्तराणि
यह संस्कृत साहित्य का अत्यंत प्रसिद्ध, सरल और कोमल बालगीत है जिसमें एक छोटा बालक आकाश में चमकते चाँद को 'मातुल' (मामा) कहकर सम्बोधित करता है। इसमें सम्बोधन प्रथमा विभक्ति (हे मातुल चन्द्र!, हे बालक!, हे लते!) का सुंदर अभ्यास कराया गया है।
📖 मूल श्लोकाः एवं सरल भावार्थ
श्लोक २: कथमायासि न भो मम गेहम्? मातुल! किरसि कथं न स्नेहम्? कदागमिष्यसि मातुल चन्द्र! कुत आगच्छसि मातुल चन्द्र!॥ (भावार्थ: अरे मामा! आप मेरे घर क्यों नहीं आते? मुझ पर प्यार क्यों नहीं बिखेरते? आप कब आएँगे?)
श्लोक ३: धवलं तव चन्द्रिकावितानम् तारकखचितं शितपरिधानम्। मह्यं दास्यसि मातुल चन्द्र! कुत आगच्छसि मातुल चन्द्र!॥ (भावार्थ: आपकी दूध जैसी सफेद चाँदनी फैली है, आपका वस्त्र तारों से जड़ा है। क्या आप वह वस्त्र मुझे देंगे?)
श्लोक ४: त्वरितमेहि मां श्रावय गीतिम् प्रियमातुल! वर्धय मे प्रीतिम्। किं न यास्यसि मातुल चन्द्र! कुत आगच्छसि मातुल चन्द्र!॥ (भावार्थ: हे प्यारे मामा! जल्दी आओ, मुझे लोरी सुनाओ, और मेरा प्यार बढ़ाओ।)
छात्र अभिनय एवं मधुर स्वर के साथ इस बालगीत का गान करें:
"कुत आगच्छसि मातुल चन्द्र! कुत्र गमिष्यसि मातुल चन्द्र!... धवलं तव चन्द्रिकावितानम्, तारकखचितं शितपरिधानम्..."
- मातुल! किरसि कथं न स्नेहम्? → कदागमिष्यसि मातुल चन्द्र!
- तारकखचितं शितपरिधानम् → मह्यं दास्यसि मातुल चन्द्र!
- त्वरितमेहि मां श्रावय गीतिम् → प्रियमातुल! वर्धय मे प्रीतिम्।
- अतिशयविस्तृतनीलाकाशः → नैव दृश्यते क्वचिदवकाशः।
- धवलं तव चन्द्रिकावितानम् → तारकखचितं शितपरिधानम्।
(क) प्रियमातुल! वर्धय मे प्रीतिम्।
(ख) कथं प्रयास्यसि मातुल चन्द्र!
(ग) धवलं तव चन्द्रिकावितानम्।
(घ) त्वरितमेहि मां श्रावय गीतिम्।
(ङ) अतिशयविस्तृतनीलाकाशः।
(क) अस्मिन् पाठे कः मातुलः अस्ति?
उत्तरम्: अस्मिन् पाठे चन्द्रः (चन्द्रमा) मातुलः अस्ति।
(ख) नीलाकाशः कीदृशः अस्ति?
उत्तरम्: नीलाकाशः अतिशयविस्तृतः अस्ति।
(ग) मातुलचन्द्रः किं न किरति?
उत्तरम्: मातुलचन्द्रः स्नेहं न किरति।
(घ) किं श्रावयितुं शिशुः चन्द्रं कथयति?
उत्तरम्: शिशुः चन्द्रं गीतिं (गीत/लोरी) श्रावयितुं कथयति।
(ङ) चन्द्रस्य परिधानं कीदृशम् अस्ति?
उत्तरम्: चन्द्रस्य परिधानं तारकखचितं शितम् (धवलं) च अस्ति।
यथा — चन्द्रः → हे चन्द्र!
- बालकः → हे बालक!
- लता → हे लते!
- शोभा → हे शोभे!
- नदी → हे नदि!
- साधुः → हे साधो!
- मित्रम् → हे मित्र!
(क) जगन्नाथपुरी कुत्र अस्ति? (जगन्नाथपुरी कहाँ है?)
(ख) त्वं पुरीं कदा गमिष्यसि? (तुम पुरी कब जाओगे?)
(ग) गङ्गानदी कुतः प्रवहति? (गंगा नदी कहाँ से बहती है?)
(घ) तव स्वास्थ्यं कथम् अस्ति? (तुम्हारा स्वास्थ्य कैसा है?)
(ङ) मरालः किम् करोति? (हंस क्या करता है?)
प्रश्न: भारतीय-संस्कृते चन्द्रमसं 'मातुलः' (मामा) इति कथयित्वा बालकेषु प्रकृतेः प्रति आत्मीयतायाः (Affinity with Nature) कीदृशः संस्कारः सिच्यते?
उत्तर: भारतीय-संस्कृतिः समग्रं ब्रह्माण्डं परिवाररूपेण पश्यति ('वसुधैव कुटुम्बकम्')। चन्द्रमसं 'मातुल' मत्वा बालकाः प्रकृतिं आत्मीयरूपेण स्वीकुर्वन्ति, यत् बालकेषु पर्यावरण-संरक्षणस्य, खगोल-जिज्ञासायाः, सहृदयतायाः च बीजारोपणं करोति।