वह चिड़िया जो
केदारनाथ अग्रवाल | CBSE पाठ्यक्रम 2026-27 | संपूर्ण प्रश्नोत्तर एवं भावार्थ
📜 मूल कविता
प्रस्तुत कविता में कवि केदारनाथ अग्रवाल ने एक नीले पंखों वाली छोटी चिड़िया के माध्यम से मानवीय स्वभाव के श्रेष्ठ गुणों को रेखांकित किया है। चिड़िया संतोषी है—वह दूध-भरे जुंडी के दानों में ही तृप्त हो जाती है। वह एकांत जंगल में बूढ़े वन-बाबा के लिए उन्मुक्त कंठ से मीठा गाती है। वह उफनती नदी की धारा से निडर होकर जल रूपी मोती चुनती है। उसे अपने आत्मसम्मान (स्वाभिमान) पर गर्व है। यह कविता हमें संतोष, प्रकृति-प्रेम, स्वतंत्रता और निर्भीकता से जीवन जीने की प्रेरणा देती है।
कविता पढ़कर हमारे मन में एक छोटी, नीले पंखों वाली, संतोषी, मधुरभाषी और साहसी चिड़िया का सजीव चित्र उभरता है:
- शारीरिक रूप-रंग: उसका आकार छोटा और नन्हा है। उसके पंख सुंदर चमकीले नीले रंग के हैं और उसकी चोंच नुकीली है।
- खान-पान और संतोष: वह खेतों में जाकर दूध से भरे ज्वार-बाजरे (जुंडी) के कच्चे दानों को बड़े चाव और स्वाद से खाती है। वह थोड़े में ही संतोष कर लेती है।
- मधुर गायन और एकांत-प्रेम: वह घने पुराने जंगल (वन-बाबा) में अपने मधुर कंठ से रस घोलकर गाती है। उसे एकांत (विजन) से गहरा प्रेम है।
- साहसी एवं गर्वीली: वह उफनती नदी के बीच से निडर होकर अपनी चोंच में पानी की बूँद रूपी मोती ले आती है। उसे अपने श्रम और साहस पर गर्व है।
यदि हमें इस कविता का कोई अन्य शीर्षक देना हो, तो निम्नलिखित शीर्षक अत्यंत उपयुक्त होंगे:
- "नीले पंखों वाली चिड़िया" — क्योंकि पूरी कविता में चिड़िया के नीले पंखों और उसके विशिष्ट गुणों का ही वर्णन है।
- "नन्ही संतोषी चिड़िया" — क्योंकि चिड़िया का सबसे प्रमुख गुण उसका संतोषी और स्वाभिमानी स्वभाव है।
- "साहसी चिड़िया" — क्योंकि वह उफनती नदी से जल का मोती लाने वाली निडर पक्षी है।
इनमें से "नीले पंखों वाली चिड़िया" सबसे सटीक और सार्थक शीर्षक है।
कविता के आधार पर चिड़िया को निम्नलिखित तीन प्रमुख चीज़ों से बहुत प्यार है:
- अन्न से प्यार: उसे दूध से भरे जुंडी (ज्वार) के कच्चे दानों से गहरा प्रेम है, जिन्हें वह बड़े चाव और आनंद से खाती है।
- विजन (एकांत व वन) से प्यार: उसे विजन अर्थात् शांत और प्राकृतिक एकांत स्थान से बहुत प्यार है, जहाँ वह बूढ़े वन-बाबा के लिए मुक्त कंठ से गाती है।
- नदी से प्यार: उसे बहती हुई उफनती नदी से अथाह प्रेम है, जिसकी गहरी जलधारा से वह अपनी प्यास बुझाती है और जल रूपी मोती ग्रहण करती है।
(क) 'रस उँडेलकर गा लेती है' का आशय:
चिड़िया जब पुराने घने जंगल में गाती है, तो वह किसी बनावटीपन या संकोच के बिना अपने हृदय की सारी मिठास और आनंद अपने स्वर में भर देती है। उसका गीत इतना कर्णप्रिय, स्वाभाविक और भावपूर्ण होता है मानो उसने वातावरण में रस (अमृत) घोल दिया हो।
(ख) 'चढ़ी नदी का दिल टटोलकर जल का मोती ले जाती है' का आशय:
चिड़िया किनारे पर बैठकर बहते पानी को नहीं पीती, बल्कि जब नदी जल से लबालब भरी होकर पूरे वेग से बह रही होती है, तब वह निर्भीक होकर नदी की अगाध जलधारा के बीच तक जाती है और पानी की बूँद रूपी बहुमूल्य मोती अपनी चोंच में भर लेती है। इसमें चिड़िया का अदम्य साहस, निडरता और स्वाभिमान प्रकट होता है।
कवि ने जिस नीली चिड़िया का वर्णन किया है, वह अनुमानतः निम्नलिखित में से कोई एक चिड़िया हो सकती है:
- नीलकंठ (Indian Roller): इसके पंख चटख नीले रंग के होते हैं और यह भारतीय जंगलों में बहुतायत से पाई जाती है।
- किलकिला (Kingfisher): यह चिड़िया भी नीले पंखों वाली होती है और नदी के तेज़ बहाव से मछलियाँ व जल पकड़ने में अत्यंत कुशल व साहसी होती है।
कवि की चिड़िया के गुणों (नीले पंख, नदी से जल का मोती लाना) को देखते हुए यह किलकिला या नीलकंठ ही रही होगी।
कविता में प्रयुक्त प्रमुख गुणवाचक विशेषण एवं उनके सार्थक वाक्य-प्रयोग:
- संतोषी: वह संतोषी स्वभाव का व्यक्ति है, जो थोड़े में भी प्रसन्न रहता है।
- मुँहबोली: वह नन्हीं बालिका पूरे परिवार की मुँहबोली लाडली है।
- गर्बीली: रानी लक्ष्मीबाई अपने आत्मसम्मान के प्रति अत्यंत गर्बीली थीं।
- बूढ़ा: गाँव के बाहर एक बूढ़ा बरगद का वृक्ष खड़ा है।
1. संतोष का महत्त्व: चिड़िया हमें सिखाती है कि भौतिक साधनों की अंधी दौड़ के बजाय जो प्राप्त है, उसमें आनंद और तृप्ति का अनुभव करना चाहिए। इससे मानसिक शांति मिलती है।
2. स्वाभिमान और श्रम: वह दूसरों पर आश्रित रहने के बजाय अपने परिश्रम से अन्न और जल प्राप्त करती है तथा अपने स्वाभिमान (गर्व) की रक्षा करती है।
3. प्रासंगिकता: आज के समय में जहाँ दिखावा और असंतोष बढ़ रहा है, चिड़िया का यह आचरण हमें सादगी, प्रकृति-प्रेम और आत्मनिर्भरता की अनमोल सीख देता है।
बचपन
कृष्णा सोबती | CBSE पाठ्यक्रम 2026-27 | संपूर्ण प्रश्नोत्तर एवं संस्मरण विश्लेषण
प्रसिद्ध लेखिका कृष्णा सोबती ने अपने संस्मरण 'बचपन' में पिछली सदी (बीसवीं सदी) के अपने बचपन के दिनों की यादों को सजीव किया है। उन्होंने अपने समय की वेशभूषा, खान-पान, मनोरंजन के साधनों (ग्रामोफ़ोन, शिमला-कालका ट्रेन) और आज के आधुनिक युग के भारी बदलावों का सुंदर तुलनात्मक चित्रण किया है। पाठ में लेखिका के स्वावलंबन (खुद मोज़े धोना, जूते पॉलिश करना), चश्मा लगाने पर चचेरे भाई की छेड़छाड़ ('लंगूर') और शिमला के मॉल रोड की स्मृतियाँ बहुत रोचक ढंग से प्रस्तुत की गई हैं।
लेखिका बचपन में इतवार (रविवार) की सुबह निम्नलिखित आवश्यक काम नियमपूर्वक करती थीं:
- मोज़े और जुराबें धोना: अपने मोज़े और जुराबें स्वयं धोती थीं। उस समय घर के नौकरों को बच्चों के मोज़े धोने की सख्त मनाही थी।
- जूते पॉलिश करना: मोज़े धोने के बाद वे अपने-अपने जूतों पर पॉलिश लगाकर उन्हें कपड़े या ब्रश से रगड़कर चमकाती थीं।
- कैस्टर ऑयल / ऑलिव ऑयल पीना: हर शनिवार को उन्हें पेट साफ रखने के लिए कैस्टर ऑयल या ऑलिव ऑयल (जैतून का तेल) पीना पड़ता था, जिसकी गंध से इतवार की सुबह भी जी मिचलाने लगता था।
इस नियम से बच्चों में बचपन से ही स्वावलंबन और श्रम के प्रति निष्ठा का संस्कार पड़ता था।
लेखिका ने अपने समय और आज के समय की दूरी (बदलाव) को स्पष्ट करने के लिए निम्नलिखित उदाहरण दिए हैं:
- मनोरंजन के साधन: उन दिनों कुछ घरों में केवल ग्रामोफ़ोन होते थे, जबकि आज हर घर में रेडियो, टेलीविज़न और कंप्यूटर आ चुके हैं।
- खान-पान: उस समय की कुल्फ़ी अब आइसक्रीम में बदल गई है। समोसा और कचौड़ी का स्थान अब पेटीज़ ने ले लिया है।
- पेय पदार्थ: उस समय शहतूत, फ़ाल्से और खसखस के शरबत पिए जाते थे, जबकि आज उनकी जगह कोक और पेप्सी ने ले ली है।
- पहनावा: पहले फ्रॉक, निक्कर, गरारे और लहंगे पहने जाते थे, जबकि आज चूड़ीदार और घेरदार कुर्ते व आधुनिक पश्चिमी कपड़े पहने जाते हैं।
चश्मा लगाने का कारण: लेखिका दिन की प्राकृतिक रोशनी में पढ़ने के बजाय रात को टेबल लैंप की तेज़ रोशनी के सामने बैठकर पढ़ती और लिखती थीं। आँखों पर अत्यधिक तनाव पड़ने के कारण उनकी नज़र कमज़ोर हो गई और डॉक्टर ने उन्हें चश्मा लगाने की सलाह दी।
चचेरे भाई की छेड़छाड़: जब लेखिका ने पहली बार चश्मा लगाया, तो उनका चेहरा अजीब-सा लगा। उनके चचेरे भाई उन्हें चिढ़ाते हुए यह शेर बोलते थे:
"आँख पर चश्मा लगाया ताकि सूझे दूर की,
यह नहीं लड़की को मालूम सूरत बनी लंगूर की!"
वे उन्हें 'लंगूर' कहकर छेड़ते थे, जिससे लेखिका खीझ जाती थीं, पर मन-ही-मन यह शेर उन्हें बुरा भी नहीं लगता था।
लेखिका बचपन में शिमला के मॉल पर घूमते हुए निम्नलिखित चीज़ें बड़े स्वाद और आनंद के साथ खाती थीं:
- भुने हुए चने और अनारदाने का चूर्ण: गर्म-गर्म चने की पुड़िया जो नीचे से तिरछी और ऊपर से चौड़ी होती थी, एक-एक दाना मुँह में डालकर चबाती थीं।
- चॉकलेट और टॉफ़ी: हफ्ते में एक बार चॉकलेट खरीदने की छूट थी। वे रात को खाने के बाद बिस्तर पर लेटकर मज़ा लेकर चॉकलेट खाती थीं।
- प्रमुख फल: शिमला के खट्टे-मीठे काफ़ल (जिन्हें याद कर आज भी मुँह में पानी भर आता है), चेस्टनट (जिसे आग पर भूनकर छिलका उतारकर खाया जाता था), और रसभरी व कसमल।
आज इक्कीसवीं सदी के वैज्ञानिक युग में हमें निम्नलिखित आधुनिक तकनीकी उपकरण और साधन अत्यधिक आकर्षित करते हैं:
- स्मार्टफ़ोन और इंटरनेट: जिसके माध्यम से पलक झपकते ही पूरी दुनिया की जानकारी और ऑनलाइन शिक्षा उपलब्ध हो जाती है।
- मेट्रो ट्रेन व बुलेट ट्रेन: तेज़ गति से यातायात सुगम बनाने वाले साधन।
- आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और रोबोट: जो मानव के जटिल कार्यों को चुटकियों में हल कर देते हैं।
- ड्रोन और अंतरिक्ष मिशन (जैसे चंद्रयान): जो विज्ञान की नई ऊँचाइयों का अनुभव कराते हैं।
क्रियाओं से बनी भाववाचक संज्ञाएँ एवं उनके वाक्य-प्रयोग:
- गूँजना (क्रिया) → गूँज (भाववाचक संज्ञा): मंदिर की घंटी की गूँज दूर-दूर तक सुनाई दे रही थी।
- बदलना (क्रिया) → बदलाव (भाववाचक संज्ञा): समय के साथ समाज में कई सकारात्मक बदलाव आए हैं।
- दौड़ना (क्रिया) → दौड़ (भाववाचक संज्ञा): वार्षिक खेलकूद में उसने सौ मीटर की दौड़ में प्रथम स्थान पाया।
- खीझना (क्रिया) → खीझ (भाववाचक संज्ञा): बार-बार चिढ़ाने से बालक के चेहरे पर खीझ साफ़ दिखाई दे रही थी।
1. स्वावलंबन: अपने व्यक्तिगत कार्य (जैसे जूते पॉलिश करना, कपड़े सहेजना, कमरे की सफ़ाई) स्वयं करने की आदत डालें, जिससे आत्मनिर्भरता आए।
2. प्राकृतिक जीवन व शारीरिक खेल: मोबाइल स्क्रीन से बाहर निकलकर मैदान में खेलना, प्रकृति के सान्निध्य में समय बिताना और सादा पौष्टिक भोजन करना, जिससे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य सुदृढ़ रहे।
नादान दोस्त
मुंशी प्रेमचंद | CBSE पाठ्यक्रम 2026-27 | संपूर्ण प्रश्नोत्तर एवं चरित्र-चित्रण
उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद द्वारा रचित कहानी 'नादान दोस्त' बाल-मनोविज्ञान का अद्भुत उदाहरण है। केशव और श्यामा के घर की कार्निस पर चिड़िया ने तीन अंडे दिए थे। बच्चों के मन में अंडों को लेकर कौतूहल और चिंता जागी। उन्होंने अंडों को धूप से बचाने के लिए टोकरी लगाई, नीचे चिथड़े बिछाए और दाना-पानी रखा। परंतु अज्ञानतावश केशव द्वारा अंडों को छू लिए जाने के कारण चिड़िया ने उन्हें गंदा समझकर गिरा दिया और वे टूट गए। इस कहानी का मूल संदेश है कि केवल अच्छी नीयत होना ही पर्याप्त नहीं है; किसी भी कार्य को करने के लिए सही ज्ञान और बड़ों का मार्गदर्शन भी अनिवार्य है।
बच्चों के मन में उठने वाले सवाल:
- अंडे कितने बड़े होंगे? किस रंग के होंगे? कितने होंगे?
- उनमें से बच्चे किस तरह निकल आएँगे? बच्चों के पर (पंख) कैसे निकलेंगे?
- घोंसला कैसा है? चिड़िया बेचारी इतना दाना कहाँ से लाएगी कि सारे बच्चों का पेट भर सके?
आपस में ही तसल्ली देने का कारण: उनके इन कौतूहल भरे प्रश्नों का उत्तर देने वाला घर में कोई नहीं था। अम्माँ को घर के काम-धंधों से फ़ुरसत नहीं थी और बाबूजी (पिताजी) हमेशा पढ़ने-लिखने और दफ़्तर के काम में व्यस्त रहते थे। इसलिए दोनों बच्चे आपस में ही सवाल-जवाब करके अपने मन को समझा लेते थे।
केशव और श्यामा ने अंडों को सुख-सुविधा और सुरक्षा देने के उद्देश्य से निम्नलिखित चीज़ें रखी थीं:
- चिथड़े (कपड़े की गद्दी): अंडे तिनकों पर पड़े थे, जिससे केशव को लगा कि उन्हें चुभन और तकलीफ़ हो रही होगी। इसलिए उसने पुराने कपड़ों की गद्दी बनाकर अंडों के नीचे रख दी।
- टोकरी: अंडों पर कड़ी धूप पड़ रही थी, इसलिए धूप से बचाने के लिए उसने कूड़े वाली टोकरी को एक लकड़ी से अड़ाकर छत बना दी।
- दाना-पानी: चिड़िया को बच्चों के लिए दूर-दूर दाना ढूँढने न जाना पड़े, इसलिए उसने प्याली में चावल के दाने और थोड़ा पानी रख दिया।
बच्चों ने यह सब अंडों की रक्षा और भलाई के लिए किया था।
केशव और श्यामा ने अपने इरादे (नीयत) से तो रक्षा करनी चाही थी, परंतु परिणाम के आधार पर यह उनकी घोर नादानी सिद्ध हुई:
- अज्ञानता: उन्हें यह मालूम नहीं था कि यदि मनुष्य चिड़िया के अंडों को हाथ लगा दे, तो वे अंडे गंदे (अपवित्र) हो जाते हैं। फिर चिड़िया उन्हें नहीं सेती और घोंसले से गिरा देती है।
- दुखद परिणाम: केशव द्वारा अंडों को छूने के कारण चिड़िया ने तीनों अंडों को कार्निस से नीचे गिराकर तोड़ डाला, जिससे उनमें पल रहे नन्हे चूज़े नष्ट हो गए।
अतः बिना सही जानकारी के किया गया उपकार भी अनर्थकारी बन सकता है — यह बच्चों की नादानी ही थी।
बच्चों के अनुमान: उन्होंने अनुमान लगाया कि अंडों को तिनकों पर तकलीफ़ हो रही होगी, कड़ी धूप से वे परेशान होंगे और चिड़िया बेचारी अकेले बच्चों का पेट नहीं भर पाएगी।
हमारी प्रतिक्रिया (यदि हम होते):
- हम अंडों को कदापि हाथ नहीं लगाते और न ही घोंसले के पास जाते।
- हम केवल दूर ज़मीन पर या मुंडेर पर चिड़िया के लिए थोड़ा सा दाना और साफ़ पानी का कटोरा रख देते।
- हम अपनी माँ या बड़ों को इसकी सूचना देकर उनसे पूछते कि पक्षियों की सुरक्षित सहायता कैसे की जाए।
बाहर आने का कारण: बच्चे दोपहर में केवल सोने का नाटक कर रहे थे। वे माँ की डाँट और रोक-टोक से बचकर कार्निस पर रखे अंडों की हिफ़ाज़त (छाया व दाना-पानी का इंतज़ाम) करने के लिए माँ के सोते ही चुपके से बाहर निकल आए।
किवाड़ खोलने का सच न बताने का कारण:
- श्यामा ने इसलिए नहीं बताया क्योंकि उसे डर था कि केशव की बहुत पिटाई होगी और वह भाई से प्रेम करती थी।
- केशव इसलिए चुप रहा क्योंकि उसे भय था कि कहीं श्यामा भेद न खोल दे और माँ उसकी पिटाई न कर दे। दोनों में पिटाई का डर और परस्पर साझीदार का भाव था।
हम इस कहानी के लिए निम्नलिखित शीर्षक सुझाना चाहेंगे:
- "बचपने की भूल" — क्योंकि बच्चों ने कोई पाप जानबूझकर नहीं किया था, यह उनके बचपने की अनजाने में हुई गंभीर भूल थी।
- "अंडों की हिफ़ाज़त" — क्योंकि पूरी कहानी बच्चों द्वारा अंडों की रक्षा करने के प्रयासों के इर्द-गिर्द घूमती है।
- "नासमझी का पछतावा" — क्योंकि अंत में केशव अपनी गलती पर कई दिनों तक आँसू बहाकर पछताता रहा।
इनमें "बचपने की भूल" सबसे प्रभावशाली शीर्षक है।
1. स्पर्श न करना: घोंसले और अंडों को भूलकर भी हाथ नहीं लगाएँगे, ताकि चिड़िया असहज या भयभीत न हो।
2. दूरी बनाए रखना: उस स्थान के पास बार-बार जाकर शोर नहीं करेंगे और न ही वहाँ तेज़ रोशनी करेंगे।
3. सुरक्षित दाना-पानी: घोंसले से सुरक्षित दूरी पर एक मिट्टी के सकोरे में साफ़ पानी और बाजरा/चावल के दाने रख देंगे।
4. बिल्लियों से सुरक्षा: ध्यान रखेंगे कि घर की पालतू बिल्ली या बाहर के जानवर घोंसले तक न पहुँच सकें।
चाँद से थोड़ी-सी गप्पें
शमशेर बहादुर सिंह | CBSE पाठ्यक्रम 2026-27 | संपूर्ण प्रश्नोत्तर एवं काव्यांश व्याख्या
📜 मूल कविता
प्रस्तुत कविता में आधुनिक हिंदी के सुप्रसिद्ध कवि शमशेर बहादुर सिंह ने दस-ग्यारह वर्ष की एक नन्हीं बालिका की बाल-सुलभ कल्पनाओं का अत्यंत मनोरंजक चित्रण किया है। बालिका रात के आकाश में चमकते चाँद से बातें करती है। वह मानती है कि चाँद ने तारों जड़ा पूरा नीला आकाश वस्त्र (पोशाक) के रूप में पहन रखा है और सिर्फ़ अपना गोरा-चिट्टा गोल मुँह बाहर निकाल रखा है। वह चाँद के घटने और बढ़ने (कृष्ण पक्ष व शुक्ल पक्ष की कलाओं) को एक लाइलाज 'बीमारी' (मरज़) मानती है जो कभी ठीक होने का नाम ही नहीं लेती। कविता में बिंब-विधान और मानवीकरण अलंकार का अद्भुत सौंदर्य है।
इस पंक्ति के माध्यम से लड़की यह कहना चाहती है कि:
- चाँद ने रात के पूरे नीले आकाश को अपने एक विशाल वस्त्र (वस्त्र/पोशाक) की तरह पहन रखा है।
- आकाश में टिमटिमाते हुए असंख्य चमकीले तारे उस पोशाक पर जड़े हुए सुंदर मोतियों और सितारों के समान दिखाई दे रहे हैं।
- चाँद ने अपने पूरे शरीर को इस तारों-जड़ी पोशाक से ढँक रखा है और केवल अपना गोरा-चिट्टा, गोल-मटोल मुँह ही बाहर निकाल रखा है।
यह बालिका की सौंदर्यपरक एवं सजीव कल्पना को व्यक्त करता है।
‘हमको बुद्धू ही निरा समझा है!’ कहकर लड़की चाँद से यह कहना चाहती है कि:
- चाँद यह न समझे कि वह एक नासमझ और मूर्ख बच्ची है जो उसकी चाल नहीं समझती।
- वह अच्छी तरह जानती है कि चाँद का घटते-बढ़ते रहना कोई स्वाभाविक बात या मज़ाक नहीं है, बल्कि उसे एक अजीब बीमारी (रोग) है।
- लड़की यह जताती है कि वह चाँद की इस 'बीमारी' के रहस्य को पूरी तरह समझ चुकी है, इसलिए चाँद उसे बहका नहीं सकता।
तिथि का अनुमान: कवि (या लड़की) ने चाँद से गप्पें पूर्णिमा से ठीक दो-तीन दिन पहले (एकादशी से त्रयोदशी के बीच) लगाई होंगी।
प्रमाणकारी पंक्तियाँ:
"गोल हैं खूब मगर / आप तिरछे नज़र आते हैं ज़रा..."
कारण: यदि पूर्णिमा होती तो चाँद पूरी तरह गोल होता, ज़रा भी तिरछा न दिखता। और यदि अष्टमी या दूज होती तो वह बहुत पतला दिखता। चूँकि चाँद लगभग पूरा गोल है मगर अभी भी ज़रा-सा तिरछा है और गोल होने की दिशा में बढ़ रहा है, अतः यह शुक्ल पक्ष की एकादशी या द्वादशी का दिन रहा होगा।
आशय: 'मरज़' का अर्थ होता है बीमारी या रोग। लड़की चाँद से कहती है कि उसका लगातार घटना और बढ़ना एक ऐसा असाध्य (लाइलाज) रोग है, जो कभी ठीक होने का नाम ही नहीं लेता।
- जब चाँद घटना शुरू करता है, तो घटते-घटते बिल्कुल गायब (अमावस्या) हो जाता है।
- जब बढ़ना शुरू करता है, तो तब तक साँस नहीं लेता जब तक पूरी तरह गोल-मटोल (पूर्णिमा) न हो जाए।
- यह सिलसिला महीने-दर-महीने लगातार चलता रहता है और कभी समाप्त नहीं होता, इसलिए बालिका इसे कभी न ठीक होने वाली बीमारी मानती है।
वैज्ञानिक कारण: चाँद पृथ्वी का उपग्रह है और वह पृथ्वी की परिक्रमा करता है। चाँद का अपना कोई प्रकाश नहीं होता, वह सूर्य के प्रकाश से चमकता है। परिक्रमा के दौरान पृथ्वी से चाँद का जितना प्रकाशित भाग हमें दिखाई देता है, उसी को चाँद की कलाएँ (Phases of Moon) कहते हैं। अमावस्या से पूर्णिमा तक उसका आकार बढ़ता दिखता है (शुक्ल पक्ष) और पूर्णिमा से अमावस्या तक घटता दिखता है (कृष्ण पक्ष)।
लड़की द्वारा बीमारी मानने का कारण: छोटी बालिका खगोल विज्ञान के इस नियम से अनभिज्ञ है। वह अपनी बाल-सुलभ कल्पना के अनुसार किसी जीव के निरंतर दुबले होने और मोटे होने को बीमारी का लक्षण मान लेती है।
समानार्थी या पूरक शब्द-युग्म एवं उनके अर्थ:
- सीधा-सादा: छल-कपट से रहित, अत्यंत सरल स्वभाव वाला।
- हँसमुख-चेहरा: हमेशा मुस्कुराने वाला, प्रसन्नचित्त।
- दुबला-पतला: कमजोर शरीर वाला, कृशकाय।
- चटपटा-मसालेदार: तीखे और तेज़ स्वाद वाला भोजन।
1. रोचकता और जिज्ञासा: यदि खगोलीय घटनाओं को नीरस तथ्यों के रूप में बताया जाए, तो बच्चे ऊब सकते हैं। कविता के माध्यम से बच्चे कौतूहल और आनंद के साथ प्रकृति की घटनाओं से जुड़ते हैं।
2. कल्पनाशक्ति का विकास: यह बच्चों की सोच को पंख देती है कि वे अपने आस-पास के संसार को मानवीय दृष्टिकोण और संवेदनशीलता से देखना सीखें।
3. वैज्ञानिक जिज्ञासा की शुरुआत: ऐसी कविताएँ पढ़ने के बाद बच्चे बड़ों से पूछते हैं कि 'चाँद सचमुच क्यों घटता-बढ़ता है?', जो वैज्ञानिक चिंतन की पहली सीढ़ी बनती है।
अक्षरों का महत्त्व
गुणाकर मुले | CBSE पाठ्यक्रम 2026-27 | संपूर्ण प्रश्नोत्तर एवं ऐतिहासिक विकास
प्रसिद्ध विज्ञान-लेखक गुणाकर मुले द्वारा लिखित इस ज्ञानवर्धक निबंध में अक्षरों और लिपि के ऐतिहासिक उद्भव का प्रामाणिक विवरण दिया गया है। पुराने ज़माने के लोग मानते थे कि अक्षरों की खोज ईश्वर ने की है, परंतु आज विज्ञान ने सिद्ध कर दिया है कि अक्षरों की खोज स्वयं मनुष्य ने की है। अक्षरों की खोज से पहले मनुष्य पशु-पक्षियों और आदमियों के चित्र बनाकर (चित्र-संकेत) अपने भाव व्यक्त करता था। लगभग छह हज़ार वर्ष पूर्व अक्षरों की खोज हुई, जिसके साथ ही इतिहास का आरंभ हुआ। अक्षरों के कारण ही मनुष्य अपने विचारों और ज्ञान को आने वाली पीढ़ियों के लिए सहेज सका और मानव सभ्यता का द्रुत गति से विकास हुआ।
पाठ में अक्षरों की खोज के साथ एक नए युग की शुरुआत इसलिए कही गई है क्योंकि:
- इतिहास का प्रारंभ: अक्षरों की खोज के बाद ही मनुष्य अपने विचारों, घटनाओं और जीवन का हिसाब-किताब लिखकर रखने लगा। जब से मनुष्य के लिखे लेख मिलने लगे, तभी से 'इतिहास' शुरू हुआ। उससे पहले के काल को 'प्रागैतिहासिक काल' (इतिहास से पहले का काल) कहा जाता है।
- ज्ञान का संरक्षण व संचरण: एक पीढ़ी का ज्ञान, अनुभव और संचित संपदा अगली पीढ़ी तक आसानी से पहुँचने लगी।
- सभ्यता का तीव्र विकास: ज्ञान के लिखित रूप में सुरक्षित होने से विज्ञान, कला, साहित्य और समाज का विकास अभूतपूर्व गति से हुआ और मनुष्य 'सभ्य' कहलाने लगा।
अक्षरों की खोज का सिलसिला लगभग छह हज़ार (6,000) वर्ष पहले शुरू हुआ। इसका विकास क्रम निम्नलिखित चरणों में हुआ:
- चित्र-संकेत (Pictographs): सबसे पहले प्रागैतिहासिक मानव ने अपने भाव व्यक्त करने के लिए गुफाओं और पत्थरों पर पशुओं, पक्षियों और आदमियों के चित्र बनाए (जैसे शिकार के दृश्य)।
- भाव-संकेत (Ideographs): चित्रों के बाद भाव-संकेत अस्तित्व में आए। उदाहरण के लिए, एक छोटे वृत्त के चारों ओर किरणों की रेखाएँ खींचने पर वह 'सूर्य' का चित्र बनता था, जो आगे चलकर 'ताप' या 'धूप' का भाव-संकेत बन गया।
- अक्षरों (लिपियों) का जन्म: भाव-संकेतों के बहुत समय बाद मनुष्य ने ध्वनियों को चिन्हित करने के लिए अक्षरों की खोज की, जिससे विभिन्न लिपियों का विकास हुआ।
अक्षरों की खोज से पहले मनुष्य दूर-दराज़ के इलाकों तक अपने संदेश और विचार पहुँचाने के लिए निम्नलिखित साधनों का उपयोग करता था:
- चित्र-संकेत और भित्ति-चित्र: पत्थरों, पेड़ों की छालों और गुफाओं पर जानवरों, हथियारों व आदमियों के चित्र बनाकर संदेश दिया जाता था।
- धुएँ और आग के संकेत: ऊँचे पहाड़ों पर आग जलाकर या धुएँ के गुबार उठाकर दूर स्थित कबीलों को खतरे या उत्सव की सूचना दी जाती थी।
- ढोल और नगाड़े की ध्वनि: विशेष ताल पर नगाड़ा बजाकर दूर तक ध्वनि संदेश भेजे जाते थे।
- हरकारे (संदेशवाहक): तेज़ दौड़ने वाले दूत या घुड़सवार मौखिक संदेश याद करके एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाते थे।
यदि अक्षरों की खोज न हुई होती, तो आज हमारी दुनिया की दशा अत्यंत दयनीय और पिछड़ी होती:
- इतिहास का अभाव: हमें अपने पूर्वजों, राजा-महाराजाओं, प्राचीन सभ्यताओं और वैज्ञानिकों के बारे में कोई प्रामाणिक जानकारी नहीं होती।
- ज्ञान का विनाश: जो व्यक्ति जो कुछ सीखता, उसकी मृत्यु के साथ ही वह ज्ञान समाप्त हो जाता; ज्ञान को पुस्तकों में संजोना असंभव होता।
- अशिक्षा व विज्ञान का शून्य: विद्यालय, विश्वविद्यालय, समाचार-पत्र, पुस्तकें, कंप्यूटर और इंटरनेट का कोई अस्तित्व नहीं होता।
- आदिम अवस्था: हम आज भी जंगलों में आदिमानवों की भाँति केवल मौखिक बातचीत और इशारों के सहारे जीवन व्यतीत कर रहे होते।
1. निश्चित संख्यावाचक विशेषण: जो विशेषण शब्द संज्ञा या सर्वनाम की निश्चित संख्या का बोध कराते हैं, उन्हें निश्चित संख्यावाचक विशेषण कहते हैं।
उदाहरण: छह हज़ार वर्ष, पाँच अरब वर्ष, दस बालक।
2. अनिश्चित संख्यावाचक विशेषण: जो विशेषण शब्द किसी निश्चित संख्या का बोध नहीं कराते, उन्हें अनिश्चित संख्यावाचक विशेषण कहते हैं।
उदाहरण: कई लोग, कुछ पुस्तकें, लाखों वर्ष, दो-तीन दिन।
1. भावों की त्वरित अभिव्यक्ति: इमोजी निश्चित रूप से आधुनिक युग के 'चित्र-संकेत' हैं जो समय बचाने और भावनाओं को तुरंत व्यक्त करने में सहायक हैं।
2. अक्षरों की अपरिहार्यता: परंतु जटिल दार्शनिक विचार, वैज्ञानिक शोध, कानून, संविधान और उच्च साहित्य का सृजन केवल अक्षरों और भाषा के बिना असंभव है। इमोजी सहायक हो सकते हैं, किंतु वे अक्षरों का स्थान कभी नहीं ले सकते।
पार नज़र के
जयंत विष्णु नार्लीकर (अनु॰ रेखा देशपांडे) | CBSE पाठ्यक्रम 2026-27 | संपूर्ण प्रश्नोत्तर
विख्यात खगोल वैज्ञानिक जयंत विष्णु नार्लीकर द्वारा लिखित यह एक उत्कृष्ट विज्ञान-कथा (Science Fiction) है। कहानी मंगल ग्रह (Mars) के निवासियों की काल्पनिक दुनिया पर आधारित है, जो सूर्य के प्राकृतिक संतुलन के बिगड़ने के कारण ज़मीन के नीचे विशेष कॉलोनियों में यंत्रों के सहारे रहते हैं। मुख्य पात्र 'छोटू' अपने पिता का सिक्योरिटी पास चुराकर गुप्त सुरंग में प्रवेश कर जाता है। इसी दौरान पृथ्वी (नासा/NASA) से छोड़ा गया एक मानवरहित अंतरिक्ष यान (वाइकिंग जैसा यान) मंगल ग्रह पर उतरता है और मिट्टी के नमूने लेने के लिए अपना यांत्रिक हाथ फैलाता है। छोटू कंट्रोल रूम में कौतूहलवश लाल बटन दबा देता है, जिससे यान का हाथ बेकार हो जाता है। बाद में पृथ्वी के वैज्ञानिक उसे ठीक कर मिट्टी के नमूने लेते हैं, ताकि यह पता लगाया जा सके कि मंगल पर जीवन है या नहीं।
रहने का स्थान: छोटू का परिवार मंगल ग्रह पर ज़मीन के नीचे बनी एक भूमिगत कॉलोनी में रहता था।
भूमिगत रहने का कारण:
- प्राचीन काल में उनके पूर्वज मंगल ग्रह की ज़मीन की सतह पर आम आदमियों की तरह बिना किसी विशेष उपकरण के रहते थे।
- कालांतर में सूरज में गहरा परिवर्तन (असंतुलन) आ गया। सूरज से मिलने वाली रोशनी और गरमी का प्राकृतिक संतुलन बिगड़ गया।
- प्राकृतिक परिवर्तन के कारण मंगल ग्रह के पशु-पक्षी, पेड़-पौधे और जीव एक-एक करके मरने लगे और समाप्त हो गए।
- मनुष्य ने अपने तकनीकी ज्ञान के बल पर ज़मीन के नीचे घर बनाए और सौर ऊर्जा व स्वचालित यंत्रों के सहारे जीवित रहने की सुरक्षित व्यवस्था की।
इजाज़त न होने का कारण: वह सुरंग ज़मीन की ऊपरी सतह (मंगल की खुली सतह) पर ले जाती थी। ज़मीन के ऊपर की परिस्थितियाँ सामान्य मानव जीवन के अनुकूल नहीं थीं:
- वहाँ का वातावरण अत्यधिक ठंडा था, जिसमें कोई भी आम इंसान बिना सुरक्षा के जम सकता था।
- वहाँ साँस लेने के लिए पर्याप्त ऑक्सीजन (हवा) नहीं थी।
- वहाँ केवल वही चुनिंदा लोग जा सकते थे, जिन्हें विशेष प्रकार का स्पेस-सूट (अंतरिक्ष पोशाक), ऑक्सीजन सिलेंडर और वहाँ चलने-फिरने का विशेष तकनीकी प्रशिक्षण प्राप्त था।
छोटू एक छोटा बच्चा था और उसके पास न तो स्पेस-सूट था और न ही कोई प्रशिक्षण, इसलिए उसे वहाँ जाने की सख्त मनाही थी। केवल छोटू के पापा जैसे विशेष तकनीशियन दल को ही वहाँ जाने की अनुमति थी।
छोटू द्वारा देखा गया दृश्य: कंट्रोल रूम में बड़ी स्क्रीन पर एक अज्ञात अंतरिक्ष यान दिखाई दे रहा था। उस यान से एक यांत्रिक (मैकेनिकल) हाथ बाहर निकल रहा था, जो ज़मीन की मिट्टी खोदने के लिए आगे बढ़ रहा था। सामने कंसोल पैनल पर कई रंग-बिरंगे बटन लगे थे।
छोटू की हरकत: कंसोल पैनल पर लगा उभरा हुआ लाल बटन छोटू को अपनी ओर बहुत आकर्षित कर रहा था। वह अपने कौतूहल को रोक न सका और उसने आगे बढ़कर लाल बटन को ज़ोर से दबा दिया।
परिणाम:
- लाल बटन दबते ही खतरे का सायरन बज उठा और कंट्रोल रूम में हड़कंप मच गया।
- अंतरिक्ष यान का बाहर निकला हुआ यांत्रिक हाथ अचानक हिलना बंद होकर बेकार (निष्क्रिय) हो गया।
- छोटू के पापा ने उसे तुरंत अपनी ओर खींचा और उसकी इस नादानी पर उसके गाल पर एक थप्पड़ रसीद कर दिया तथा बटन को पूर्व स्थिति में लाया।
मंगल ग्रह पर आम जीवन के नष्ट होने की प्रक्रिया इस प्रकार घटित हुई:
- सूरज में परिवर्तन: किसी अज्ञात प्राकृतिक कारण से सूरज की तापीय ऊर्जा और किरणों में भीषण परिवर्तन आ गया।
- प्राकृतिक असंतुलन: सूरज में बदलाव आते ही मंगल का पर्यावरण बिगड़ गया। वहाँ की जलवायु चरम पर पहुँच गई।
- जीव-जगत का अंत: प्रकृति के इस क्रूर बदलाव को पशु-पक्षी और वनस्पतियाँ सहन नहीं कर सकीं और वे धीरे-धीरे विलुप्त हो गए।
- मानव का भूमिगत शरण लेना: केवल बुद्धिमान मनुष्यों ने अपने वैज्ञानिक आविष्कारों, विशेष धातुओं और भूमिगत यंत्रों की सहायता से खुद को बचाया और ज़मीन के नीचे जीवन की नई व्यवस्था बनाई।
भेजने वाला: उस अंतरिक्ष यान को पृथ्वी की अंतरिक्ष एजेंसी 'नासा' (NASA — नेशनल एरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन) ने अपने 'वाइकिंग मिशन' के तहत भेजा था।
भेजने का उद्देश्य:
- पृथ्वी के वैज्ञानिक लंबे समय से यह जानने के लिए उत्सुक थे कि क्या पृथ्वी की भाँति मंगल ग्रह पर भी जीव-सृष्टि (जीवन) का अस्तित्व है?
- इसी महान वैज्ञानिक खोज के लिए यान मंगल की मिट्टी के नमूने एकत्र करने आया था, ताकि प्रयोगशाला में उनका विश्लेषण करके सूक्ष्म जीवों या जीवन के प्रमाणों का पता लगाया जा सके।
कॉलोनी के प्रबंध मंडल के तीनों प्रमुख अधिकारियों के विचार निम्नलिखित थे:
- नंबर एक (सुरक्षा अधिकारी): उनकी राय थी कि हम इस यान को नष्ट तो कर सकते हैं, पर ऐसा करने से हमें कोई जानकारी नहीं मिलेगी और अन्य ग्रह वालों को हमारे अस्तित्व का पता चल जाएगा। अतः यान को केवल नज़र में रखकर चुपचाप निगरानी करनी चाहिए।
- नंबर दो (वैज्ञानिक): उन्होंने नंबर एक की बात का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि यह यान मानवरहित (केवल यंत्र) है। इसे नष्ट करने से हमारे गुप्त ठिकानों का सुराग मिल सकता है, इसलिए हमें अपने अस्तित्व को छिपाए रखना चाहिए।
- नंबर तीन (सामाजिक व्यवस्था प्रमुख): उन्होंने सुझाव दिया कि हमें ज़मीन पर ऐसा प्रबंध रखना चाहिए जिससे बाहर से देखने पर यह लगे कि यहाँ कोई भी जीव नहीं रहता और यह ग्रह पूर्णतः निर्जन और बंजर है।
1. पर्यावरण का नाजुक संतुलन: पृथ्वी का पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) अत्यंत संवेदनशील है। यदि हमने प्रदूषण, पेड़ों की कटाई और कार्बन उत्सर्जन नहीं रोका, तो पृथ्वी भी मंगल की तरह बंजर और निर्जीव हो सकती है।
2. तकनीक की सीमाएँ: भले ही तकनीक से हम ज़मीन के नीचे कॉलोनियाँ बना लें, परंतु खुली हवा, धूप, नदियों और प्राकृतिक हरियाली के बिना जीवन एक कारागार जैसा हो जाता है। अतः अपनी धरती की रक्षा करना हमारा सर्वोपरि कर्तव्य है।
साथी हाथ बढ़ाना
साहिर लुधियानवी | CBSE पाठ्यक्रम 2026-27 | संपूर्ण प्रश्नोत्तर एवं गीत व्याख्या
📜 मूल गीत
क्रांतिकारी और प्रगतिशील गीतकार साहिर लुधियानवी द्वारा रचित यह अमर गीत (फ़िल्म 'नया दौर' के लिए लिखा गया) एकता, संगठन, श्रम और सहयोग की असीम शक्ति का शंखनाद करता है। कवि आह्वान करते हैं कि यदि देश के मेहनतकश लोग परस्पर हाथ मिलाएँ और संगठित होकर आगे बढ़ें, तो समुद्र भी रास्ता दे देता है और पर्वत भी सिर झुका लेते हैं। एकता में वह शक्ति है कि बूँद-बूँद मिलकर नदी बन जाती है और धूल का छोटा कण रेगिस्तान का रूप ले लेता है। यह गीत स्वतंत्रता के बाद नवनिर्माण और आत्मनिर्भर भारत के निर्माण का पावन संदेश देता है।
गीत की निम्नलिखित पंक्तियों को हम अपने दैनिक जीवन और समाज में साकार होते देखते हैं:
"साथी हाथ बढ़ाना / एक अकेला थक जाएगा, मिलकर बोझ उठाना"
दैनिक जीवन के उदाहरण:
- मकान व सड़क निर्माण: जब मज़दूर मिलकर ईंटें उठाते हैं, पुल बनाते हैं या सड़कें खोदते हैं, तो भारी से भारी काम भी मिल-जुलकर आसानी से पूरा हो जाता है।
- घर के कामकाज: घर में जब परिवार के सभी सदस्य मिलकर त्यौहार या शादी की तैयारियाँ करते हैं, तो किसी एक पर भार नहीं पड़ता।
- विद्यालय में खेल व परियोजना: क्रिकेट या रिले रेस में पूरी टीम का तालमेल ही विजय दिलाता है।
साहिर लुधियानवी ने यह बात मनुष्य के अदम्य साहस, श्रम और एकता की असीम शक्ति को प्रकट करने के लिए कही है:
- जब परिश्रमी मनुष्य संगठित होकर दृढ़ संकल्प के साथ आगे बढ़ता है, तो प्रकृति की सबसे बड़ी बाधाएँ भी उसके सामने घुटने टेक देती हैं।
- इंसान ने अथाह समुद्रों पर विशाल पुल बाँधे, जहाजों से मार्ग बनाए (जैसे रामसेतु या आधुनिक समुद्री मार्ग) और ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों को काटकर सुरंगे व सड़कें (जैसे दशरथ मांझी का पहाड़ तोड़ना या हिमालय की सड़कें) बनाई हैं।
- अतः 'सागर का रास्ता छोड़ना' और 'पर्वत का सिर झुकाना' मानवीय पुरुषार्थ की विजय का प्रतीक है।
फ़ौलादी का अर्थ: 'फ़ौलाद' लोहे के सबसे मजबूत और कड़े रूप (स्टील) को कहते हैं।
सीने और बाहों को फ़ौलादी कहने का कारण:
- फ़ौलादी सीने: मेहनतकश इंसानों के सीने में अदम्य साहस, निडरता और कभी न झुकने वाला दृढ़ आत्मविश्वास होता है। वे किसी भी विपत्ति से नहीं घबराते।
- फ़ौलादी बाहें: उनकी भुजाओं में कठोर श्रम करने की अपार शक्ति होती है। वे अपनी बाहों के बल पर कठोर चट्टानों को काटकर भी नई राहें बना सकते हैं।
अतः यह शब्द मेहनतकश जनता के शारीरिक बल और मानसिक साहस दोनों को महिमामंडित करता है।
हम इस सीख को निम्नलिखित प्रकार से अपने आचरण में उतार सकते हैं:
घर में:
- माता-पिता पर सारे काम का बोझ न डालकर अपने कमरे की सफ़ाई, बिस्तर लगाना और बाज़ार से छोटी-मोटी चीज़ें लाने में हाथ बँटाएँगे।
- खाने के बाद बर्तन रसोई में रखना और छोटे भाई-बहनों की पढ़ाई में मदद करना।
विद्यालय में:
- कक्षा की सफ़ाई, ब्लैकबोर्ड साफ़ करने और नोटिस बोर्ड सजाने में सहपाठियों के साथ मिलकर कार्य करेंगे।
- ग्रुप प्रोजेक्ट में सभी मिलकर अपनी-अपनी ज़िम्मेदारी निभाएँगे और किसी एक छात्र पर भार नहीं आने देंगे।
- हाथ बँटाना (मदद करना): बच्चों को घर के छोटे-मोटे कामों में माता-पिता का हाथ बँटाना चाहिए।
- हाथ-पाँव फूलना (घबरा जाना): अचानक सामने साँप को देखकर बालक के हाथ-पाँव फूल गए।
- हाथ खींचना (सहयोग बंद करना): व्यापार में घाटा होते ही कई स्वार्थी मित्रों ने अपना हाथ खींच लिया।
- हाथ मलना (पछताना): समय बीत जाने के बाद केवल हाथ मलने से कोई लाभ नहीं होता।
1. संगठन की शक्ति: पानी की एक बूँद अकेले तुच्छ होती है, परंतु जब अरबों बूँदें मिलती हैं तो विशाल सागर बन जाती हैं। इसी प्रकार जब देश का प्रत्येक नागरिक एक होकर देशहित में काम करता है, तो देश का भाग्य बदल जाता है।
2. राष्ट्रीय एकता: भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में जब विभिन्न धर्मों, जातियों और क्षेत्रों के लोग एक सूत्र में बँधते हैं, तभी गरीबी, अज्ञानता और भ्रष्टाचार जैसी राष्ट्रीय समस्याओं पर विजय पाई जा सकती है।
ऐसे-ऐसे
विष्णु प्रभाकर | CBSE पाठ्यक्रम 2026-27 | संपूर्ण प्रश्नोत्तर एवं संवाद विश्लेषण
प्रख्यात नाटककार विष्णु प्रभाकर द्वारा रचित यह एक अत्यंत रोचक और हास्य-व्यंग्य प्रधान बाल-एकांकी है। कक्षा तीन में पढ़ने वाला बालक मोहन अचानक पेट पकड़कर कराहने लगता है और कहता है कि पेट में "ऐसे-ऐसे" हो रहा है। परेशान माता-पिता वैद्य जी और डॉक्टर बाबू को बुलाते हैं, जो इसे कब्ज़ या बदहज़मी मानकर दवा की पुड़िया देते हैं। अंत में मोहन के मास्टर जी आते हैं। वे मोहन की नब्ज़ पहचानते हैं और उससे पूछते हैं कि क्या उसने महीने भर की छुट्टियों का स्कूल का होमवर्क (गृहकार्य) पूरा किया है? मोहन मुँह छिपा लेता है। तब भेद खुलता है कि गृहकार्य न करने के डर से ही मोहन ने स्कूल न जाने के लिए "ऐसे-ऐसे" बीमारी का नाटक रचा था! मास्टर जी उसे दो दिन की मोहलत देते हैं और सभी लोग हँस पड़ते हैं।
दर्द की शुरुआत: मोहन दोपहर में अपने पिता के दफ़्तर गया हुआ था। वहाँ उसने केवल एक केला और एक संतरा खाया था। बस स्टैंड पर पहुँचते ही वह अचानक पेट पकड़कर ज़ोर-ज़ोर से कराहने लगा—"पिताजी, मेरे पेट में कुछ ऐसे-ऐसे हो रहा है।"
माता-पिता की परेशानी का कारण:
- मोहन पेट में किसी निश्चित दर्द (जैसे मरोड़, जलन या चुभन) का नाम नहीं बता पा रहा था; वह बस बार-बार एक ही रट लगाए था—"ऐसे-ऐसे होता है।"
- माँ को भय सताने लगा कि कहीं यह कोई नई और भयानक बीमारी (जैसे हैज़ा या अपेंडिक्स) तो नहीं है।
- पिता को चिंता थी कि दफ़्तर में तो वह बिल्कुल भला-चंगा था, अचानक ऐसा क्या हो गया।
'ऐसे-ऐसे' बीमारी का सच: वास्तव में 'ऐसे-ऐसे' कोई शारीरिक बीमारी थी ही नहीं। यह केवल स्कूल के गृहकार्य से बचने के लिए मोहन द्वारा रचा गया एक मनगढ़ंत बहाना था।
वैद्य जी और डॉक्टर का निदान:
- वैद्य जी: उन्होंने मोहन की नाड़ी देखकर कहा कि वात का प्रकोप है और पेट में वायु (गैस) रुक गई है। उन्होंने इसे कब्ज़ बताकर दस्तावर दवा की पुड़िया देने की बात कही।
- डॉक्टर बाबू: उन्होंने जीभ देखकर कहा कि पेट साफ़ नहीं है, बदहज़मी (Indigestion) और कोलिक पेन है। उन्होंने भी एक खुराक दवा पीने पर सब ठीक हो जाने का आश्वासन दिया।
बहाना बनाने का असली कारण:
- स्कूल में पूरे एक महीने की गर्मियाँ की छुट्टियाँ मिली थीं और बहुत सारा गृहकार्य (होमवर्क) दिया गया था।
- मोहन ने छुट्टियों में पूरा महीना केवल खेल-कूद और मौज-मस्ती में गँवा दिया और कोई पढ़ाई नहीं की।
- जब छुट्टियाँ खत्म होने को आईं और केवल एक दिन बचा, तो उसे अहसास हुआ कि उसका पूरा होमवर्क बाकी है।
- अगले दिन स्कूल जाने पर मास्टर जी की डाँट और सज़ा से बचने के लिए उसने पेट में 'ऐसे-ऐसे' होने का झूठा नाटक रचा।
मास्टर जी द्वारा बीमारी का इलाज:
- मास्टर जी मोहन के बाल-स्वभाव को भली-भाँति जानते थे। उन्होंने आते ही समझ लिया कि मोहन को कोई शारीरिक रोग नहीं, बल्कि स्कूल का काम न करने का रोग है।
- उन्होंने हँसकर माता-पिता से कहा कि मोहन की 'ऐसे-ऐसे' की दवा डॉक्टर या वैद्य के पास नहीं, बल्कि उनके पास है।
- उन्होंने मोहन से कहा—"मोहन, तुम्हें स्कूल से दो दिन की छुट्टी (मोहलत) मिलेगी। तुम आराम से अपना सारा काम पूरा कर लेना, फिर तुम्हारा यह 'ऐसे-ऐसे' अपने आप भाग जाएगा!"
यह सुनकर मोहन शर्म से तकिए में मुँह छिपा लेता है और माँ-बाप दंग रह जाते हैं।
बीमारी का बहाना बनाना बिल्कुल अनुचित है:
- झूठ बोलने से माता-पिता व्यर्थ में परेशान होते हैं, उनका धन और समय बर्बाद होता है।
- जब भेद खुलता है, तो परिवार और शिक्षकों के सामने बहुत लज्जित होना पड़ता है और भविष्य में सच्ची बात पर भी कोई विश्वास नहीं करता।
हमारा आचरण: यदि हमारा काम अधूरा रह जाता, तो हम ईमानदारी से मास्टर जी और माता-पिता को सच बताते, अपनी भूल स्वीकार करते और क्षमा माँगकर अतिरिक्त समय लेकर कार्य पूरा करने का वादा करते।
1. सहानुभूतिपूर्ण समझ: भय और दंड से बच्चे झूठ बोलने और बहाने बनाने को विवश होते हैं। यदि शिक्षक और माता-पिता भयमुक्त वातावरण दें, तो बच्चे सच बोलने का साहस जुटा पाते हैं।
2. सुधार का अवसर: मास्टर जी ने समस्या की जड़ (अधूरा गृहकार्य) को समझा और मोहन को सुधार का अवसर देकर एक आदर्श शिक्षक की भूमिका निभाई।
टिकट-अलबम
सुंदर रामास्वामी (अनु॰ पी. एन. सुब्रमण्यम) | CBSE पाठ्यक्रम 2026-27 | संपूर्ण प्रश्नोत्तर
तमिल के ख्यात लेखक सुंदर रामास्वामी द्वारा रचित यह कहानी बाल-सुलभ ईर्ष्या, पश्चाताप और सच्ची मित्रता के अंतर्द्वंद्व को दर्शाती है। राजप्पा ने बड़ी मेहनत और लगन से मधुमक्खी की तरह एक-एक टिकट जोड़कर शानदार टिकट-अलबम बनाया था। परंतु जब सहपाठी नागराजन के सिंगापुर वाले चाचा ने उसे एक सुंदर बना-बनाया अलबम भेजा, तो पूरी कक्षा में नागराजन की वाह-वाही होने लगी और राजप्पा की उपेक्षा हो गई। ईर्ष्या की आग में जलकर राजप्पा ने एक दिन नागराजन के घर जाकर उसका अलबम चुरा लिया। जब नागराजन के पिता द्वारा पुलिस में शिकायत की बात उठी, तो पकड़े जाने के डर से राजप्पा ने उस अलबम को जलती अँगीठी में फेंक दिया। बाद में नागराजन को रोता देख राजप्पा को गहरा आत्मग्लानि हुआ और उसने अपने वर्षों के परिश्रम से बना अपना प्रिय अलबम रोते हुए नागराजन को भेंट कर दिया।
मुख्य पृष्ठ पर लिखा वाक्य: नागराजन के अलबम के पहले पृष्ठ पर उसके चाचा ने लाल स्याही से बड़े मोतियों जैसे अक्षरों में उसका नाम "ए. एम. नागराजन" लिखा था और नीचे यह चेतावनी लिखी थी:
"इस अलबम को चुराने वाला बेशर्म है। ऊपर लिखे नाम को कभी देखा है? यह अलबम मेरा है। जब तक घास हरी है और कमल लाल, सूरज जब तक पूर्व से उगे और पश्चिम में छिपे, उस अनंत काल तक के लिए यह अलबम मेरा रहेगा।"
कक्षा के लड़कों पर असर: इस वाक्य का लड़कों पर इतना गहरा प्रभाव पड़ा कि उन्होंने तुरंत उस पंक्ति को अपने-अपने अलबमों और कॉपियों में नकल करके लिख लिया।
नागराजन के अलबम के हिट (लोकप्रिय) हो जाने के बाद राजप्पा की मानसिक स्थिति बहुत दयनीय हो गई:
- उपेक्षा का दर्द: पहले पूरी कक्षा में राजप्पा के अलबम की धूम थी, लेकिन अब कोई उसके अलबम को देखना भी नहीं चाहता था। लड़के उसके अलबम को 'कूड़ा' कहने लगे थे।
- ईर्ष्या की आग: राजप्पा मन-ही-मन नागराजन से कुढ़ने (जलने) लगा। उसे स्कूल जाना भी अखरने लगा था।
- टिकटों की खोज बंद होना: पहले वह मीलों पैदल चलकर एक-एक टिकट इकट्ठा करता था, पर अब उसने टिकट ढूँढना बंद कर दिया और घर में गुमसुम रहने लगा।
दिल धड़कने का कारण: राजप्पा मूलतः कोई चोर नहीं था, वह एक संकोची और स्वाभिमानी बालक था। वह पहली बार चोरी जैसा अनुचित और अनैतिक कार्य कर रहा था। पकड़े जाने का गहरा भय और अंतरात्मा की धिक्कार के कारण उसका गला सूख रहा था और दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था।
छिपाने का स्थान: उसने अलबम को अपनी कमीज़ के नीचे खोंस लिया और घर भाग आया। अपने कमरे में जाकर उसने अलबम को किताबों की अलमारी के पीछे छिपा दिया।
राजप्पा द्वारा अलबम को अँगीठी में जलाने का कारण:
- सहपाठी अप्पू ने आकर राजप्पा को बताया कि नागराजन के पिता डी.एस.पी. (DSP) के दफ़्तर में काम करते हैं और वे चोरी की रिपोर्ट लिखाने पुलिस में गए हैं। पुलिस कभी भी तलाशी लेने घर आ सकती है।
- तभी अचानक बाहर का दरवाज़ा किसी ने ज़ोर से खटखटाया। राजप्पा ने समझा कि पुलिस तलाशी लेने आ गई है।
- पकड़े जाने के भीषण भय और बदनामी से बचने के लिए उसने तुरंत अलबम को रसोईघर में जलती हुई अँगीठी (चूल्हे) में फेंक दिया, ताकि सबूत ही नष्ट हो जाए। अलबम के सुंदर पन्ने जलते देख उसकी आँखों में आँसू आ गए।
लेखक ने यह तुलना राजप्पा के परिश्रम, एकाग्रता और धैर्य को दर्शाने के लिए की है:
- जिस प्रकार एक मधुमक्खी दूर-दूर तक उड़कर एक-एक फूल से बूँद-बूँद रस (पराग) इकट्ठा करती है और बड़ी मेहनत से छत्ता बनाती है।
- उसी प्रकार राजप्पा ने भी स्कूल छूटने के बाद मीलों पैदल चलकर दोस्तों से कनाडा के बदले फिनलैंड और रूस के टिकट बदल-बदलकर वर्षों की साधना से एक-एक टिकट का अनमोल संग्रह किया था।
- नागराजन को तो बना-बनाया अलबम उपहार में मिला था, जबकि राजप्पा ने उसे मधुमक्खी की तरह अपने पसीने और लगन से संजोया था।
अलबम देने का कारण: जब नागराजन रोता हुआ राजप्पा के घर आया और उसने अपने अलबम के खोने का दुखड़ा सुनाया, तो राजप्पा के मन में आत्मग्लानि और अपराध-बोध की ज्वाला भड़क उठी। उसे लगा कि नागराजन के आंसुओं का ज़िम्मेदार वही है। अपने पाप का प्रायश्चित करने के लिए उसने अपनी जान से प्यारा अलबम नागराजन को सौंप दिया।
सच्चा प्रायश्चित: हाँ, उसका प्रायश्चित 100% सच्चा था। अपने वर्षों की सबसे मूल्यवान संपत्ति को किसी दूसरे को दे देना और फूट-फूटकर रोना यह सिद्ध करता है कि राजप्पा के भीतर का नेक इंसान ईर्ष्या पर विजय पा चुका था।
1. ईर्ष्या का दुष्परिणाम: ईर्ष्या विवेक को नष्ट कर देती है और मनुष्य से ऐसे अनुचित कार्य कराती है जिससे जीवन भर पछताना पड़ता है, जैसा राजप्पा के साथ हुआ।
2. सकारात्मक दृष्टिकोण: हम सहपाठी की वस्तु की खुले मन से प्रशंसा करेंगे और स्वयं के परिश्रम तथा उपलब्धियों पर संतोष रखेंगे। भौतिक वस्तुओं के आधार पर अपनी मित्रता को कभी प्रभावित नहीं होने देंगे।
झाँसी की रानी
सुभद्रा कुमारी चौहान | CBSE पाठ्यक्रम 2026-27 | संपूर्ण प्रश्नोत्तर एवं ऐतिहासिक प्रसंग
📜 प्रसिद्ध काव्यांश
राष्ट्रकवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान द्वारा रचित यह अमर कविता सन् 1857 के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की अमर वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई के अदम्य शौर्य, त्याग और बलिदान का गौरवगान करती है। बचपन में शस्त्रों से खेलने वाली मनु (छबीली) का विवाह झाँसी के राजा गंगाधर राव से हुआ। राजा के निःसंतान देहांत के बाद जब लॉर्ड डलहौज़ी ने हड़प नीति से झाँसी पर कब्ज़ा करना चाहा, तो रानी ने गर्जना की—"मैं अपनी झाँसी नहीं दूँगी।" उन्होंने अंग्रेज़ सेनापतियों (लेफ्टिनेंट वॉकर, ह्यूम, रोज़) को धूल चटाई और अंततः मातृभूमि की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुईं।
घटना का संकेत: इस पंक्ति में झाँसी के राजा गंगाधर राव के असामयिक निधन और रानी लक्ष्मीबाई के असमय विधवा हो जाने की हृदयविदारक घटना की ओर संकेत है।
काली घटा घिरने की बात कहने का कारण:
- राजा की मृत्यु से रानी के सुहाग का सुख छिन गया।
- राजा निःसंतान (लावारिस) मरे थे, जिससे पूरे झाँसी राज्य पर अंग्रेज़ी हुकूमत द्वारा हड़पे जाने का गंभीर संकट छा गया।
- सुख और आनंद के महल में अचानक घोर विपत्ति और शोक का अंधकार छा गया, इसलिए इसे 'काली घटा घेर लाई' कहा गया है।
'बूढ़ा भारत' का आशय: अंग्रेज़ों की सौ वर्षों की पराधीनता, शोषण और अत्याचारों के कारण भारतवासी अपनी शक्ति और आत्मसम्मान भूल चुके थे। देश में जड़ता, हताशा और शिथिलता आ गई थी मानो देश बूढ़ा और अशक्त हो गया हो।
'नई जवानी' का आशय: सन् 1857 के स्वाधीनता संग्राम में रानी लक्ष्मीबाई, नाना साहब और कुँवर सिंह जैसे वीरों के विद्रोह ने भारतवासियों में आज़ादी पाने का नया उत्साह, अदम्य साहस और ऊर्जा का संचार कर दिया। सुप्त राष्ट्र पुनः जीवित और जाग्रत हो उठा।
जीवन की संक्षेप कहानी: रानी लक्ष्मीबाई का बचपन का नाम मनु (छबीली) था। उनका पालन-पोषण कानपुर के बिठूर में पेशवा बाजीराव और नाना साहब के संरक्षण में हुआ। उनका विवाह झाँसी के राजा गंगाधर राव से हुआ। राजा के निधन के बाद डलहौज़ी ने झाँसी हड़पना चाहा, तो रानी रणचंडी बनकर युद्धभूमि में उतरीं। उन्होंने अँग्रेज़ों को कई युद्धों में पराजित किया और अंत में ग्वालियर के पास मातृभूमि की रक्षा करते हुए वीरगति पाई।
बचपन का अंतर:
- रानी का बचपन: उनके खिलौने बरछी, ढाल, कृपाण, कटारी थे। वे तीरंदाज़ी, घुड़सवारी, व्यूह रचना और दुर्ग तोड़ना सीखती थीं।
- हमारा बचपन: हम आधुनिक खिलौनों, वीडियो गेम, क्रिकेट, बैडमिंटन खेलते हैं और सामान्य स्कूली शिक्षा ग्रहण करते हैं। हमारा जीवन रानी के अस्त्र-शस्त्र अभ्यास से बिल्कुल भिन्न और सुरक्षित है।
कविता में उल्लिखित प्रमुख ऐतिहासिक व्यक्तियों की सूची:
भारतीय वीर एवं क्रांतिकारी:
- नाना धुंधूपंत (नाना साहब)
- पेशवा बाजीराव
- छत्रपति वीर शिवाजी
- राजा गंगाधर राव (झाँसी के नरेश)
- अज़ीमुल्ला खाँ, तांतिया टोपे, अहमद शाह मौलवी, ठाकुर कुँवर सिंह
अंग्रेज़ सेनापति व शासक:
- लॉर्ड डलहौज़ी (गवर्नर जनरल)
- लेफ्टिनेंट वॉकर
- जनरल स्मिथ
- ह्यूरोज़ (Hugh Rose)
'मर्दानी' शब्द का अर्थ है—मर्दों (शूरवीर पुरुषों) के समान अपार शौर्य और युद्ध-कौशल दिखाने वाली वीरांगना।
- उस युग में भारतीय स्त्रियाँ केवल घर की चारदीवारी और पर्दा-प्रथा में सीमित रहती थीं।
- रानी लक्ष्मीबाई ने इस रूढ़ि को तोड़कर रणक्षेत्र में पुरुषों के समान कवच पहना, पीठ पर दत्तक पुत्र बाँधकर दोनों हाथों से तलवारें चलाईं और बड़े-बड़े अंग्रेज़ सेनापतियों को युद्धभूमि में परास्त किया।
- उनके इसी अद्वितीय वीरोचित पराक्रम और निर्भीकता को देखकर कवयित्री ने उन्हें आदरपूर्वक 'मर्दानी' की उपाधि दी।
1. आत्मनिर्भरता और साहस: रानी लक्ष्मीबाई ने सिद्ध किया कि नारी अबला नहीं, सबला है। यदि अवसर और शिक्षा मिले, तो नारी सेना का नेतृत्व भी कर सकती है और देश की रक्षा भी।
2. अन्याय का विरोध: उन्होंने शक्तिशाली ब्रिटिश साम्राज्य के सामने कभी सिर नहीं झुकाया। यह आज की बालिकाओं को सिखाता है कि किसी भी अन्याय, अत्याचार या शोषण के विरुद्ध निडर होकर आवाज़ उठानी चाहिए।
जो देखकर भी नहीं देखते
हेलेन केलर | CBSE पाठ्यक्रम 2026-27 | संपूर्ण प्रश्नोत्तर एवं जीवन-दर्शन
विश्वप्रसिद्ध अमेरिकी लेखिका और समाजसेविका हेलेन केलर, जो बचपन में ही गंभीर बीमारी के कारण दृष्टिहीन और बधिर (नेत्रहीन और मूक) हो गई थीं, का यह निबंध मानव चेतना को झकझोरने वाला है। हेलेन केलर बिना आँखों के भी केवल अपनी उँगलियों के संवेदनशील स्पर्श द्वारा भोजपत्र की छाल, चीड़ की पत्तियाँ, कलियों की मखमली पंखुड़ियाँ और बहते झरने के पानी का अलौकिक आनंद लेती हैं। जब उनकी एक प्रिय सहेली जंगल की सैर से लौटने पर कहती है—"कुछ खास तो नहीं देखा", तो लेखिका को गहरा आश्चर्य होता है। वे कहती हैं कि आँखें होने के बावजूद लोग प्रकृति के चमत्कारों को नहीं देखते और ईश्वर की दी गई इस महानतम शक्ति (दृष्टि) का मूल्य नहीं समझते।
हेलेन केलर को ऐसा लगने का कारण निम्नलिखित अनुभव था:
- जब उनकी एक प्रिय मित्र जंगल की एक घंटे की लंबी सैर करके लौटीं, तो हेलेन ने उत्सुकता से पूछा कि उसने जंगल में क्या-क्या देखा?
- सहेली ने बड़ी लापरवाही से उत्तर दिया—"कुछ खास तो नहीं।"
- हेलेन को गहरा सदमा लगा कि घने हरे-भरे जंगल में एक घंटा घूमने के बाद भी किसी को कुछ खास न दिखाई दे, यह कैसे संभव है!
- लेखिका स्वयं दृष्टिहीन होते हुए भी केवल स्पर्श से सैकड़ों अद्भुत चीज़ें पहचान लेती थीं। अतः उन्हें लगा कि आँख वाले लोग प्रकृति के सौंदर्य के प्रति लापरवाह और असंवेदनशील होते हैं।
प्रकृति का जादू: प्रकृति का हर पल बदलता अलौकिक सौंदर्य, वसंत में कलियों का खिलना, फूलों की पंखुड़ियों की मखमली बनावट और ऋतु-चक्र के परिवर्तन को ही 'प्रकृति का जादू' कहा गया है।
हेलेन केलर का अनुभव:
- पेड़ों की छाल छूकर: वे भोजपत्र के पेड़ की चिकनी छाल और चीड़ की खुरदरी छाल को स्पर्श से पहचानती थीं।
- फूलों की पंखुड़ियाँ: वसंत में जब वे टहनी पर हाथ रखती थीं, तो नई खिलती कलियों और फूलों की घुमावदार बनावट का स्पर्श उन्हें असीम आनंद देता था।
- पक्षियों का संगीत: किसी पेड़ की शाखा पर हाथ रखते ही गाती हुई चिड़िया के कंठ का मधुर कंपन उनकी उँगलियों में उतर आता था।
मौका: जब हेलेन की सहेली जंगल की लंबी सैर करके वापस आई थी और हेलेन ने उससे पूछा था कि उसने वहाँ क्या देखा, तब उसने यह उत्तर दिया।
आश्चर्य न होने का कारण: हेलेन केलर को अब ऐसे उत्तरों की आदत पड़ चुकी थी। वे जान चुकी थीं कि आँख वाले लोग अक्सर उन्हीं चीज़ों की कद्र नहीं करते जो उनके सामने होती हैं। वे उस चीज़ की लालसा में रहते हैं जो उनके पास नहीं है, जबकि जो उपहार (दृष्टि) ईश्वर ने उन्हें दिया है, उसकी कद्र करना वे भूल जाते हैं।
दृष्टि की शक्ति का मूल्यांकन: हेलेन केलर दृष्टि (आँखों की रोशनी) को ईश्वर का सबसे बड़ा वरदान और नियामत मानती हैं।
उनका पावन संदेश:
- मनुष्यों को अपनी आँखों का प्रयोग केवल भौतिक आवश्यकताओं के लिए ही नहीं, बल्कि प्रकृति और जीवन के रंगीन सौंदर्य को महसूस करने के लिए करना चाहिए।
- मनुष्य अपनी कमियों का रोना रोने के बजाय जो कुछ उसके पास है, उसका कृतज्ञतापूर्वक सदुपयोग करे।
- दृष्टि के इस वरदान से जीवन को इंद्रधनुषी खुशियों और उल्लास से भरा जा सकता है।
1. समानता और मित्रता: उन्हें दया की दृष्टि से देखने के बजाय एक सामान्य और सम्मानित मित्र की तरह व्यवहार करेंगे।
2. शैक्षणिक सहयोग: पाठ्यपुस्तकों को पढ़कर सुनाएँगे, ऑडियो रिकॉर्डिंग साझा करेंगे और ब्रेल लिपि या स्क्रीन रीडर सॉफ्टवेयर के उपयोग में सहयोग करेंगे।
3. सुरक्षा एवं मार्गदर्शन: सीढ़ियों पर, प्रयोगशाला में और सड़क पार करते समय सजग होकर उनका मार्गदर्शन करेंगे।
संसार पुस्तक है
पंडित जवाहरलाल नेहरू (अनु॰ मुंशी प्रेमचंद) | CBSE पाठ्यक्रम 2026-27 | संपूर्ण प्रश्नोत्तर
भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने जब वे इलाहाबाद की नैनी जेल में थे, अपनी दस वर्षीय पुत्री इंदिरा (इंदिरा गांधी), जो मसूरी में थीं, को पत्रों की एक ऐतिहासिक शृंखला लिखी थी (जो बाद में 'पिता के पत्र पुत्री के नाम' नाम से प्रकाशित हुई)। मुंशी प्रेमचंद ने इसका सुंदर हिंदी अनुवाद किया। इस पत्र में नेहरू जी बताते हैं कि यह पूरी प्रकृति—पत्थर, पहाड़, नदियाँ, समुद्र, सितारे, जीवाश्म—एक विशाल खुली पुस्तक के समान है। जिस प्रकार किसी भाषा को जानने के लिए अक्षर सीखने पड़ते हैं, उसी प्रकार पृथ्वी का लाखों वर्ष पुराना इतिहास जानने के लिए हमें 'प्रकृति के अक्षर' पढ़ने आने चाहिए। एक गोल, चिकना रोड़ा भी अपनी लंबी यात्रा की कहानी सुनाता है कि कैसे वह पहाड़ से टूटकर, दरिया में लुढ़ककर घिसा और यदि दरिया उसे और बहा ले जाता, तो वह बालू का कण बन जाता।
पंडित नेहरू ने चट्टानों, नुकीले पत्थरों, पहाड़ों, नदियों, समुद्र, सितारों, जंगलों और जानवरों की पुरानी हड्डियों (जीवाश्मों) को 'प्रकृति के अक्षर' कहा है।
उदाहरण: जिस प्रकार हिंदी, अंग्रेज़ी या उर्दू भाषा को सीखने के लिए हमें पहले 'अ, आ, क, ख' या 'A, B, C' जैसे अक्षर सीखने पड़ते हैं, उसी प्रकार पृथ्वी का लाखों-करोड़ों वर्ष पुराना इतिहास जानने के लिए केवल मनुष्यों की लिखी किताबें काफी नहीं हैं, बल्कि हमें पत्थरों और पहाड़ों के रूप, रंग, परतों और कटाव रूपी 'अक्षरों' को पढ़ना सीखना होगा।
धरती की स्थिति: लाखों-करोड़ों वर्ष पूर्व हमारी धरती अत्यंत गर्म थी — सूर्य से अलग हुआ एक धधकता हुआ आग का गोला।
जीवन न होने का कारण: इतनी भीषण और असहनीय गर्मी के कारण उस समय धरती पर किसी भी जानदार (जीवधारी) चीज़ का टिकना या जन्म लेना असंभव था। न कोई मनुष्य था, न पशु-पक्षी और न ही कोई वनस्पति। करोड़ों वर्षों के बाद जब पृथ्वी धीरे-धीरे ठंडी हुई और बादलों से मूसलाधार बारिश होकर समुद्र बने, तब धीरे-धीरे सूक्ष्म जीवों और वनस्पतियों की उत्पत्ति संभव हुई।
उस काल में जब मनुष्य नहीं था और किताबें नहीं लिखी जाती थीं, तब दुनिया का पुराना हाल जानने के लिए प्रकृति की निम्नलिखित वस्तुएँ हमारी सबसे बड़ी पुस्तक बनती हैं:
- चट्टानें और पहाड़: जिनकी परतें हमें धरती की आयु और हलचलों का पता देती हैं।
- समुद्र और नदियाँ: जो प्राचीन जलवायु और जल-प्रवाह के इतिहास को दर्शाते हैं।
- सितारे और ग्रह: जो ब्रह्मांड की उत्पत्ति का राज़ खोलते हैं।
- प्राचीन जानवरों की हड्डियाँ (जीवाश्म): जिनसे डायनासोर और विलुप्त जीवों का पता चलता है।
- पत्थरों के औज़ार व गुफ़ाएँ: जिनसे आदिमानव के रहन-सहन की जानकारी मिलती है।
नदी किनारे पड़ा गोल, चिकना और चमकीला रोड़ा अपनी जीवन-यात्रा की कहानी इस प्रकार सुनाता है:
- पहाड़ का खुरदरा टुकड़ा: पहले वह किसी ऊँचे पहाड़ की चट्टान का एक नुकीला, खुरदरा और कोनों वाला भारी टुकड़ा था।
- नाले में बहाव: बारिश के पानी ने उसे बहाकर नीचे छोटी पहाड़ी घाटी और नाले में पहुँचा दिया।
- नदी के पेंदे में लुढ़कना: पहाड़ी नाले ने उसे धकेलकर बड़ी नदी (दरिया) में गिरा दिया। नदी के तलहटी में बहते हुए वह लगातार लुढ़कता रहा।
- घिसकर चिकना होना: लुढ़कने के कारण उसके सारे नुकीले कोने घिस गए, खुरदरापन मिट गया और वह एक सुंदर, चिकना और चमकदार गोल रोड़ा बन गया।
यदि नदी उस गोल रोड़े को अपने किनारे पर न छोड़ती और उसे पानी के तेज़ बहाव में आगे ले जाती, तो निम्नलिखित परिणाम होता:
- वह नदी के पेंदे में और आगे लुढ़कता रहता तथा पानी व पत्थरों की रगड़ से घिसते-घिसते और छोटा होता चला जाता।
- अंततः वह घिसते-घिसते बारीक रेत (बालू) का एक नन्हा कण बन जाता।
- वह रेत बहकर समुद्र के किनारे पहुँच जाती और वहाँ समुद्र तट (Beach) पर अपने जैसे करोड़ों कणों से मिलकर एक सुंदर रेतीला किनारा बना लेती।
- उस सुंदर रेत पर नन्हे-मुन्ने बच्चे खेलते और सुंदर-सुंदर रेत के घरौंदे (महल) बनाते।
नेहरू जी ने दुनिया की शुरुआत के विषय में यह संकेत दिया है कि:
- करोड़ों वर्ष पहले धरती सूर्य से टूटकर अलग हुई थी और उस पर भयानक ताप था।
- लाखों वर्षों तक वर्षा होने से पृथ्वी ठंडी हुई और सागरों का निर्माण हुआ।
- शुरुआत में पानी के भीतर सूक्ष्म और सरल जीव उत्पन्न हुए। फिर धीरे-धीरे रेंगने वाले जीव, जलचर, थलचर और बड़े-बड़े जानवर (जैसे डायनासोर) विकसित हुए।
- जानवरों के लाखों साल बाद धरती पर आदिमानव का प्रादुर्भाव हुआ। इस प्रकार दुनिया किसी एक दिन में जादू से नहीं बनी, बल्कि करोड़ों वर्षों के क्रमिक विकास (Evolution) का परिणाम है।
1. प्रत्यक्ष अवलोकन से गहरी समझ: जब विद्यार्थी नदियों, चट्टानों, पौधों और तारों को स्वयं देखते हैं और उनके पीछे के कारणों को खोजते हैं, तो उनका ज्ञान स्थायी और व्यावहारिक बनता है।
2. वैज्ञानिक जिज्ञासा: यह रटने की आदत को समाप्त कर 'क्यों और कैसे' की वैज्ञानिक सोच को जन्म देता है, जो राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) का मूल ध्येय है।
मैं सबसे छोटी होऊँ
सुमित्रानंदन पंत | CBSE पाठ्यक्रम 2026-27 | संपूर्ण प्रश्नोत्तर एवं काव्यांश व्याख्या
📜 मूल कविता
प्रकृति के सुकुमार कवि सुमित्रानंदन पंत द्वारा रचित यह कविता मातृ-स्नेह और वात्सल्य की अनुपम अभिव्यक्ति है। एक नन्हीं बालिका अपनी माँ की सबसे छोटी संतान बनी रहना चाहती है। वह सोचती है कि बड़े हो जाने पर माँ बच्चे को 'छलती' है—अर्थात् बड़ा होते ही माँ हाथ पकड़कर साथ घूमना छोड़ देती है, अपने हाथों से नहलाना-खिलाना बंद कर देती है और परियों की कहानियाँ सुनाना बंद कर देती है। अतः बालिका कभी बड़ा नहीं होना चाहती; वह सदैव माँ के आँचल की छाँव में निर्भय और निष्काम होकर माँ के अमूल्य स्नेह को अनंत काल तक पाना चाहती है।
कविता में नन्हीं बालिका द्वारा सबसे छोटे होने की कामना निम्नलिखित कारणों से की गई है:
- माँ का निरंतर सान्निध्य: परिवार में जो बच्चा सबसे छोटा होता है, माँ का सबसे अधिक लाड़-प्यार, ध्यान और समय उसी को मिलता है।
- गोदी में सोने का सुख: वह हमेशा माँ की गोदी में सो सकती है और उसका आँचल पकड़-पकड़कर उसके साथ घूम सकती है।
- स्नेह खोने का भय नहीं: बड़े होने पर माँ की व्यस्तता और बच्चे की आत्मनिर्भरता के कारण वह निकटता नहीं रह जाती। बालिका माँ के उस निस्वार्थ और अगाध प्रेम से कभी वंचित नहीं होना चाहती।
बच्ची अपनी बाल-सुलभ दृष्टि से माँ पर 'छलने' (धोखा देने) का आरोप इसलिए लगाती है क्योंकि:
- माँ पहले तो प्यार-दुलार से बच्चे को पाल-पोसकर बड़ा कर देती है, परंतु बड़ा होते ही वह पहले जैसा लाड़-प्यार करना बंद कर देती है।
- बड़ा होने पर माँ बच्चे का हाथ पकड़कर दिन-रात उसके साथ नहीं फिरती।
- वह अपने हाथों से खाना नहीं खिलाती, मुँह नहीं धोती और न ही खिलौने देकर परियों की मीठी कहानियाँ सुनाती है।
बालिका को लगता है कि बड़ा बनाकर माँ ने उसके साथ छल किया है और उसे अपने दुलार से दूर कर दिया है।
आशय: जब बच्चा छोटा और नन्हा होता है, तो माँ हर क्षण एक साए की तरह उसकी उँगली पकड़कर उसके साथ-साथ चलती है ताकि वह कहीं गिर न जाए या उसे कोई चोट न लग जाए। परंतु जैसे ही बच्चा बड़ा हो जाता है, माँ उसे अपने काम खुद करने के लिए छोड़ देती है और दिन-रात उसका हाथ पकड़कर उसके पीछे नहीं घूमती।
बालिका माँ के इस सुरक्षात्मक घेरे और निरंतर सान्निध्य से अलग होने को अपनी हानि मानती है और इसी विरह-वेदना को इन पंक्तियों में व्यक्त करती है।
बच्ची के कहने का कारण: बच्ची इसलिए बड़ा नहीं होना चाहती क्योंकि बड़े होने पर माँ का अनन्य प्यार, गोदी का सुख, खिलौने और परियों की कहानियाँ छिन जाती हैं। वह माँ के आँचल की छाँव में बिना किसी डर (निर्भय) के निश्चिंत जीवन जीना चाहती है।
हमारा दृष्टिकोण: बचपन का निश्चिंत और ममतामयी समय सबको प्रिय होता है, परंतु हमेशा छोटे बने रहना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है। बड़ा होकर ही हम नए ज्ञान, ज़िम्मेदारियों, समाज-सेवा और अपने माता-पिता के बुढ़ापे का सहारा बनने की क्षमता प्राप्त करते हैं। अतः समय के साथ परिपक्व और बड़ा होना जीवन का प्राकृतिक और आवश्यक नियम है।
1. अतुलनीय मातृ-ऋण: माँ ने जिस निःस्वार्थ भाव से हमारी उँगली पकड़कर हमें पाल-पोसकर बड़ा किया, उस ममता का ऋण हम कभी नहीं चुका सकते।
2. वृद्धावस्था में संबल: जैसे बचपन में माँ हमारा हाथ थामे रहती थी, वैसे ही माता-पिता की वृद्धावस्था में उनका हाथ पकड़कर उनका संबल बनना और उन्हें सम्मान तथा समय देना प्रत्येक संतान का परम धर्म है।
लोकगीत
भगवतशरण उपाध्याय | CBSE पाठ्यक्रम 2026-27 | संपूर्ण प्रश्नोत्तर एवं लोक-संस्कृति
विशिष्ट इतिहासकार और निबंधकार भगवतशरण उपाध्याय ने इस सांस्कृतिक निबंध में भारत के लोकगीतों की जीवंत परंपरा का गौरवपूर्ण विवेचन किया है। लोकगीत अपनी लोच, ताज़गी और लोकप्रियता में शास्त्रीय संगीत से भिन्न होते हैं। इन्हें सीखने के लिए किसी कठोर शास्त्रीय साधना की आवश्यकता नहीं होती; ये सीधे जनसाधारण के हृदय, खेतों और त्योहारों से फूटते हैं। ढोलक, झाँझ, करताल और बाँसुरी की धुन पर गाए जाने वाले ये गीत विशेषकर स्त्रियों के कंठ में अत्यंत मधुर बन जाते हैं। पाठ में भोजपुरी के 'बिदेसिया', बुंदेलखंड के 'आल्हा', ब्रज की 'होली' व 'रसिया', बंगाल के 'बाउल' व 'भतियाली', पंजाब की 'माहिया' और पहाड़ी लोकगीतों की समृद्ध विरासत का सुंदर दिग्दर्शन कराया गया है।
निबंध में लोकगीतों के निम्नलिखित प्रमुख पक्षों का विस्तृत विवेचन किया गया है:
- लोकगीतों का स्वरूप व साधन: ये जनता के सीधे संगीत हैं। इनके लिए कठोर साधना के बजाय साधारण वाद्ययंत्र (ढोलक, करताल, झाँझ, थाली) पर्याप्त होते हैं।
- शास्त्रीय संगीत से अंतर: शास्त्रीय संगीत नियमों में बँधा होता है, जबकि लोकगीत अपनी लोच (Liveliness), ताज़गी और सहजता से तुरंत मन मोह लेते हैं।
- स्त्रियों की विशेष भूमिका: अधिकांश लोकगीत स्त्रियों द्वारा रचे और गाए जाते हैं। त्योहारों और विवाह के अवसरों पर दल बाँधकर गाने की परंपरा है।
- क्षेत्रीय विविधता: भारत के विभिन्न अंचलों के विशिष्ट लोकगीतों (जैसे बुंदेलखंड का आल्हा, बिहार का बिदेसिया, पंजाब का माहिया, राजस्थान की ढोला-मारू) की चर्चा।
शास्त्रीय संगीत और लोकगीत में निम्नलिखित प्रमुख अंतर पाए जाते हैं:
| आधार | शास्त्रीय संगीत | लोकगीत |
|---|---|---|
| साधना | वर्षों के कठोर रियाज़ और गुरु की आवश्यकता। | किसी विशेष साधना की आवश्यकता नहीं; सहज स्वाभाविक। |
| नियम | राग, ताल, लय और व्याकरण के कड़े नियमों में बँधा। | नियमों से मुक्त, लोचदार और स्वतंत्र। |
| भाषा व प्रसार | विद्वानों और विशेषज्ञों तक सीमित। | स्थानीय बोलियों में जनसाधारण द्वारा गाया जाने वाला। |
स्त्रियों के प्रमुख लोकगीत और उनके गायन के अवसर निम्नलिखित हैं:
- सोहर व बधाई: बच्चे के जन्म (जन्मोत्सव) के अवसर पर।
- विवाह के गीत: बन्ना-बन्नी, मटकोड़, भात, हल्दी, द्वारपूजा और विदाई के भावुक गीत।
- गाली (सीठने): विवाह में समधियों और बरातियों को हँसी-मज़ाक में प्रेमपूर्वक गाली के रूप में गाए जाने वाले गीत।
- कजरी और झूला: वर्षा ऋतु में सावन के झूले झूलते समय।
- होली और रसिया: फाल्गुन मास में होली के उल्लास में।
- रोपाई व कटाई के गीत: खेतों में धान की रोपाई और फसलों की कटाई के समय।
1. बिदेसिया: यह बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में भोजपुरी बोली का अत्यंत लोकप्रिय लोकगीत व लोकनाट्य है (जिसके जनक भिखारी ठाकुर थे)। इसमें परदेस गए पति के विरह में तड़पती ग्रामीण स्त्री की करुण व्यथा का मार्मिक चित्रण होता है। इसे सुनकर श्रोताओं की आँखों में आँसू छलक आते हैं।
2. आल्हा: यह बुंदेलखंड (उत्तर प्रदेश व मध्य प्रदेश) का प्रसिद्ध वीर-रस प्रधान लोकगीत है, जिसे जगनिक के 'आल्हाखंड' के आधार पर गाया जाता है। इसमें आल्हा और ऊदल नाम के दो वीर सामंतों की 52 लड़ाइयों की वीरगाथा ढोलक की तीव्र थाप पर गाई जाती है। इसे सुनकर युवाओं की भुजाएँ फड़कने लगती हैं और जोश भर जाता है।
1. सांस्कृतिक उत्सवों में समावेशन: विद्यालयों में वार्षिक उत्सवों और बाल-सभाओं में आधुनिक गानों के स्थान पर क्षेत्रीय लोकगीतों और लोकनृत्यों की प्रतियोगिताएँ आयोजित की जाएँ।
2. डिजिटल प्रलेखन: ग्रामीण बुजुर्गों और लोक-गायकों के पारंपरिक गीतों को यूट्यूब, पॉडकास्ट और सोशल मीडिया पर रिकॉर्ड करके संरक्षित किया जाए।
नौकर
अनु बंद्योपाध्याय | CBSE पाठ्यक्रम 2026-27 | संपूर्ण प्रश्नोत्तर एवं गांधी-दर्शन
गांधी साहित्य की प्रसिद्ध लेखिका अनु बंद्योपाध्याय द्वारा रचित यह प्रेरक संस्मरण राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के जीवन के उन प्रसंगों को उजागर करता है, जहाँ वे शारीरिक श्रम (श्रम की गरिमा / Dignity of Labour) को पूजा मानते थे। साबरमती आश्रम और दक्षिण अफ्रीका के टॉलस्टॉय फार्म में गांधी जी चक्की पर गेहूँ पीसना, सब्जियाँ छीलना, दाल-चावल बीनना, यहाँ तक कि शौचालय (पाख़ाना) साफ़ करने जैसे सभी काम स्वयं अपने हाथों से करते थे। वे किसी भी काम को छोटा या हीन नहीं मानते थे। आश्रम में आने वाले बड़े-बड़े बैरिस्टरों और नेताओं को भी वे श्रम करने के लिए प्रेरित करते थे। गांधी जी नौकरों को कभी नौकर नहीं, बल्कि अपने परिवार का भाई या बहन मानते थे।
पाठ में वर्णित तीन प्रमुख प्रसंग निम्नलिखित हैं:
- गेहूँ पीसना व बीनना: आश्रम में गांधी जी रोज़ सुबह चक्की पर बैठकर अपने हाथों से गेहूँ पीसते थे। वे कई मन गेहूँ पीसने में घंटों मेहनत करते थे और कंकड़-पत्थर भी खुद बीनते थे।
- रसोईघर में सब्ज़ियाँ काटना: वे आश्रम के भोजनालय में बैठकर सब्ज़ियाँ छीलते और काटते थे। वे स्वच्छता का इतना ध्यान रखते थे कि बर्तनों की कालिख को भी तब तक माँजते थे जब तक वे चाँदी की तरह न चमकने लगें।
- शौचालय साफ़ करना: दक्षिण अफ्रीका में वे मेहमानों और बीमार साथियों के पाख़ाने (शौचालय) के डिब्बे अपने हाथों से उठाकर साफ़ करते थे और किसी पर निर्भर नहीं रहते थे।
गांधी जी का आचरण:
- लंदन में पढ़ रहे भारतीय छात्रों ने गांधी जी के सम्मान में एक शाकाहारी भोज (पार्टी) का आयोजन किया था।
- गांधी जी निर्धारित समय से दो-तीन घंटे पहले ही चुपचाप रसोईघर में पहुँच गए। उन्होंने किसी को बताए बिना एक साधारण नौकर की भाँति तश्तरियाँ धोना, सब्ज़ियाँ साफ़ करना और मसाले पीसना शुरू कर दिया।
- जब शाम को छात्र अपने मुख्य अतिथि (गांधी जी) को ढूँढने लगे, तो उन्होंने देखा कि जिस दुबले-पतले व्यक्ति को वे रसोईया समझ रहे थे, वे स्वयं आदरणीय महात्मा गांधी थे! छात्र लज्जित और विस्मित रह गए।
दूध छुड़वाने की युक्ति: दक्षिण अफ्रीका में गांधी जी के मित्र पोलक की पत्नी का बच्चा रात-रात भर माँ का दूध पीने के लिए रोता था, जिससे श्रीमती पोलक बहुत कमज़ोर हो गई थीं। गांधी जी ने ज़िम्मेदारी ली। वे दिन भर के भारी काम के बाद रात को बच्चे को अपने पास सुलाते थे। जब बच्चा रोता, तो वे उसे प्यार से थपकी देकर पानी पिलाते और बहलाते थे। पंद्रह दिनों के निरंतर धैर्य से बच्चे ने माँ का दूध छोड़ दिया।
स्वभाव की विशेषताएँ: इससे गांधी जी के असीम धैर्य, सेवा-भाव, मातृत्व जैसी कोमलता और दूसरों के कष्ट हरने की तत्परता का पता चलता है।
गांधी जी अपने राजनीतिक गुरु गोपाल कृष्ण गोखले का अत्यधिक आदर करते थे:
- जब गोखले दक्षिण अफ्रीका के प्रवास पर आए, तो गांधी जी ने उनकी व्यक्तिगत सेवा का भार स्वयं उठाया।
- वे गोखले जी के बिस्तर बिछाने, उनके पाँव दबाने और उनके कोट पर प्रेस (इस्त्री) करने का काम खुद अपने हाथों से करते थे।
- जब गोखले जी संकोच करते, तो गांधी जी विनम्रता से कहते कि बड़ों की सेवा करना उनका परम सौभाग्य और कर्तव्य है।
गांधी जी की मान्यता: गांधी जी नौकरों को वेतनभोगी सेवक नहीं, बल्कि अपने परिवार का सगा भाई या बहन मानते थे। वे कहते थे कि पैसों के बल पर किसी से सेवा लेना और उसे हीन समझना पाप है।
जीवन-दर्शन:
- श्रम की गरिमा (Dignity of Labour): कोई भी कार्य छोटा या बड़ा नहीं होता; हर श्रम आदरणीय है।
- समानता और भ्रातृत्व: अमीर और गरीब में कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए; सभी मनुष्य ईश्वर की संतान हैं।
- स्वावलंबन: अपने व्यक्तिगत कार्यों के लिए दूसरों पर निर्भर न रहकर स्वावलंबी बनना।
1. स्वच्छता का संस्कार: गांधी जी ने कहा था कि 'स्वच्छता स्वतंत्रता से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है।' वे स्वयं झाड़ू लगाते और शौचालय साफ़ करते थे। स्वच्छ भारत अभियान इसी गांधीवादी विचार पर आधारित है।
2. श्रमदान से समानता: जब विद्यालय में सभी विद्यार्थी मिलकर अपनी कक्षा और मैदान की सफ़ाई करते हैं, तो जाति, वर्ग और धन का अहंकार टूटता है और श्रम के प्रति सम्मान जगता है।
वन के मार्ग में
गोस्वामी तुलसीदास | CBSE पाठ्यक्रम 2026-27 | संपूर्ण प्रश्नोत्तर एवं सवैया व्याख्या
📜 मूल सवैये (कवितावली से)
महाकवि गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित ये दो सवैये 'कवितावली' से लिए गए हैं, जिनमें वनगमन के समय श्री राम और सीता जी के दांपत्य प्रेम और मानवीय संवेदना का अत्यंत मार्मिक और सजीव वर्णन है। महलों में सुख से पली सुकुमारी सीता जी जब अयोध्या से दो कदम भी वन के पथ पर चलती हैं, तो उनके माथे पर पसीने की बूँदें झलक आती हैं और उनके कोमल ओंठ सूख जाते हैं। वे व्याकुल होकर पूछती हैं कि 'पर्णकुटी (पत्तों की कुटिया) कहाँ बनाओगे?' पत्नी की यह दशा देखकर श्री राम की आँखों से आँसू बहने लगते हैं। दूसरे सवैये में लक्ष्मण जब पानी लेने जाते हैं, तो सीता जी की थकान दूर करने के लिए श्री राम जानबूझकर पेड़ की छाँव में देर तक बैठकर उनके पैरों के काँटे निकालते हैं ताकि सीता जी को विश्राम मिल सके।
अयोध्या नगर से निकलकर वन के पथ पर धैर्यपूर्वक दो ही कदम (डग) चलने के बाद सुकुमारी सीता जी की निम्नलिखित दशा हुई:
- माथे पर पसीना: अत्यधिक थकान और गर्मी के कारण उनके सुंदर ललाट (माथे) पर पसीने की नन्हीं-नन्हीं बूँदें चमकने लगीं।
- ओंठों का सूखना: प्यास और थकावट से उनके दोनों कोमल और रसीले लाल ओंठ (मधुराधर) सूख गए।
- व्याकुलता से प्रश्न पूछना: वे बुरी तरह थक गईं और उन्होंने अधीर होकर श्री राम से पूछा—"स्वामी! अभी और कितनी दूर चलना है? और आप पत्तों की कुटिया (पर्णकुटी) कहाँ बनाएँगे?"
श्री राम की दशा: अपनी प्राणप्रिया जानकी की ऐसी व्याकुलता, पसीने से भीगा चेहरा और थके हुए सूखे ओंठ देखकर मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के सुंदर नेत्रों से आँसुओं की अविरल धारा बहने लगी (अँखियाँ अति चारु चलीं जल च्वै)।
कारण: राजा जनक की लाडली राजकुमारी और अयोध्या के महलों की पटरानी सीता जी ने कभी ज़मीन पर नंगे पाँव कदम भी नहीं रखा था। वे केवल अपने पति के साथ धर्म निभाने के लिए वन के काँटों भरे पथ पर कष्ट सह रही थीं। सीता जी का यह भीषण कष्ट देखकर श्री राम का हृदय करुणा और पत्नी-प्रेम से भर उठा।
भाव: इस पंक्ति में श्री राम के अगाध दांपत्य प्रेम, परदुखकातरता (सहानुभूति) और संवेदनशीलता का अनुपम चित्रण है।
राम द्वारा देर तक काँटे निकालने का कारण:
- जब लक्ष्मण पानी लेने गए थे, तब श्री राम समझ गए कि सीता जी अत्यधिक थक चुकी हैं और उन्हें विश्राम की सख्त ज़रूरत है।
- सीता जी संकोचवश विश्राम करने के लिए नहीं कह रही थीं, इसलिए श्री राम ने एक पेड़ की छाँव में बैठकर जानबूझकर बहुत देर तक (बिलंब लौं) सीता जी के पैरों में चुभे काँटे धीरे-धीरे निकालने का यत्न किया।
- उन्होंने ऐसा इसलिए किया ताकि काँटे निकालने के बहाने सीता जी को पेड़ की छाँव में अधिक समय तक आराम मिल सके। पति का यह मूक प्रेम देखकर सीता जी का शरीर रोमांचित हो उठा।
सवैयों में अंतर:
- प्रथम सवैया: इसमें सीता जी की शारीरिक सुकुमारता, थकान, प्यास और श्री राम की आँखों से आँसू बहने (करुणा) का मार्मिक चित्रण है।
- द्वितीय सवैया: इसमें सीता जी द्वारा लक्ष्मण की प्रतीक्षा करने और श्री राम द्वारा सीता जी को विश्राम देने के लिए देर तक काँटे निकालने तथा परस्पर आत्मीय प्रेम (शृंगार) का वर्णन है।
भाषा एवं रस:
- भाषा: मधुर, प्रवाहमयी और लयात्मक ब्रजभाषा। सवैया छंद का शास्त्रीय प्रयोग है।
- रस: प्रथम सवैये में करुण रस और द्वितीय सवैये में संयोग शृंगार रस की सुंदर छटा है।
1. सहानुभूति और संवेदनशीलता: जब परिवार पर कोई विपदा आए, तो एक-दूसरे को दोष देने के बजाय परस्पर पीड़ा को समझना चाहिए। श्री राम ने सीता जी की थकान को बिना कहे समझ लिया।
2. सहयोग और धैर्य: कठिन समय में धैर्य बनाए रखना और अपने जीवनसाथी या परिवार के सदस्यों की छोटी-छोटी सुख-सुविधाओं का ध्यान रखना ही परिवार को अटूट बनाता है।
साँस-साँस में बाँस
एलेक्स एम॰ जॉर्ज (अनु॰ कमलेश चन्द्रा) | CBSE पाठ्यक्रम 2026-27 | संपूर्ण प्रश्नोत्तर
पूर्वोत्तर भारत (विशेष रूप से नगालैंड, असम, मणिपुर, मिजोरम) की जनजातीय संस्कृति और हस्तशिल्प पर आधारित यह ज्ञानवर्धक निबंध बाँस के साथ मनुष्य के अभिन्न संबंध को दर्शाता है। नगालैंड में एक प्रसिद्ध लोककथा है कि जब एक जादूगर चंगकी थनबा मरा, तो उसने कहा था कि मेरी कब्र पर छह दिन बाद बाँस का एक अद्भुत पौधा उगेगा। सचमुच बाँस मनुष्य के जन्म (पालने) से लेकर मृत्यु (टिकठी) तक हर साँस में जुड़ा है। बाँस से टोकरियाँ, चटाइयाँ, बर्तन, मछली पकड़ने के जाल (जकाई), फर्नीचर, पुल और खिलौने बनाए जाते हैं। बाँस की बुनाई मानव सभ्यता के भोजन संग्रह के दौर से शुरू हुई थी। यह निबंध पर्यावरण-अनुकूल (Eco-friendly) शिल्प और जनजातीय स्वावलंबन का सुंदर दस्तावेज़ है।
शीर्षक का औचित्य: पूर्वोत्तर भारत (जैसे नगालैंड, असम) के जनजीवन में बाँस इतना गहराई से रचा-बसा है कि जन्म से लेकर मृत्यु तक हर पग पर बाँस की उपस्थिति अनिवार्य है। मनुष्य का हर दिन और हर आवश्यकता बाँस से जुड़ी है, इसलिए इसे 'साँस-साँस में बाँस' कहा गया है।
बाँस का जीवन में महत्त्व:
- जीवन का आरंभ व अंत: नवजात शिशु के लिए झूला (खटोला/पालना) बाँस का बनता है और अंत समय में शव ले जाने की टिकठी भी बाँस की होती है।
- दैनिक आवश्यकताएँ: घर की दीवारें, छत, खंभे, चटाइयाँ, टोकरियाँ, अनाज रखने के बर्तन, पंखे और छाते बाँस से बनते हैं।
- आजीविका व भोजन: मछली पकड़ने का जाल (जकाई) और बाँस के नए कोमल अंकुरों की स्वादिष्ट सब्ज़ी व अचार बनाया जाता है।
बाँस की बुनाई का इतिहास उस सुदूर अतीत से जुड़ा है जब मनुष्य ने भोजन इकट्ठा (Food Gathering) करना शुरू किया था:
- भोजन संचय की आवश्यकता: जंगलों में फल, कंद-मूल, बेर और अनाज इकट्ठा करने के लिए मनुष्य को किसी बर्तन या डलिया की आवश्यकता महसूस हुई होगी।
- पक्षियों के घोंसले से प्रेरणा: संभवतः आदिमानव ने बया या अन्य पक्षियों के बुने हुए सुंदर घोंसलों को देखकर उनसे प्रेरणा ली होगी और उसी प्रकार बाँस की खपच्चियों को गूँथकर पहली डलिया या टोकरी बनाई होगी।
- यह कला पीढ़ी-दर-पीढ़ी विकसित होकर आज के परिष्कृत हस्तशिल्प में बदल गई है।
बाँस का चुनाव: टोकरियाँ और बारीक कलाकृतियाँ बनाने के लिए एक से तीन वर्ष की आयु वाले बाँस ही काटे जाते हैं।
कारण:
- लचीलापन: एक से तीन साल का युवा बाँस कोमल और लचीला होता है। इसे आसानी से मोड़ा जा सकता है और इसकी महीन खपच्चियाँ छीली जा सकती हैं।
- सख्त होने से बचाव: तीन साल से अधिक पुराने बाँस अत्यधिक सख्त, कड़े और रूखे हो जाते हैं। उन्हें काटते और मोड़ते समय उनके टूटने का खतरा रहता है।
खपच्चियाँ तैयार करने की विधि: कारीगर 'दाओ' (विशेष चौड़े चाकू) की सहायता से बाँस की गाँठों को काटकर अलग करते हैं। फिर बहुत सावधानी और दक्षता से बाँस को लंबाई में चीरकर पतली-पतली, चौकोर और एकसमान खपच्चियाँ तैयार की जाती हैं। खपच्चियों को छीलकर एकदम चिकना बनाया जाता है।
प्राकृतिक रंग:
- गुड़हल के फूल: लाल और गुलाबी रंग के लिए गुड़हल के फूलों के रस का प्रयोग किया जाता है।
- इमली की पत्तियाँ: खपच्चियों को हरा या पीला रंग देने के लिए इमली की पत्तियों के घोल में उबाला जाता है।
- गीली मिट्टी: पक्के काले रंग के लिए खपच्चियों को कई दिनों तक गीली चिकनी मिट्टी में दबाकर रखा जाता है।
बाँस पर्यावरण संरक्षण में निम्नलिखित कारणों से एक वरदान (Green Gold) है:
- 100% जैव-अपघटनीय (Biodegradable): प्लास्टिक सैकड़ों वर्षों तक नष्ट नहीं होता और धरती व समुद्र को ज़हरीला बनाता है, जबकि बाँस की वस्तुएँ नष्ट होकर मिट्टी में खाद बन जाती हैं।
- तीव्र पुनरुत्पादन: बाँस दुनिया का सबसे तेज़ी से बढ़ने वाला घास-प्रजाति का पौधा है जो काटने के बाद पुनः तेज़ी से उग आता है, अतः जंगलों के कटने का भय नहीं रहता।
- प्लास्टिक के विकल्प: प्लास्टिक की बोतलों, ब्रशों, बर्तनों, टोकरियों और फर्नीचर के स्थान पर बाँस के टिकाऊ और सुंदर उत्पाद पर्यावरण और स्वास्थ्य दोनों के लिए सुरक्षित हैं।
- ग्रामीण आजीविका: बाँस उद्योग को बढ़ावा देने से ग्रामीण व जनजातीय कारीगरों को सम्मानजनक रोज़गार मिलता है।
1. कार्बन अवशोषण: बाँस अन्य पेड़ों की तुलना में 35% अधिक ऑक्सीजन छोड़ता है और भारी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड सोखता है, जिससे मिट्टी का कटाव रुकता है।
2. सतत अर्थव्यवस्था: पूर्वोत्तर भारत के राज्यों में बाँस आधारित कुटीर उद्योग न केवल प्लास्टिक का विकल्प दे रहे हैं, बल्कि 'वोकल फॉर लोकल' और 'आत्मनिर्भर भारत' के संकल्प को सिद्ध कर रहे हैं।