नेताजी का चश्मा
स्वयं प्रकाश | कहानी — देशभक्ति, नागरिक कर्तव्य और कैप्टन चश्मेवाले का राष्ट्रप्रेम | CBSE Board 2026-27
चश्मेवाला न तो कोई फौजी था और न ही सुभाष चंद्र बोस की 'आज़ाद हिंद फ़ौज' का भूतपूर्व सिपाही। फिर भी कस्बे के लोग उसे आदर और व्यंग्य के मिले-जुले भाव से 'कैप्टन' कहते थे, जिसके प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:
- प्रगाढ़ देशभक्ति व राष्ट्रप्रेम: चश्मेवाले के हृदय में देश के शहीदों और स्वतंत्रता सेनानियों के प्रति अपार श्रद्धा थी। नेताजी की बिना चश्मे वाली अधूरी मूर्ति उसे कचोटती थी।
- सक्रिय नागरिक निष्ठा: वह अत्यंत निर्धन और शारीरिक रूप से अपंग (लँगड़ा) फेरीवाला था, फिर भी अपने सीमित संसाधनों में से नेताजी की मूर्ति पर अपनी ओर से नियमित चश्मा लगाता था।
- सेनानी जैसी मानसिक भावना: सेनानी की वर्दी न पहनते हुए भी उसके विचार व समर्पण एक सच्चे सिपाही जैसे थे, इसलिए कस्बे वाले उसे 'कैप्टन' कहकर पुकारते थे।
(क) हालदार साहब की मायूसी का कारण: हालदार साहब को पता चला था कि देशभक्त कैप्टन चश्मेवाले की मृत्यु हो चुकी है। वे मायूस थे कि अब कस्बे के चौराहे पर नेताजी की मूर्ति तो होगी, किंतु उसकी आँखों पर चश्मा लगाने वाला कोई नहीं होगा, क्योंकि मास्टर जी बनाना भूल गए और कैप्टन अब रहा नहीं।
(ख) सरकंडे के चश्मे से जागने वाली उम्मीद: सरकंडा घास की तीली से बना एक छोटा-सा खिलौना चश्मा था, जिसे प्रायः छोटे बच्चे खेल-खेल में बनाते हैं। यह चश्मा इस पावन सत्य को उजागर करता है कि देशभक्ति किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि देश की नई पीढ़ी (बच्चों) के नन्हें दिलों में भी राष्ट्रप्रेम और शहीदों के प्रति सम्मान जीवित है। देश का भविष्य सुरक्षित हाथों में है।
(ग) हालदार साहब के भावुक होने का कारण: हालदार साहब ने जब देखा कि साधनहीन बच्चों ने अपनी बाल-सुलभ भावना से नेताजी की आँखों पर सरकंडे का चश्मा पहना रखा है, तो उनकी निराशा पल भर में आशा में बदल गई। इस पवित्र राष्ट्रभाव को देखकर उनकी आँखें भर आईं और वे श्रद्धा से अभिभूत हो उठे।
आशय: लेखक ने इस कथन के माध्यम से समाज में व्याप्त स्वार्थपरता, संवेदनहीनता और गिरते नैतिक मूल्यों पर गहरा क्षोभ व्यक्त किया है।
जो नागरिक उन स्वतंत्रता सेनानियों का उपहास उड़ाते हैं जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपना सुख, परिवार और सर्वस्व न्योछावर कर दिया, वे समाज के लिए अभिशाप हैं। यदि समाज अपने देशप्रेमियों का सम्मान करने के बजाय निजी स्वार्थों के लिए बिकने और समझौते करने के अवसर ढूँढ़ने लगे, तो ऐसे राष्ट्र की स्वाधीनता और संस्कृति का पतन निश्चित है।
पानवाला सड़क के चौराहे पर अपनी दुकान चलाता था। उसका शब्द-चित्र निम्नलिखित है:
- वह एक काला, मोटा और खुशमिजाज आदमी था जिसकी बड़ी-सी तोंद हँसने पर थिरकती थी।
- उसके मुँह में हमेशा पान ठूँसा रहता था, जिसके कारण उसके दाँत लाल-काले हो चुके थे और बात करने से पहले उसे नीचे पीक थूकनी पड़ती थी।
- वह स्वभाव से मजाकिया, बातूनी और व्यंग्य कसने वाला था, परंतु अंदर से एक संवेदनशील हृदय भी रखता था; कैप्टन की मृत्यु पर वह अपनी आँखें पोंछता है।
पानवाले की यह टिप्पणी अत्यंत अनुचित, संवेदनहीन और निंदनीय है। किसी भी व्यक्ति की शारीरिक दिव्यांगता या गरीबी का उपहास उड़ाना अमानवीय है।
कैप्टन यदि शारीरिक रूप से लँगड़ा था, तो क्या हुआ? मानसिक और आत्मिक रूप से उसका राष्ट्रप्रेम किसी भी स्वस्थ सैनिक से कहीं अधिक ऊँचा था। पानवाला जिसे 'पागलपन' समझ रहा था, वह वास्तव में कैप्टन की असीम देशभक्ति और समर्पण था। समाज को ऐसे देशभक्तों का उपहास करने के बजाय उनके प्रति कृतज्ञ होना चाहिए।
- (क) हालदार साहब: यह उनकी प्रगाढ़ देशभक्ति, राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति आदर और समाज की सूक्ष्म घटनाओं के प्रति गहरी संवेदनशीलता को दर्शाता है।
- (ख) पानवाला: ऊपरी हँसी-मजाक के पीछे उसके भीतर एक संवेदनशील, सहृदय और मानवीय गुणों से युक्त व्यक्ति छिपा था, जिसे कैप्टन की मृत्यु का गहरा दुख था।
- (ग) कैप्टन चश्मेवाला: यह उसकी अमर देशभक्ति, नेताजी के प्रति अगाध श्रद्धा और अपने सीमित साधनों में भी कर्तव्य पालन करने की निष्ठा को दर्शाता है।
'कैप्टन' नाम सुनकर हालदार साहब ने सोचा होगा कि वह कोई लंबा-चौड़ा, रोबीला, मजबूत कद-काठी का फौजी जवान होगा। उसके सिर पर फौजी टोपी, तन पर वर्दी और चेहरे पर रौब होगा जो आज़ाद हिंद फ़ौज में सुभाष चंद्र बोस का साथी रहा होगा।
सार्वजनिक स्थलों पर लगी महापुरुषों की प्रतिमाएँ हमारे राष्ट्रीय गौरव और प्रेरणा की प्रतीक हैं। उनके प्रति हमारा और समाज का निम्नलिखित कर्तव्य है:
- मूर्ति और उसके आसपास के परिसर को स्वच्छ और सुंदर बनाए रखना; उस पर धूल, पक्षियों की गंदगी या कचरा न जमने देना।
- मूर्ति को किसी भी प्रकार की क्षति या असामाजिक तत्वों के अनादर से बचाना।
- विशेष राष्ट्रीय अवसरों (जयंती, पुण्यतिथि आदि) पर उन्हें माल्यार्पण कर उनके आदर्शों और विचारों को अपने आचरण में उतारना।
योग्यता-आधारित उच्च स्तरीय प्रश्न (Competency-Based Questions)
कारण (R): वह अपनी गरीबी और शारीरिक दिव्यांगता के बावजूद नेताजी की मूर्ति को कभी चश्माविहीन नहीं रहने देता था।
विकल्प:
(क) अभिकथन (A) और कारण (R) दोनों सही हैं तथा कारण (R), अभिकथन (A) की सही व्याख्या करता है।
(ख) अभिकथन (A) और कारण (R) दोनों सही हैं, परंतु कारण (R), अभिकथन की सही व्याख्या नहीं करता।
(ग) अभिकथन (A) सही है, परंतु कारण (R) गलत है।
(घ) अभिकथन (A) गलत है, परंतु कारण (R) सही है।
व्याख्या: कैप्टन के पास सैन्य साधन नहीं थे, परंतु उसकी राष्ट्रभक्ति कर्म में प्रकट होती थी। उसने अपने सामर्थ्य से नेताजी की अधूरी मूर्ति को चश्मा देकर देशप्रेम की मिसाल पेश की, अतः कारण (R) सीधे तौर पर अभिकथन (A) की पुष्टि करता है।
कहानी यह अमर संदेश देती है कि देश सीमाओं से घिरे भू-भाग का नाम नहीं है, बल्कि वहाँ रहने वाले नागरिकों, प्रकृति, संस्कृति और राष्ट्रीय प्रतीकों से बनता है। आम नागरिक निम्नलिखित तरीकों से देशसेवा कर सकते हैं:
1. राष्ट्रीय स्मारकों व प्रतीकों का आदर: महापुरुषों की प्रतिमाओं, तिरंगे और सार्वजनिक संपत्तियों की सुरक्षा व सम्मान करना।
2. स्वच्छता व पर्यावरण संरक्षण: अपने आसपास के परिवेश को स्वच्छ रखना, जल-विद्युत की बचत करना।
3. कर्तव्यनिष्ठा: अपने कार्य (पढ़ाई, व्यवसाय, नौकरी) को ईमानदारी से पूर्ण करना ताकि राष्ट्र समृद्ध बन सके।